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नन्हा गुलाब कह रहा है (कविता)

नन्हा गुलाब  कर रहा विनंती 

जीवन दान मुझे,  तुम दे दो  

खिलने दो मुझको भी पूरा 

बस इतना सा वरदान तुम दे दो | 

वो देखो उस नन्ही चिड़िया को 

उसको उड़ते हुए देखना है मुझको 

अभी तो है वह घोंसले में अपने 

रहने दो अपनी क्यारी में मुझको | 

वो देखो रंग-बी-रंगी तितली को 

गुंजन कर रहा भँवरा भी सुन लो

क्यों तोड़ लेते हो हम सब को 

जीवन हमको हमारा तुम दे दो | 

नहीं लिखवाया अमरपट्टा कोई हमने 

मिटटी में मिल जाएंगे हम भी यहीं 

तब तक तो क्यारिओं में रह सकें 

ऐसा कुछ तो तुम ही कर दो |

तुम हो माली इस बगिया के 

मानते तुमको हम अपना पिता

माता हमारी है यह मिटटी 

जहाँ से होते हम तुम पैदा | 

स्वरचित, अप्रकाशित एवं अप्रसारित 

 

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Comment by नाथ सोनांचली on January 5, 2021 at 12:49pm

आद0 कल्पना भट्ट जी सादर अभिवादन। बढ़िया भाव है रचना के। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2021 at 9:19pm

आ. कल्पना बहन सादर अभिवादन। गीत का अच्छा प्रयास हुआ है ।हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on January 1, 2021 at 2:15pm

बहना कल्पना भट्ट 'रौनक़' जी आदाब, अच्छे भाव लिये अच्छी कविता लिखी आपने, बधाई स्वीकार करें ।

कुछ टंकण त्रुटियाँ दूर कर लें ।

Comment by Chetan Prakash on January 1, 2021 at 8:29am
नव वर्ष मंगलमय हो, आदरेया ! गीत हृदय से निकलता है, कवि का सहज स्वाभाविक आल्हाद अथवा पीर की रुदावली है! मात्र लघु और दीर्घ स्वरों की गणना नहीं ! अत: गीत में भाव स्वयं बहता है !

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