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ग़ज़ल(अश्क धोकर आदमी....)

2122  2122  2122
अश्क धोकर आदमी थकने लगा है
सोचता - अब और रोना तो बला है।1

गर्दिशों का दौर बढ़ता,देखिए तो
शोर का कुछ भाव ज्यादा ही चढ़ा है।2

गुम हुई - सी जा रही पहचान फिर से
जिंदगी जो दे,उसे मरना पड़ा है।3

डंस रहा जाहिल अंधेरा आदमी को,
क्यूं उजाला रेत बन धुंधला हुआ है?4

कोसते हैं लोग कुछ भगवान को भी
जब संजोई गांठ में विष ही भरा है।5

ख्वाब चकनाचूर, आंखें पूछती हैं --
देखने से भी मना किसने किया है?6

बोलना सच हो रहा मुश्किल यहां पर
'पीठ वैसी कर हवा जैसी', सुना है।7

सुर्खियों में हो गए शैतान सारे
आदमी के वास्ते क्या कुछ बचा है?8

'जिंदगी की पौध पनपाओ बशर तुम'
आ रही अब दूर से कोई सदा है।9

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on May 13, 2020 at 11:49am

आभार आदरणीय समर जी,नमन।प्रयास सत त जारी है।

Comment by Samar kabeer on May 13, 2020 at 11:44am

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on May 13, 2020 at 11:17am

आभार आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 13, 2020 at 11:17am

आभार आदरणीय तेजवीर जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 13, 2020 at 10:04am

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन । उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई । 

Comment by TEJ VEER SINGH on May 11, 2020 at 11:47am

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।बेहतरीन गज़ल।

सुर्खियों में हो गए शैतान सारे
आदमी के वास्ते क्या कुछ बचा है?8

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