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द्वितीय

 ट्रेन के चलते ही एक तरुण दैनिक यात्री  द्वितीय श्रेणी के स्लीपर क्लास में दाखिल  हुआ. आरक्षित श्रेणी के यात्री अधिकांशतः अपनी बर्थ पर अधपसरे हुए थे . एक बर्थ के कोने पर खाली जगह देखकर वह बैठने जा ही रहा था कि उस पर बैठे अधेड़ व्यक्ति ने गुर्राकर कहा –‘आगे बढ़ो,…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 6, 2017 at 8:54pm — 2 Comments

हास्य ग़ज़ल - खूब फटे में टांग अड़ाएं

यार चलो  नेता बन जाएँ

खूब  फटे  में टाँग अड़ाएँ  

 

शेयर जैसे सुबह उछलकर,

लुढ़क शाम को नीचे आएँ

 

जंतर मंतर पर जाकर हम,

मूंगफली  का  भाव बढ़ाएँ

 

उल्टा पुल्टा बोल बोल कर,

चप्पल, जूते, थप्पड़ खाएँ…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on June 6, 2017 at 8:30am — 10 Comments

"अपनी धरती -अपना अंबर" - अर्पणा शर्मा /पर्यावरण दिवस पर विशेष

आओ बनाएँ निर्मल, अक्षय, सुंदर ,

यह प्रिय धरती अपनी-अपना अंबर



प्रकाश ध्वनि जलवायु में,

सर्वत्र प्रसारित प्रदूषण विषधर,

करें पर्यावरण विषैला नित ड़ंस-ड़ंस कर,

बढ़ गये हैं छिद्र ओजोन परत पर,

नानाविध रोग करते जीवन दूभर ,



कट रहे वर्षावन अंधाधुँध,

हर ओर फैल रहे विशाल बंजर,

वर्षा आह्वान में ये सक्षम क्यूँकर,

बंजर से कैसे निर्मित हों जलधर,

कई जीव-पाखी खोगये विलुप्त होकर,



कहीं रूठ जाते वर्षा के ये कहार,

कहीं बरस जाते… Continue

Added by Arpana Sharma on June 5, 2017 at 8:07pm — 4 Comments

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

जब जब

मैं छूती हूँ

खूंटी पर

टंगी कमीज़ को

मेरा समूचा अस्तित्व

रेंगने लगता है

उस स्पर्शबंध के आवरण में

जहां मेरा शैशव

निश्चिंत सोया करता था

अब

जब आप नहीं रहे

मैं इस कमीज़ में

आपको महसूस करती हूँ

सामना करती हूँ

हर उस दूषित दृष्टि का

जो मेरे शरीर पर

अपनी कुत्सित भावनाओं की

खरोंचें डालती है

मेरी दृष्टिहीनता को

मेरी कमजोरी मानती है

न, न

आप…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2017 at 4:11pm — 7 Comments

ग़ज़ल -- दुनियादारी में अब तक हम बच्चे थे

22--22--22--22--22--2



जो तूफ़ाँ के डर से तटपर ठहरे थे

बशर नहीं थे वो पुतले मिट्टी के थे



कब तक तेरी हाँ सुनने को रुकते हम

हमको अपने फ़र्ज़ अदा भी करने थे



दिल के ज़ख़्म बयाँ करना कुछ मुश्किल था

आँखों में आँसू लब पर अंगारे थे



हॉट पे क्या बिकता था मुझको क्या मतलब

मेरी जेब में बस ख़्वाबों के सिक्के थे



जिसका पेट भरा है वो क्या समझेगा

भूख से मरने वाले कितने भूखे थे



दरियाओं के संग न अपनी यारी थी

प्यास बुझाने… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 5, 2017 at 3:59pm — 6 Comments

ग़ज़ल -- 'दिनेश' तुम इतने बदल गये

1221--2121--1221--212



ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए

मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गये



आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी

उड़ने को पर हुये तो परिन्दे बदल गये



होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं

ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए



हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी वही

घर जब बँटा तो ख़ून के रिश्ते बदल गये



ढलने पे आफ़ताब है मेरे नसीब का

देखो ये मेरी आँखों के तारे बदल गये



लहजे में गुल-फ़िशानी न… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 5, 2017 at 8:46am — 6 Comments

गजल- कोई न ठिकाना है

मापनी २२१ १२२२ २२१ १२२२

 

नफरत के किले सारे, अब हमको ढहाना है

जब हाथ मिलाया है, दिल को भी मिलाना है



चुपचाप  न बैठोगे,  पाओगे  सदा  मंजिल,

दुश्मन है तरक्की का, आलस को भगाना है…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 5, 2017 at 8:30am — 4 Comments

कुण्डलिया छंद

पाकिस्तानी टीम को, मिली करारी हार।
दौडा़ दौड़ाकर उन्हें, भारत ने दी मार।।
भारत ने दी मार, मैच इकतरफा जीता।
यूवी और विराट, , लगाते रहे पलीता।।
हारा पाकिस्तान, पड़ी है मुँह की खानी।
जंग रहे या मैच, पिटेंगे पाकिस्तानी।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on June 5, 2017 at 12:07am — No Comments

एक ग़ज़ल देश के वीर सैनिकों के नाम

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

दुख दर्द आह दिल की खलिश को लताड़ कर

हम चल दिये बदन पे पड़ी धूल झाड़ कर



दिल दुश्मनों के हिल गये इक पल न टिक सके

हमने नजर उठा उन्हें देखा दहाड़ कर



आवाज दी चमन ने पुकारा बहार ने

हम आ गये हसीन जहाँ छोड़ छाड़ कर



माँ भारती तरफ बढ़े नापाक जो कदम

रख देंगे तेरे दौनों जहाँ को उजाड़ कर



है रूह जिस्म जान तलक हिन्द के लिये

ओ माँ सपूत से तेरे इतना न लाड़ कर

(मौलिक एवं… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 4, 2017 at 5:25pm — 11 Comments

विरह गीत

(आधार बह्र ए मेरे)



रात चाँदनी और ये तारे

नहीं सुहाते बिना तुम्हारे-2





साथ रहो तुम तब है होली

तुम्ही नहीं जो फिर तो हो ली

तुमसे जीवन में सारे रंग

तुम बिन जीवन ही है बे रंग



गम का दरिया तर जाता है

तुम रहते जब साथ हमारे।



झूम-झूम कर आता सावन

लेकिन प्यासा तरसे जीवन

विरह काल में बूंदें गिर कर

चलें जलाती मेरा तन-मन



साथ तुम्हारा नहीं अगर तो

सभी फुहारें हैं अंगारे।



जले जेठ-सा जाड़ा तुम… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on June 4, 2017 at 3:30pm — 4 Comments

बेटी

किसी से कम रहो ना  बेटी  , पढ़ो बढ़ो  तुम आगे जाओ  |
अडिग रहो अपने ही पथ पर ,  तुम कदम ना पीछे हटाओ  |
नाम करो अपना इस  जग में , बढ़ो  सुता  तुम कदम बढ़ाओ |
हर मुश्किल में रहे हौसला , हर गम सहकर बढ़ते जाओ   |…
Continue

Added by Shyam Narain Verma on June 3, 2017 at 4:39pm — 4 Comments

ग़ज़ल --ख़ुदा की रहमतें उनको बहुत लाचार करतीं हैं

1222 1222 1222 1222



वो अक्सर बेरुखी से वक्त का दीदार करती हैं ।।

हवाएं इस तरह से जिंदगी दुस्वार करती हैं ।।



न जाने क्या मुहब्बत है हमारी हर तरक्की से ।

हज़ारों मुश्किलें हम से ही आंखें चार करती हैं ।।



बड़ी चर्चा है वो बदनामियों से अब नहीं डरता ।

है उसकी हरकतें ऐसी दिलों में ख्वार करतीं हैं ।।



जिन्हें खुद पर भरोसा ही नही रहता है मस्जिद में ।

खुदा की रहमतें उनको बहुत लाचार करती हैं ।।



न् जाओ तुम कभी मतलब परस्तों के इलाके में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 3, 2017 at 3:04pm — 5 Comments

ग़ज़ल - तुमसे मन की बात हो गई

बहर- फैलुन*4

तुमसे मन की बात हो गई  

सावन सी बरसात हो गई,  

 

जब से आये हो जीवन में,

पूनम सी हर रात हो गई

 

नैनों से जब नैन मिले तो,

सपनों की बारात हो गई

 

दिल में तुमने हमें बसाया,…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 3, 2017 at 1:34pm — 4 Comments

ट्राइएंगल : सिस्टम, कस्टम और ट्रेंड (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दादा जी कहीं चले गए थे। पिताजी नहा-धो कर तैयार हो कर अपने मोबाइल चार्ज़ कर रहे थे। इंटरनेट के लिए बड़ा डाटा पैक अपने व बेटे के मोबाइलों की सिमों में कल ही डलवा लिया था। आज बोर्ड की दसवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित होने वाला था समाचारों के अनुसार दोपहर बारह बजे सभी अपने मोबाइलों, टी.वी. या लेपटॉप से चिपके हुए थे। मन्नू दोस्तों से मोबाइल पर वीडियो-कॉल पर बातचीत में मशगूल था।



"क्यों रे वेबसाइट खुली क्या?" दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई।



"नहीं भाई, लगता है रिज़ल्ट अभी अपलोड हो रहा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 3, 2017 at 1:27pm — 9 Comments

मेरे भीतर की नदी ( कविता)

कल कल बहती है नदी

मेरे भीतर भी कहीं



सूर्य की तपिश में

गर्म होती है ऊपरी सतह



चाँदनी रातों में चमक जाती है

श्वेत तारों को आग़ोश में लिए हुए



सावन में हरित होती मिट्टी

सिमट जाती हैं मुझमें कभी



फिसलती रेत कभी जम जाती है

पर बहता है जल प्रवाह



निरंतर कभी ऊचें पर्वतों से

कभी निचली सतह पर अपनी गति से



ज़मीन पर से देखती है आसमां को

अपने में बहुत कुछ समेटे हुए



छोटे कंकड़ , बड़ी चट्टानें

छोटे… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 8:56am — 8 Comments

" यवनिका" -एक क्षणिका /अर्पणा शर्मा

खिंच जाएगी,
ड़ोरी सहसा,
थम जायेगी ,
ये कठपुतली,
भागते समय में निर्बाध,
यवनिका गिरेगी,
जीवन नाटक की,
और नैपथ्य में ,
गूँजेगी एक आवाज़,
कि अब तुम्हारा,
समय समाप्त ...!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Arpana Sharma on June 2, 2017 at 11:23pm — 7 Comments

गजल(अक्ल के मारे हुए हैं..)

2122 2122

अक्ल के मारे हुए हैं

हम सभी हारे हुए हैं।1



आज मसले बेवजह के

देखिये नारे हुए हैं।2



जो नहीं थोड़ा सुहाये,

आँख के तारे हुए हैं।3



लूटते हैं जिस्म-ईमां

जान हम वारे हुए हैं।4



दान कर दीं कश्तियाँ भी

आज बेचारे हुए हैं।5



कान देते, बात बनती

वे उबल पारे हुए हैं।6



बाग भर मैं देख आया,

तिक्त फल सारे हुए हैं।7



सब लिये हैं गीत अपने

भाव को टारे हुए हैं।8



हंस ढूँढ़े, मिल… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 2, 2017 at 8:24pm — 13 Comments

पैदा वो हालात न कर

इतनी ज्यादा बात न कर

वादों की बरसात न कर

 

ह्रदय बड़ा ही नाजुक है,

उस पर यूँ आघात न कर

 

ख्यात न हो कुछ बात नहीं,

पर खुद को कुख्यात न कर

 

मानव को मानव रहने दे,

ऊंची नीची जात न कर

 …

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2017 at 10:02am — 20 Comments

***दहलीज के उस पार***(लघुकथा)राहिला

शराबी पति से रुई की तरह धुनी जा रही कुसमा ,गाँव में आयी पुलिस की गाड़ी देख कर दौड़ पड़ी।

"बचा लो साहब !बहुत मारा ये जल्लाद हमको,इसकी ऐसन पूजा करो कि हाँथ उठाना भूल जाए ।"एक तो अचानक आई पुलिस और ऊपर से कुसमा की शिकायत ने गोविंद पर चढ़ी दारू के सुरूर को तनिक हल्का कर दिया। वह जुबान जो अभी तक तूफ़ान की गति से गालियां उगल रही थी,तालू से जा चिपकी।वह थोड़ा सहम सा गया।

"क्यों रे!ज्यादा चर्बी चढ़ गयी लगता?

एक बार की मेहमानी में सारी पिघला देंगे। सुन रहा है ना?और तू!,पुलिस वाला कुसमा की ओर देख… Continue

Added by Rahila on June 1, 2017 at 10:37pm — 14 Comments

बेटियाँ (मुक्तक)

(1)क़ुदरत की इनायत हैं बेटियाँ
माँ-बाप की चाहत हैं बेटियाँ
सदा सपनों को करती साकार
हर घर की ज़रूरत हैं बेटियाँ ।
(2)राहें नई बना रही हैं बेटियाँ
सपनें नये सजा रही हैं बेटियाँ
कीर्तिमानों के शिखरों को छू रही
विमानों को उड़ा रही हैं बेटियाँ ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 1, 2017 at 9:06pm — 11 Comments

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