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All Blog Posts (19,173)

अतुकांत-तुम तो न जानते थे न महात्मन्!

हे महात्मन्!

हे वयोवृद्ध!

तेरी मृतात्मा सुने!

राम-गौतम की इस भूमि पर

अब वटवृक्ष छोड़,

उसकी टहनियों को

पूजा जायेगा।

तूने जो किये थे,

निः स्वार्थ कृत्य,

कर विस्मृत उन्हें,

बस तेरी कमियों को ही

उकेरा जायेगा।

इस सत्य-भूमि पर,

सत्यता को झुठलाकर

इतिहास को ही

तोड़ा मरोड़ा जायेगा,

तेरी रीतियों-नीतियों की

प्रबुद्ध आवाज को

अब अहिंसात्मक असहिष्णुता

बोला जायेगा।

जिन घटितों का तुझसे

दूर तक रिश्ता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 13, 2016 at 2:15pm — 2 Comments

जलेबी बाई और जलेबियां (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

जलेबी चौक पर प्रसिद्ध चाट वाले की दुकान पर कॉलेज की कुछ लड़कियाँ समोसा-कचौड़ी के मज़े लेते हुए बगल की लोकप्रिय दुकान में जलेबियां बनते हुए ग़ौर से देख रहीं थीं।



"क्या देख रही हो बहनों, हमारी-तुम्हारी ही कथा सुनाती हैं जलेबियां!"



"क्या? क्या मतलब?" - एक ख़ूबसूरत चंचल लड़की ने पूछा।



"ये देखो, ये वाली कड़ाही है जलेबी का मायका। यहाँ माँ-बाप की पोटली से निकल कर रूप-रंग और सांचे में ढलकर गरम तेल में तली जाती हैं जलेबियां!" -यह कहकर शहर की मशहूर जलेबी बाई ने कड़ाही में… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2016 at 8:28am — 7 Comments

अहिल्या के लिए मत सोचना

प्राण तो प्राण हैं दृष्टि के गुलाम हैं
वजह नहीं हैं कदापि ,वजह के अंजाम हैं  
कभी प्रेम पुचकार प्रगाढ़ से
पाषाणी अजन्ता युगवाणी  बना गए
कभी तिरस्कार का तीर भेद  
प्रेयसी अहिल्या को पाषाणी बना गए
अहिल्या के लिए
कभी भी मत सोचना
जैसे ऋषिवर ने नहीं सोचा
परमात्मा ने तो हरगिज़ नहीं  
कि प्रतिलांच्छित पतिव्रता
निरपराध ,निराश्रय अहिल्या
आदतन नारी -धर्म तो…
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Added by amita tiwari on April 12, 2016 at 11:06pm — 4 Comments

आईने तो आईने हैं ...

आईने तो आईने हैं ...

क्यूँ ,आखिर क्यूँ

आईनों से बात करते हो

ये करीबियां ये दूरियां

सब फ़िज़ूल हैं

कांच के टुकड़ों की तरह

टूटे हुए ज़ज़्बात

कब जुड़ पाते हैं

गर्द की आंधियां

ज़र्द पत्तों पर ही कहर ढाती हैं

बेज़ान जिस्मों पर

कब कोई तरस खाता है

बेमन से ही सही

हर कोई उसे ख़ाके सुपुर्द कर जाता है

कुछ भी तो हासिल न होगा

यूँ अपने अक्स से बात करके

हर सवाल मुंह चिढ़ाएगा

हर जवाब मुहं मोड़ जाएगा

आँखों का भीगापन…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2016 at 9:49pm — 2 Comments

मैं तो भुला चुका था,मगर याद आ गया (ग़ज़ल)

22 1212 1122 1212



मैं तो भुला चुका था,मगर याद आ गया

आखिर में ऐ ख़ुदा,तेरा दर याद आ गया



दुनिया की ख़ाक छान के जब ठोकरें मिलीं

जो छोड़ के गया था,वो घर याद आ गया



जब फूल हर डगर पे ही मुझको बिछे मिले

काँटों पे जो किया,वो सफ़र याद आ गया



पतझड़ के रुत में भी था हरा एक वो दरख़्त

किसकी दुआओं का था असर, याद आ गया



पल-भर की बेखुदी ने सफीना डुबो दिया

साहिल पे नैनों का वो भँवर याद आ गया



तूफ़ाँ में मुझको थाम के अविचल खड़ा… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on April 12, 2016 at 8:50pm — 3 Comments

निगाहें- ग़ज़ल

22 122 22 122
जबसे हैं तुमसे, उलझीं निगाहें।
इक दूसरे में, डूबीं निगाहें।।

मौका लबों को देती नहीं हैं।
बातें करें खुद, अपनीं निगाहें।।

दुनिया की कोई परवा नहीं है।
मिलकर झपकना, भूलीं निगाहें।।

जब भी हुई हैं, तुमसे जुदा ये।
तूफ़ाँ उठा औ' बरसीं निगाहें।।

अब छोड़कर के, जाना नहीं तुम।
बस ये ही तुमसे, कहतीं निगाहें।।

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 12, 2016 at 3:44pm — 2 Comments

कुछ लम्हे ....

कुछ लम्हे ....

वो कुछ लम्हे

जो हमने मिलकर

अपनी झोली फैलाकर

ख़ुदा की हर चौखट पर

सर झुकाकर

मांगे थे //

वो कुछ लम्हे

जो हमारे ज़हन में

आज तक

इक दूसरे के वास्ते

वक्ते इज़हार के इंतज़ार में

ज़िंदा हैं //

वो कुछ लम्हे

जो हम दोनों ने

दो जिस्म इक जां

हो जाने के लिए मांगे थे

अब जब वो लम्हे

हमें नसीब हुए

तुम उनसे विमुख होने का सोच रही हो

अपनी ही आरज़ुओं का

अजन्मे ही गला घोंट…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 12, 2016 at 2:01pm — 2 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212
कुर्सियों के खेल में माहिर हुए
भेद सारे आपके जाहिर हुए।1

ख्वाब लोगों को दिखाकर सुनहरे
आप तो पलकें नचा साहिर हुए।2

हो गये सब ही गुनाहों से बरी
वे जले फिर आप तो ताहिर हुए।3

हों भले कितने बड़े ही हाथ पर
आप तो कानून से बाहिर हुए।4

हारता अबतक मुआ यह तंत्र है
बिन किये कुछ आप तो काहिर हुए।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 12, 2016 at 12:55pm — 2 Comments

छोटे भगवान्

अदभुत अकथनीय वातावरण

आज भगवान स्वयं घर पधारे हैं ,

चारों –ओर खुशियाँ ही खुशियाँ लाये है

भगवान् या देवी जो भी हों

घर को खुशियों से भर दिया है 

आज अम्बर भी ,देव वियोग में आसूं बहा रहा है

हवायें भी व्याकुल हो

प्रभु को ढूढने चली आ रही हैं

इससे अनभिज्ञ ,अंजान हैं

हमारे छोटे भगवान् जी

घरवालों के प्रान जी

पर क्या इनकी पूजा होगी ?

क्या इनकी किलकारियां ,नटखट अदाएं यूँ ही रहेंगी ?

ऐसा प्रश्न क्यूँ आया

आना…

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Added by maharshi tripathi on April 12, 2016 at 10:39am — 2 Comments

तेरा इंतजार करते-करते (कविता)

ए हसीन लम्हे

जरा आहिस्ता गुजर,

बहुत बरस बिताए हैं

तेरा इंतजार करते-करते।



बहुत तडपे हैं

बहुत रोए हैं

आंसू भी खूब बहाए हैं

हमने आहें भरते-भरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



हठ किया है हमने

बादलों से निकलते

चांद की तरह

यहां तक पहुंचे हैं हम

जमाने की नजरों से

डरते- डरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



जाने क्या तडप थी

जाने क्या एहसास था

जिंदगी जी आज तक

हमने यूंही मरते-मरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



मौलिक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 12, 2016 at 9:27am — 2 Comments

रिजर्वेशन (लघु कथा )

रिजर्वेशन (लघु कथा )

--------------------------

हामिद का थर्ड ए सी का टिकट कन्फर्म हो चूका था , ट्रैन के आते ही वह पत्नी के साथ जयपुर के लिए रवाना हो गया | उसकी सीट के सामने 9 और 12 नंबर की बर्थ  थीं जिन पर लेटे यात्री आगे से आरहे थे | अगले स्टेशन पर दो महिलाएं कोच में चढ़ गयीं ,आते ही कहने लगीं कि बर्थ 9 और 12  हमारी हैं दो महीने पहले से रिजर्वेशन करवा रखा है | इतना सुनते ही दोनों यात्री सकते में आगये। ......... बहस शुरू हो गयी ,  दोनों यात्रियों ने मोबाइल पर कन्फर्म  मेल…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2016 at 9:43pm — 2 Comments

ग़ज़ल (ज़िंदगी का यही तो साहिल है )

ग़ज़ल (ज़िंदगी  का यही तो साहिल है )

----------------------------------------------

2122 -------1212 --------22

किस लिए मौत से तू ग़ाफ़िल है |

ज़िंदगी का यही तो साहिल  है |

जो बचाता है बद नज़र से उन्हें

उनके रुख़ का सियाह वह तिल है |

वह सफ़र में नहीं है साथ अगर

मेरे किस काम की वो मंज़िल है |

जितनी आसां है राह उल्फत की

उसकी मंज़िल भी उतनी मुश्किल है |

मेरी आँखों से देखिये उनको

वह…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2016 at 9:05pm — 2 Comments

अपने

उनकी क्या बात करूँ,

मैं अपनी ही सुनाता हूँ।

भाव-भंगिमा थी क्या उनकी,

मैं अपनी पर इतराता हूँ।

पसीना आए या खून बहे,

पर उनका क्या जाता है?

लूट लिया उन्होंने मुझको,

मुझे लुटना भी भाता है।

मीठी-मीठी वाणी से,

लूट हाड-मांस का सार लिया।

अपने पराये हो गए,

बिगाड सारा परिवार दिया।

धन-दौलत की क्या बात करूँ,

वो तो उनके पास रही।

क्या लेना मुझको था उससे,

वो गले में पडके खाक रही।

है अच्छाई और बुराई क्या,

मैं समझ नहीं पाता… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 11, 2016 at 5:06pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो कर सको तो दुआ करो (ग़ज़ल ) ..डॉ० प्राची

११२१२, ११२१२, ११२१२, ११२१२ 

मुझे ज़िन्दगी की तलाश है, मुझे ख़्वाब में न मिला करो।

न करो कभी कोई वायदा, जो करो तो फिर न फिरा करो।



वो जो चीर दे कोई पाक दिल, न ही तंज ऐसे कसा करो।

बड़ी मुश्किलों से भरा हो जो, न वो जख़्म फिर से हरा करो।…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 11, 2016 at 2:48pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बाँध

उसके गले में गोया सहस्त्रों  केक्टस उग आये हों 

थोड़ी थोड़ी देर में उनको निगलने की कोशिश में

गले की कोशिकाएँ कभी खिंच रही थी

 कभी  फूल रही थी

साँसें नियंत्रण खो रही थी

आँखों में दर्द के लाल डोरे उभर आये थे

मुझे ऐसा लगा मैं बहते दरिया को  बाँध से रोकते हुए  देख रही हूँ

जो कितना तकलीफ देह है

कुछ देर  और देखती रहूंगी तो वो मेरी आँखों

के रास्ते बह चलेगा

क्यूँ नहीं उस दरिया को मुक्त किया जा रहा

भावनाओं पर नियंत्रण…

Continue

Added by rajesh kumari on April 11, 2016 at 10:24am — 2 Comments

पर क्यों?

पर क्यों

पांच सौ रूपये महीने की बाई,

प्रतिस्थापित हो जाती है,

सहेली में,

सब सुख दुख,

सास की ज्यादतियां,

पति की बेवफाईयां,

बड़े प्रेम से सुनती है,

कमेंट्स भी देती है ,

मरहम भी रखती है,

चली जाती है दूसरे घर,

बेतार की सेवा प्रदान करने।

कभी कभी,

प्रतिस्थापित हो जाती है,

संशय के घेरे में,

शक के डेरे में,

सौत बन जाती है,

पर देहरी नहीं छुड़ाती,

अजीब सी कसमसाहट देती है,

रस भरी प्रेम पगी,

कथायें सुनाती है…

Continue

Added by Pawan Jain on April 11, 2016 at 10:05am — No Comments

दोहा छंद......ग्यारह मनके

दोहा छंद......ग्यारह मनके

भले भलाई ही करें, बुरे बुने नित जाल.

भले हुए यश-चांदनी, बुरे क्रूर-तम-काल.१

सत्य-अहिंसा-प्रेम रस, सदगुरु की पहचान.

रखे मुक्त हर दोष से, जैसे कमल-कमान.२

सूरज की किरनें चली, सत्य ज्ञान के पार.…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 10, 2016 at 10:49am — 4 Comments

लग्न-मुहूर्त(लघुकथा)-सतविंदर कुमार

"अरे!जानती हो आचार्य जगत ज्ञानी जी की पुत्रवधु मरते-मरते बची। बस भगवान ने साँसे बख्श दी। वर्ना ऐसा दुःख मिला है जीवन भर कलेजे में ठुंसा रहेगा।बेचारी!"

बैठने के लिए पीढ़ा सरकाते हुए मुख्तारी ताई एक साँस में बोल गई।

"हाँ! सुना तो है कि कल उसकी तबियत ज्यादा ख़राब हो गई थी। शहर के नर्सिंग होम में ही दाखिल है। अभी तक..."

कुछ सोचते हुए फिर बोली, "अब तो उसकी तबीयत में काफी सुधार है।फिर आप किस दुःख की बात कर रही हो ताई?"

सहमते हुए।

"अरे! जानती हो न कि उसका प्रसव का समय नजदीक…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 10, 2016 at 9:30am — 6 Comments

दोहे(विविधा-21)

सृत्वा सोम सुरेश शिव,नंदीश्वर नटराज।
अनघ अघोर अज्ञेय जी,पूर्ण करें सब काज।।

गंगा जल व् विल्व पत्र,लिए पुष्प मंदार।
हे शेखर अर्पित करूँ,स्वीकारें अभिसार।।

जीवन भर ऐसा रहे ,हो उनका सम्मान।
माता बहना रूप जो,उनको अर्पण जान।।

संगी साथी या सखा,कह दूँ तुमको मित्र।
इक दूजे में यूँ बसे, जैसे छाया चित्र।।

कितना किसने कब दिया,है कितना अनुपात।
स्वार्थ दिखे सम्बन्ध पर,हावी मुझको तात।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 8, 2016 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-आज प्रिये कुछ कहना चाहूँ।

आज प्रिये! कुछ कहना चाहूँ, हिय में तेरे रहना चाहूँ।

तेरे तन-मन में खोया मैं खोया ही अब रहना चाहूँ।।

आज प्रिये! कुछ.........



निज नृग-से न्यारे नयनों में अंजन-सा मुझे रचा लो तुम।

उलझा लो कुंचित-केशों में या गजरा मुझे बना लो तुम।।

अधरों की लाली बन प्यारी मैं अधर-सुधा पा लेना चाहूँ।

आज प्रिये! कुछ............



कानों का कुंडल बन जाऊँ या उर का हार बना लो तुम।

बन जाऊँ छम-छम पायल मैं या कंगन मुझे बना लो तुम।

नथ की नथिया बन सजनी मैं चूम होठ को लेना… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 8, 2016 at 10:01am — 1 Comment

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