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उसे पहले कभी देखा नहीं था.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 122

उसे पहले कभी देखा नहीं था

वो दिल के पास जो रहता नहीं था  (1)

लगी है शह्र की इसको हवा अब

हमारा गाँव तो ऐसा नहीं था  (2)

बहुत कुछ बोलती थीं आँखें उसकी

ज़ुबाँ से वो कभी कहता नहीं था  (3)

अँधेरों ने रखा था क़ैद जब तक

उजाला दूर तक फैला नहीं था  (4)

न जाने क्या हुआ भरता नहीं है

पुराना घाव तो गहरा नहीं था  (5)

वही तन कर खड़ा रहता है आगे

कभी जो सामने बैठा नहीं…

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Added by सालिक गणवीर on January 1, 2021 at 2:30pm — 6 Comments

भूल मन पीड़ा विगत की गा रहा है - लक्ष्मण धामी'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२



भूल मन पीड़ा विगत की गा रहा है

शुभ रहे नव  वर्ष  ये  जो आ रहा है।१।

*

आँख जब आँसू झराने को विवश थी

अन्त उस मौसम  का होने जा रहा है।२।

*

जिन्दगी होगी सुहानी आज से फिर

भोर का  सूरज  हमें  समझा रहा है।३।

*

बह न पाए फिर लहू इन्सानियत का

ये वचन मन को  सभी के भा रहा है।४।

*

पेट भर भूखे को रोटी नित मिलेगी

साथ यह उम्मीद  साथी  ला रहा है।५।

*

बाँटना …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2021 at 8:25am — 11 Comments

नए साल कुछ नया सिखाना

अपूर्ण मानव की अर्ध-क्षमताओं का पूर्ण उपहास उड़ाता

बीतते बीतते बीत गया यह साल

 

धरा चलती रही ,परिक्रमा करती रही

निज धुरी की भी सूरज की भी ...

चंद्रमा ने भी हिम्मत कहाँ हारी

ग्रहणों से ग्रसित होता रहा

मगर परिक्रमाएँ ढोता रहा

 

तारों ने कहाँ टिमटिमाना छोड़ा

घोड़ों ने कहाँ हिनहिनाना छोड़ा

कोयल भी वैसी ही कूकी

कागा भी वैसे ही कगराया

बस  सिसकी…

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Added by amita tiwari on January 1, 2021 at 3:00am — 2 Comments

नन्हा गुलाब कह रहा है (कविता)

नन्हा गुलाब  कर रहा विनंती 

जीवन दान मुझे,  तुम दे दो  

खिलने दो मुझको भी पूरा 

बस इतना सा वरदान तुम दे दो | 

वो देखो उस नन्ही चिड़िया को 

उसको उड़ते हुए देखना है मुझको 

अभी तो है वह घोंसले में अपने 

रहने दो अपनी क्यारी में मुझको | 

वो देखो रंग-बी-रंगी तितली को 

गुंजन कर रहा भँवरा भी सुन लो

क्यों तोड़ लेते हो हम सब को 

जीवन हमको हमारा तुम दे दो | 

नहीं लिखवाया अमरपट्टा कोई…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 30, 2020 at 4:49pm — 4 Comments

गीत -नवीन वर्ष में नवीन गीत रंग रास हो (पञ्चचामर छ्न्द)

विचार में प्रवाह हो स्वभाव में उजास हो

नवीन वर्ष  में  नवीन  गीत  रंग  रास  हो

प्रभात धूप हो खिली समीर मस्त हो बहे

अनन्त हर्ष को लिए सुवास भाव भी रहे

कपाट  बंद खोल के धरे नवीन ज्ञान को

समर्थ अर्थ में  रखे सदैव स्वाभिमान को

रहे  कहीं  न दीनता सदा  यही प्रयास हो

नवीन वर्ष में नवीन गीत रंग रास हो।।१

विकार काम क्रोध मोह लोभ क्षोभ त्याग दे

कुमार्ग  पे  चले नहीं  विनाश  का न राग दें

कहीं  दिखे  अधर्म  तो  अधर्म  देह  चीर दें

समाज …

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Added by नाथ सोनांचली on December 30, 2020 at 2:54pm — 10 Comments

धरती माता ने सारे दुख -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



धरती माता ने सारे दुख हलधर को दे डाले हैं

लेकिन उसने हँसते हँसते पेट अनेकों पाले हैं।१।

*

उद्योगों को नीर बहुत है करने को उपयोग मगर

इसकी खेती को जल जीवन तो नदियों में नाले हैं।२।

*

इसके हर साधन पर कब्जा औरों की मनमानी का

मौसम के हालातों  जैसे  हालात स्वयम् के ढाले हैं।३।

*

खेती करके भूखा रहता हलधर देखो रोज यहाँ

व्यापारी के श्वानों के मुँह मक्खन भरे निवाले हैं।४।

*

सरकारों ने पथ पथरीले जो शूलों के साथ दिये

उनके…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 27, 2020 at 8:32pm — 6 Comments

प्यार का सागर

इक मैं थी इक मेरा साथी,सुन्दर इक संसार था 

संसार नहीं था एक समंदर,बसता जहां बस प्यार था 

छोटे बडे़ सभी रिश्तों की,मर्यादा यहाँ पालन होती थी 

प्यार की हर नदिया का,सम्मान यहाँ पर होता था 

मिलती जब कोइ नदिया समुद्र से,हर्षोल्लास बरसता था 

बाहें फैला समुद्र भी अपनी,सबका स्वागत करता था 

ना जाने फिर इकदिन कैसा एक बवंडर आया था 

सारा समंदर सूख गया,बस मरुस्थल ही बच पाया था 

आज प्रयत्न मैं कर रही,मरुभूमि में कुछ पुष्प खिलाने का 

कुछ सुकूं…

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Added by Veena Gupta on December 26, 2020 at 10:54pm — 2 Comments

सोचती हूँ उन नरपशुओं की माताओं से मिला जाये

अब  जब दामिनी चली गई है

चले जा चुके हैं उसके हत्यारे भी

वो नर पशु

जिनसे सब स्तब्ध रहे

 दरिंदगी से त्रस्त रहे

 हर तरफ मौत की मांग उठती  रही

दबती रही उठती रही बिलखती रही

 

 मेरी भी एक मांग रही

कि एक बार मुझे उन नर-पशुओं की माताओं से मिलाया…

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Added by amita tiwari on December 26, 2020 at 3:00am — 2 Comments

यहाँ तो बहुत हैं अभी यार मेरे.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

122 122 122 122

यहाँ तो बहुत हैं अभी यार मेरे

मगर याँ अदू भी हैं दो-चार मेरे (1)

कभी भूलकर भी न उनको सज़ा दी

रहे उम्र-भर जो गुनहगार मेरे (2)

हिकारत से अब देखते हैं मुझे भी

यही लोग थे कल तलबगार मेरे (3)

मुझे टुकड़ों में बाट कर ही रहेंगे

हैं दुनिया में जो लोग हक़दार मेरे (4)

जो रिश्ते सभी तोड़ कर जा चुका है 

उसी से जुड़े हैं अभी तार मेरे (5)

वही मिल…

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Added by सालिक गणवीर on December 24, 2020 at 11:00pm — 10 Comments

डरे भला क्यों मौत से ?

जब तक इन्द्रिय भोग में होती मन की वृत्ति

सकल दुखों ,भव - ताप से मिलती नहीं निवृत्ति

उस असीम की शक्ति से संचालित सब कर्म

परम विवेकी संत ही जाने उसका मर्म

पंच तत्व के मेल से बनें प्रकृति के रूप

यह दर्पण , इसमें दिखे सत्य ,'अरूप' , अनूप

दृढ़ संकल्पित यदि रहे नित्य , सनातन जान

डरे भला क्यों मौत से ? अजर , अजेय , अमान

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on December 23, 2020 at 11:03am — 2 Comments

ग़ज़ल-क़ातिलों के साथ जब हमको नज़र आई सियासत

2122 2122 2122 2122

कैसे कह दें मुल्क में कितनी निखर आयी सियासत ।

क़ातिलों के साथ जब हमको नज़र आई सियासत ।।

चाहतें सब खो गईं और खो गए अम्नो सुकूँ भी ।

इक तबाही का लिए मंज़र जिधर आई सियासत ।।

नफ़रतों के ज़ह्र से भीगा मिला हर शख़्स मुझको ।

कुर्सियों के वास्ते जब गाँव- घर आई सियासत।।

मन्दिरो मस्ज़िद में बैठे खून के प्यासे बहुत हैं ।

क्या हुआ इस मुल्क में जो इस कदर आई सियासत ।।

आदमी का ख़्वाब देखो फिर ठगा सा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 23, 2020 at 1:00am — 8 Comments

पैसा- दूसरा ईश्वर

धन, दौलत तो उपयोग की वस्तु, जाती कभी भी साथ नहीं

कद्र ना होती उस शख्स की, पैसा जिसके पास नहीं ||

 

आज बचा लो कल मिलेगा, इसे बचाना दोष नहीं

दर-दर की वो ठोकर खाता, गरीब की कोई औकात नहीं ||

 

सुख-वैभव उसके दर विराजे, पैसो की ना जिसके पास कमी

अनकहे रिश्ते खुद बन जाते, आदर्श बनती हर बात कही ||

 

कुछ दोष तो यूं छिप जाते, उम्मीद जिसकी होती…

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Added by PHOOL SINGH on December 19, 2020 at 1:44pm — 2 Comments

मौन की भाषा

मौन की भाषा सुनो,मौन मुखरित हो रहा है 

जाने कितने शिकवे छिपे हैं,जाने कितने हैं फसाने 

अपने अंतर में छुपाये,जाने कब से सह रहा है 

खामोशी चारों तरफ है,अब न कोइ शोर है 

कोइ नहीं है पास में अब,एकाकीपन का ये दौर है 

लग रहा है फिर भी ऐसा,ज्यों गूंजता कानों में कोइ शोर है 

ध्यान और एकांत ने,धीरे से फिर समझा दिया 

मौन तो इक शक्ति है विश्वास है 

नयी राहों पर देता ज्ञान का प्रकाश है 

एकांत मौन में मिलती नयी उर्जा सदा 

मौन चिंतन ही…

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Added by Veena Gupta on December 18, 2020 at 3:33am — 1 Comment

अंतिम सत्य

जीवन की इस नदिया को,बस बहते ही जाना है 

लक्ष्य यही है इसका इकदिन,सागर में मिल जाना है 

चाहे जितनी बाधाएँ हों,चाहे जितने हों भटकाव 

लक्ष्य प्राप्त करना ही होगा,होगा ना उसमें बदलाव 

मीठे पानी की नदिया इकदिन,खारा सागर बन जायेगी 

इसी तरह ये जीवन नदिया इकदिन,अमर आत्मा बन जायेगी 

पर जाने से पहले जीवन में,कुछ ऐसे मीठे काम करो 

नदिया जैसे सब याद करें,आत्मा अमर हो जाने दो 

मौलिक /अप्रकाशित  

  वीणा 

Added by Veena Gupta on December 18, 2020 at 3:00am — 3 Comments

दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर

( एक )

लोग राजनीति में बड़े - बड़े

बदलाव लाने के लिए आते हैं।

सत्ता में आते ही कद-काठी ,

डील-डौल , रंग-रूप , वाणी ,

पहनावा सब बदल जाते हैं ,

सबसे बड़ी बात , चेहरे - मोहरे

और इरादे तक बदल जाते हैं।



( दो )

वह गतिमान है ,

चलते रहना उसकी प्रकृति।

वह समय है , गुजर जाता है।

पर अतीत को छोड़ जाता है ,

और छोड़ जाता है ,

अतीत के अवशेष, धरोहरें,

स्मृतियाँ , स्मारक , कहानियां।

समय प्रति क्षण चलायमान…

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Added by Dr. Vijai Shanker on December 17, 2020 at 9:30am — 6 Comments

चोरी करता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



खेतीहर का ध्यान बँटाकर दाना चोरी करता है

मल्लाहों से नौका लेकर नदिया चोरी करता है।१।

*

बात उजाले की  नित  कर के तारा चोरी करता है

मन्दिर मस्जिद रटकर सबकी पूजा चोरी करता है।२।

*

मन्जिल पास बड़ी है अब तो राहत पाँवों को देदो

ऐसा कह कर सब के  पग से रस्ता चोरी करता है।३।

*

ये कैसा राजा  आया  है  आज  हमारी नगरी में

सन्तों  जैसे  पहरावे  में …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2020 at 7:04am — 9 Comments

भाई-एक विश्वास

एक भ्रात है भरत के जैसा,

जिसमें कुछ पाने का भाव नहीं

समर्पित करता भ्रात चरण में,

राज्य संग सुख, चैन सभी ||

 

तिलभर भी छल ना मन में,

जग भी उसके साथ नहीं

कठोरता/ताने सहता सारे जन की,

मातृ की करनी उसकी सभी ||

 

विभीषण भी एक भ्रात उधर है

सिंहासन पर जिसकी आँख लगी

कठिन समय में भ्रात छोड़ता,

शत्रुओं को बताता भेद सभी ||

 

ना अंतक्रिया भी भ्रात की करता

सुख-भोग से भी इंकार…

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Added by PHOOL SINGH on December 15, 2020 at 6:58pm — 2 Comments

उसने आज़ाद कब किया है मुझे (ग़ज़ल)

2122 1212  22/122

क़ैद नज़रों में ही रखा है मुझे

उसने आज़ाद कब किया है मुझे  (1)

इससे बहतर तो था अदू मेरा

यार दीमक सा खा रहा है मुझे  (2)

 रात की नींद उड़ गई मेरी

ख़्वाब में जब से वो दिखा है मुझे  (3)

सुब्ह तक होश में नहीं आया

रात इतनी पिला चुका है मुझे  (4)

मंज़िलों तक पँहुच नहीं पाया

पर वो रस्ता बता गया है मुझे  (5)

वो शिकायत कभी नहीं करता

उससे इतना ही अब गिला है मुझे …

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Added by सालिक गणवीर on December 14, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

अन्नदाता के लिए -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२२/२१२



बाढ़-सूखा सूदखोरी  हर  समय  डर अन्नदाता के लिए

कौन सी सरकार चिन्तित है यहा पर अन्नदाता के लिए।१।

**

हर समय उद्योगपतियों की उन्हें चिन्ता सताती है मगर

खोज पाये संकटों का हल न अफसर अन्नदाता के लिए।२।

*

कर के उद्यम से यहा तैयार उसको नित्य बोता है उपज

मायने रखता नहीं कुछ  खेत  ऊसर अन्नदाता के लिए।३।

*

नित्य भूखे पेट सोता  है  उपज  को वो बचाने खेत…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2020 at 8:00am — 12 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

.

1

अपनी हर लग़्ज़िश छिपा ली जाएगी

हाँ क़सम झूठी भी खा ली जाएगी

2

जिंदगी की शान-ओ-शौकत के लिए 

बात कुछ भी अब बना ली…

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Added by Rachna Bhatia on December 11, 2020 at 11:30am — 10 Comments

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