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चोरी करता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


खेतीहर का ध्यान बँटाकर दाना चोरी करता है
मल्लाहों से नौका लेकर नदिया चोरी करता है।१।
*
बात उजाले की  नित  कर के तारा चोरी करता है
मन्दिर मस्जिद रटकर सबकी पूजा चोरी करता है।२।
*
मन्जिल पास बड़ी है अब तो राहत पाँवों को देदो
ऐसा कह कर सब के  पग से रस्ता चोरी करता है।३।
*
ये कैसा राजा  आया  है  आज  हमारी नगरी में
सन्तों  जैसे  पहरावे  में  बटुआ  चोरी  करता  है।४।
*
मत आ जाना तुम झाँसे में हम तो उसको झेल रहे
धूप की  बातें  करते-करते  छाया  चोरी  करता है।५।
*
खूब सुना है राजतन्त्र में चोर को राजा से डर था
लोकतन्त्र  में  उलटी  गंगा  राजा  चोरी  करता है।६।


(५.१२.२०)

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2021 at 6:53pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 1, 2021 at 11:45am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

ये कैसा राजा  आया  है  आज  हमारी नगरी में
सन्तों  जैसे  पहरावे  में  बटुआ  चोरी  करता  है।४।
*

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 27, 2020 at 6:56pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 27, 2020 at 6:53pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 27, 2020 at 6:51pm

आ. भाई   समर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by सालिक गणवीर on December 24, 2020 at 8:31pm

भाई  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी
सादर अभिवादन
एक और बेहतरीन ग़ज़ल के लिए शैर दर शैर दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल करें

Comment by Samar kabeer on December 21, 2020 at 5:28pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, बिल्कुल नई रदीफ़ में बहुत उम्द: ग़ज़ल कही है आपने, इस्तेआरो की मदद से आपने भरपूर तंज़ किये हैं, दाद के साथ मुनारकबद पेश करता हूँ ।

Comment by Chetan Prakash on December 17, 2020 at 5:56am
  1. आदाब, भाई, लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर, मुझे आप की, रदीफ़, चोरी करता है, कही गयी ग़ज़ल ने बहुत निराश किया  ! ग़ज़ल में कुछ भी सकारात्मक नहीं है! सो, भाई, ग़ज़ल, क्षमा करें, आपकी सामर्थ्य के साथ बिलकुल न्याय नहीं करती, न भाव के स्तर और शिल्प के स्तर पर कहूँ, तो बेहद खराब काफिया बन्दी हुई है! साभार 
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2020 at 1:47pm

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 16, 2020 at 1:28pm

जनाब लक्षमण धामी भाई 'मुसाफ़िर' जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल पेश की है आपने दाद ओ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।  सादर।

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