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अहसास की ग़ज़ल -मनोज अहसास

2122     2122     2122     212

एक ताज़ा ग़ज़ल

तेरी चौखट तक पहुँचने के हैं अब आसार कम.

फासला लंबा बहुत है या मेरी रफ्तार कम.

कौन से रस्ते पे चलके मैं चला जाऊं कहाँ,

डर बहकने का है दिलबर हौसला इस बार कम.

हद से ज्यादा बेबसी है पर इरादे बेहिसाब,

हमसफर तो मिल गए हैं मिलते हैं गमख़ार कम.

घर पहुँचने की तड़प में इस सफर में जाने जां,

रोटिया दिलकश अधिक है और तेरे रुखसार कम.

जोड़ कर रखा था नाता…

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Added by मनोज अहसास on May 14, 2020 at 12:22am — 5 Comments

मानन्द-ए-ज़माना अभी  शातिर नहीं हैं हम(१०० )

( 221 1221 1221 122 )

.

मानन्द-ए-ज़माना अभी  शातिर नहीं हैं हम

लोगों की तरह झूठ के नासिर नहीं हैं हम 

**

नफ़रत के अलमदार ये अच्छे से समझ लें

ये मुल्क हमारा है मुहाज़िर नहीं हैं हम

**

हम सिर्फ़ मुहब्बत को समझते हैं इबादत

बस  यार ख़ुदा अपना है काफ़िर नहीं हैं हम

**

जो दिल में रहे अपने वही रहता लबों पे 

पोशीदगी-ए-राज़ में माहिर नहीं हैं हम

**

दिखते  हैं अगर रुख़  पे तबस्सुम के मनाज़िर

ग़ायब करें ग़म…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 13, 2020 at 3:30pm — No Comments

तृप्ति

तृप्ति

चहुँ ओर उलझा कटा-पिटा सत्य

कितना आसान है हर किसी का

स्वयं को क्षमा कर देना

हो चाहे जीवन की डूबती संध्या

आन्तरिक द्वंद्व और आंदोलन

मानसिक सरहदें लाँघते अशक्ति, विरोध

स्वयं से टकराहट

व्यक्तित्व .. यंत्रबद्ध खंड-खंड

जब देखो जहाँ देखो हर किसी में

पलायन की ही प्रवृत्ति

एक रिश्ते से दूसरे ...

एक कदम इस नाव

एक ... उस…

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Added by vijay nikore on May 13, 2020 at 5:30am — 4 Comments

मातृ -महक

मातृ -महक
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
यह बात मुझे कभी समझ नहीं आती थी कि
मै समझदार जिम्मेदार क्यों नहीं हो पाती थी
सर्वदा सुरक्षित सर्वदा…
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Added by amita tiwari on May 13, 2020 at 3:00am — 2 Comments

घर :

घर :

अच्छा है या बुरा है

जैसा भी है

मगर

ये घर मेरा है

इस घर का हर सवेरा

सिर्फ और सिर्फ

मेरा है

मैं

दिन रात

इसकी दीवारों से बातें करता हूँ

मेरे हर दर्द को

ये पहचानती हैं

मैं

कौन हूँ

ये अच्छी तरह जानती हैं

धूप

हर रोज

इन दीवारों को धो देती है

दीवारों पर टंगे अतीतों पर

रो देती है

कल भी कहते थे

ये आज भी कहते हैं

ये घर उनका का है

दीवारों पर उनकी यादों…

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Added by Sushil Sarna on May 12, 2020 at 8:59pm — 2 Comments

गीतिका

छंद- आल्‍ह, विधान- 31 मात्रा, (चौपाई +15), अंत 21

ढाई आखर प्रेम सत्य है, स्‍वीकारो पहचानो मित्र.

धन बल सुख-दुख आने-जाने, प्रीत बढ़ाओ जानो मित्र.

 

कहते हैं लँगड़े घोड़े पर, दुनिया नहीं लगाती दाँव,

भाग्‍य आजमाने के बदले, स्‍वेद बहाओ मानो मित्र.

 

युग बदले हैं हुए खंडहर, थी…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on May 12, 2020 at 10:00am — 3 Comments

उम्मीद की चमक- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल )

२२१/ २१२१/२२२/१२१२



दिखती भला है अब किधर उम्मीद की चमक

खोने  लगी  है  खुद  सहर  उम्मीद की चमक।१।

**

माझी को धोखा दे  गयी पतवार हर कोई

दरिया में जैसे हो लहर उम्मीद की चमक।२।

**

बाँटेगा सबको आ के सच थोड़ी मिले भले

लेकर चला है वो  अगर उम्मीद की चमक।३।

**

कहते  उसे  किसान  हैं  निर्धन  बहुत  भले

झुकने न देगी उसका सर उम्मीद की चमक।४।

**

लूटा गया  है  हर  तरह  उसको  जहान में

आँखों में उसके है मगर उम्मीद की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 12, 2020 at 7:38am — 8 Comments

माटी :कुछ दोहे

माटी :कुछ दोहे

माटी मिल माटी हुआ, माटी का इंसान।

माटी अंतिम हो गई,मानव की पहचान।।

माटी अंतिम हो गई,मानव की पहचान।

माटी- माटी हो गया, साँसों का अभिमान।।

माटी -माटी हो गया, साँसों का अभिमान।

खंडित सारे हो गए, जीने के वरदान।।

खंडित सारे हो गए, जीने के वरदान।

पल भर में माटी हुआ माटी का परिधान।।

पल भर में माटी हुआ, माटी का परिधान।

माटी के पुतले यही, तेरी है पहचान।।

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on May 11, 2020 at 7:31pm — 3 Comments

ग़ज़ल- मृत्यु के अनुरक्ति का अभिसार है क्या

ग़ज़ल

2122 2122 2122

मृत्यु  के अनुरक्ति का अभिसार है क्या ।

मुक्ति पथ पर चल पड़ा संसार है क्या ।।

काल शव से कर चुका श्रृंगार है क्या ।

यह प्रलय का इक नया हुंकार है क्या ।।

आत्माओं  का समर्पण  हो रहा है ।

दृष्टिगोचर मृत्यु का उदगार है क्या ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 11, 2020 at 5:39pm — 4 Comments

है कोई आरज़ू का क़त्ल जो करना चाहे(९९ )

( 2122 1122 1122 22 /112 )

है कोई आरज़ू का क़त्ल जो करना चाहे

कौन ऐसा है जहाँ में कि जो मरना चाहे

**

तोड़ देते हैं ज़माने में बशर को हालात

अपनी मर्ज़ी से भला कौन बिखरना चाहे

**

आरज़ू सबकी रहे ज़ीस्त में बस फूल मिलें

ख़ार की रह से भला कौन गुज़रना चाहे

**

ज़िंदगी का हो सफ़र या हो किसी मंज़िल का

बीच रस्ते में भला कौन ठहरना चाहे

**

देख क़ुदरत के नज़ारे है भला कौन बशर

जो कि ये रंग…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 11, 2020 at 5:30pm — 21 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22 /112



सिर्फ़ कुर्सी का रास्ता हूँ मैं

यूं रियाया का रहनुमा हूं मैं



आदमी हूं अना है ग़ैरत है

फिर भी वक़्त आने पर बिका हूं मैं



रसन-ए-जोर-ओ-ज़ुल्म इतनी चली

रह गया ढांचा घिस गया हूं मैं



जश्न-ए-आज़ादी हूं मैं कैसे कहूँ

लगता है जैसे हादसा हूँ मैं



तोड़ पत्थर में बन गया पत्थर

अलविदा ख़ाब कह चुका हूं मैं



मुफ़लिसी का न ज़ात-ओ-मज़हब है

ये अगर कह दूं तो बुरा हूं मैं



जेब मुफ़लिस की.. दिल अमीरों… Continue

Added by Om Prakash Agrawal on May 11, 2020 at 12:04pm — 6 Comments

नया सफर

मैं जहाँ  पर खड़ा हूँ वहाँ से हर मोड़ दिखता है

इस जहाँ से उस जहाँ का हरेक छोड़ दिखता है

ये वो किनारा है जहां सब खत्म हुआ समझो

सभी भावनाओं का जैसे अब अंत हुआ समझो

             

दर्द मुझे है बहूत मगर अब उसका कोई इलाज नहीं

मैं ना लगूँ  खुश मगर, मैं किसी से नाराज़ नहीं

मैंने देखा है खुद को उसकी आँखों मे कई दफा मरते हुए

उसने ये सब सहा है, हर बार मगर…

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Added by AMAN SINHA on May 11, 2020 at 9:28am — 3 Comments

"पालकी आंसुओं की"

लम्हा- लम्हा
जहाँ पे भारी था, होंठ अनवरत
मुस्कुराए हैं
सच के साये से भी,जहाँ, रहा परदा
रिश्ते ऐसे भी कुछ निभाए हैं ।
फांस सी कभी हथेली में, कभी तलवों के
फूटते छाले
प्यार की हर नदी रही सूखी
दूर तक वृक्ष हैं
न,
साये हैं।
रेत तपती है
पांव के नीचे,
होंठ चटके हैं
प्यास से,लेकिन;
भेज दो स्वप्न
सब विदा करके,
पालकी आंसुओं की
लाए हैं ।

अन्विता ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Anvita on May 10, 2020 at 11:23pm — 3 Comments

ग़ज़ल(अश्क धोकर आदमी....)

2122  2122  2122

अश्क धोकर आदमी थकने लगा है

सोचता - अब और रोना तो बला है।1

गर्दिशों का दौर बढ़ता,देखिए तो

शोर का कुछ भाव ज्यादा ही चढ़ा है।2

गुम हुई - सी जा रही पहचान फिर से

जिंदगी जो दे,उसे मरना पड़ा है।3

डंस रहा जाहिल अंधेरा आदमी को,

क्यूं उजाला रेत बन धुंधला हुआ है?4

कोसते हैं लोग कुछ भगवान को भी

जब संजोई गांठ में विष ही भरा है।5

ख्वाब चकनाचूर, आंखें पूछती हैं…

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Added by Manan Kumar singh on May 10, 2020 at 9:45pm — 6 Comments

ग़ज़ल (मातृ दिवस पर विशेष)

2122 2122 2122 212



ख़ुद रही भूकी मुझे जी भर खिलाना याद है

मुफ़लिसी में टाट का 'स्वेटर' बनाना याद है



इम्तिहां कोई भी हो आशीष देती थी सदा

मां का हाथों से दही चीनी खिलाना याद है



एक मुर्शिद की तरह से हाथ सर पर फेरती

मैंने क्या कीं ग़लतियां इक इक गिनाना याद है



पाठशाला हम न जाएंगे ये ज़िद जब हमने की

पकड़े कान और खींच कर बस्ता थमाना याद है



बद-नज़र से दूर रखना था सियह टीका लगा

जो हरारत थोड़ी भी हो सहम जाना याद है



माँ सा तो…

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Added by Om Prakash Agrawal on May 10, 2020 at 6:30pm — 4 Comments

मातृ दिवस पर माँ को अर्पित कुछ दोहे :

मातृ दिवस पर माँ को अर्पित कुछ दोहे :

माँ सृष्टि का नाम है, माँ में चारों धाम।

बिन माँ के संसार में, कहीं नहीं विश्राम।।

हौले -हौले गोद में, सोया माँ का लाल।

हुआ बड़ा तो देखिए, भूला माँ का हाल।।

नौ माह किया गर्भ में, माँ ने बड़ा ख़याल।

बिन बोले ही रो पड़ी, दुखी हुआ जब लाल।।

हर दम चाहे माँ यही, सुखी रहे संतान।

माँ देती संतान को, साँसों का वरदान।।



बिन देखे संतान को, मिटे न माँ की भूख।

भूख़ी हो संतान तो,…

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Added by Sushil Sarna on May 10, 2020 at 6:02pm — 3 Comments

"हम वाणीजन"

हम वाणी जन हैं वाणी के

कवि लेखक हैं कलमकार।

मन जिनके निर्मल कोमल से

बहती निर्झर करुणा अपार।

हर तप्त हृदय की तपनक्रिया

का करते हैं सम्मान सदा।

जो दीन-हीन दुखियारे हैं

वे अपने हैं अभियान सदा।

जिनकी वाणी में द्रवित यहाँ

होता है बल नित अबला का।

जिनकी चर्चा में दुःख रहता

है मातृशक्ति हर विमला का।

जिनकी कलमों की धार सदा

निज संस्कृति का सम्मान करें।

जिनकी चिन्ता नित बाबू जी

की परिचर्चा का ध्यान…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 9, 2020 at 7:06pm — 1 Comment

"माँ नहीं है "

माँ नहीं है
बस-नहीं है
कोई धागा कोई कतरन
कोई स्वेटर कोई उधड़न
या जिंदगी की
कोई उलझन
माँ वहां दिखती है ।
सिकुड़ते रिश्ते
उधड़ती तुरपाई
तुम्हारे नाम रिश्तों की
परछाई ।
माँ नहीं भूली तुम्हें मैं
मेरे बच्चों में निहित तुम्हारी
परछाई ।

अन्विता ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Anvita on May 9, 2020 at 6:03pm — 2 Comments

ग़ज़ल ( तिजारत कैसे की जाए.....)

1222 1222 1222 1222

तिजारत कैसे की जाए हुआ है फैसला जब से

बड़ी किल्लत है पानी की लहू सस्ता हुआ जब से

मशीनें अब यहाँ पर और महंगी क्यों नहीं होंगी?

वतन में मुफ़्त ही इंसान भी मिलने लगा जब से

हमारा शह्र छोटा था मगर मिलता नहीं था वो

हमें अक्सर बुलाता है नयी दिल्ली गयाा जब से

समय के साथ कम होगी यही हम सोच बैठे थे

ये दूरी कम नहीं होती मिटा है फासला जब से

नयी शक्लें दिखाता था कभी जब सामने आया

नहीं जाता…

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Added by सालिक गणवीर on May 9, 2020 at 5:00pm — 17 Comments

देना ख़ुशी अल्लाह सहूलत के मुताबिक(९८ )

(221 1221 1221 122 )

.

देना ख़ुशी अल्लाह सहूलत के मुताबिक

ग़म देना हमें सिर्फ़ ज़रूरत के मुताबिक

**

ये ध्यान रहे कोई न दीवाना कभी हो

अल्लाह न दे इश्क़ भी चाहत के मुताबिक

**

कर ले न गिरफ़्तार अना जीत से हमको

हर जीत का हो दाम हज़ीमत के मुताबिक

**

दुनिया में हर इक शय की है इक तयशुदा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 9, 2020 at 10:30am — 11 Comments

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