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"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ

एक 
--------
रात 
होते ही 
"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ 
और मेरे सीने के
ठीक ऊपर 
इक चाँद उग आता…
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Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 20, 2020 at 5:30pm — 1 Comment

झूठी बातें कह कर दिनभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



झूठी बातें कह कर दिनभर जब झूठे इठलाते हैं

हम सच के झण्डावरदारी क्यों इतना शर्माते हैं।१।

***

अफवाहों के जंगल यारो सभ्य नगर तक फैल गये

क्या होगा अब विश्वासों  का  सोच सभी घबराते हैं।२।

***

कैसे सूरज चाँद सितारे  अब तक चुनते आये हम

बात उजाले की कर के  जो  नित्य  अँधेरा लाते हैं।३।

***

नित्य हादसे  होते  हैं  या  उन में  साजिश होती है

छोटा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2020 at 11:00am — 8 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122   2122   22

जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको' जिसे जगजीत सिंह साहब ने गाया है उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए ये ग़ज़ल हुई है बहर थोड़ी परिवर्तित हुई है

तमाम दोस्तों को सादर समर्पित

स्वीकारें

कुछ हसीं फूलों से जीवन को सजा ले अब तो,

खुद को गुमनामी के पतझड़ से बचा ले अब तो.

मेरे जख्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी,

संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो.

अपनी गुल्लक को दिखा माँ को…

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Added by मनोज अहसास on February 16, 2020 at 10:00pm — 4 Comments

ये कैसी बहार है (ग़ज़ल)

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

फूलों के सीने चाक हैं बुलबुल फ़रार है

सब दाग़ जल उठे हैं ये कैसी बहार है

कैसी बहार शहर में क्या मौसम-ए-ख़िज़ाँ

कारें इमारतें हैं दिलों में ग़ुबार है

कुछ बस नहीं बशर का क़ज़ा पर हयात पर

लेकिन ग़ुरूर ये है कि ख़ुद-इख़्तियार है

हाकिम है ख़ूब ख़्वाब-फ़रोशों पे मेहरबां

भाता नहीं उसे जो हक़ीक़त-निगार है

क्या ख़ूब है…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 16, 2020 at 7:41pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : मैं भी लिखूंगा एक कविता (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : मैं भी लिखूंगा एक कविता

मैं भी लिखूंगा

एक कविता

चार पांच सालों बाद..

जब मेरे हाथों द्वारा लगाया हुआ

पलास का पौधा

बन जायेगा पेड़

उसपर लगेंगे

बसंती फूल

आयेंगी रंग बिरंगी तितलियाँ

चिड़िया बनायेंगी घोंसला...

मैं भी लिखूंगा

एक कविता

चार पांच सालों बाद..

जब मेरे घर आयेगी

नन्ही सी गुड़िया

जायेगी स्कूल

मेरी उँगली पकड़

और पढ़ेगी

क ल आ म .. कलम

गायेगी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 15, 2020 at 11:30pm — 3 Comments

जायदाद के हकदार

अम्मा का जाना

जैसे पर्दों का हट जाना

एक- एक कर सारे के सारे तार- तार हो गए

जिगर के सब टुकड़े जायदाद के हकदार हो गए


छोटे छोटे पुर्जे तक बांटे गए

सारे कागज़ पत्र तक छांटे गए

जिगर के टुकड़े थे वो सारी जायदाद के हकदार हो गए
 
कुछ…
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Added by amita tiwari on February 15, 2020 at 7:30pm — 5 Comments

टीन एजर बेटे के मेसेज - मम्मी के लिए

एक

-----

मुझे,

मालूम है आप

मेरी लापरवाहियां और बेतरतीबी की लिए

ऊपर ऊपर डांटते हुए भी

अंदर अंदर खुशी से और मेरे लिए प्रेम से भरपूर रहती हो

मेरे बिखरे हुए कपड़ों व किताबों को सहेजना अच्छा लगता है

पर यहाँ हॉस्टल में आ कर अब मुझे अपने कपडे खुद तह कर के रखना सीख लिया है

वहां तो आप सुबह ब्रश में टूथ पेस्ट भी आप लगा के देती थी

टोस्ट में मक्खन भी लगा के हाथ में पकड़ा देती थी

और प्यार भरी झिड़की से जल्दी से खाने की हिदायत देती थी

पर…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 15, 2020 at 5:30pm — No Comments

गुज़ारिश

गुज़ारिश

मुहब्बत में मज़हब न हो

मज़हब में हो मुहब्बत

मुहब्बत ही हो सभी का मज़हब

तो सोचो, हाँ, सोचो तो ज़रा

कैसी होगी यह कायनात

कैसी होगी यह ज़मीन

खुश होगा कितना…

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Added by vijay nikore on February 15, 2020 at 4:00pm — 4 Comments

प्रेम पत्र - लघुकथा -

प्रेम पत्र - लघुकथा -

आज वीरेंद्र पिता की मृत्योपरांत तेरहवीं  की औपचारिकतायें संपन्न करने के पश्चात पिताजी के कमरे की अलमारी से पिता के पुराने दस्तावेज निकाल कर कुछ काम के कागजात छाँट रहा था।

तभी उसकी नज़र एक गुलाबी कपड़े की पोटली पर पड़ी।उसने उत्सुकता वश उसे खोल लिया।वह अचंभित हो गया।वह जिस पिता को एक आदर्श और सदाचारी पिता समझता था उनकी चरित्र हीनता का एक दूसरा ही चेहरा आज उसके सामने था।उस पोटली में पिता के नाम लिखे प्रेम पत्र और एक सुंदर सी महिला के साथ तस्वीरें…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 15, 2020 at 11:30am — 6 Comments

डूब गया कल सूरज

डूब गया कल सूरज

कल ही तो था जो आई थी तुम

बारिश के मौसम की पहली सुगन्ध बनी

प्यार की नई सुबह बन कर आई थी तुम

मेरे आँगन में नई कली-सी मुस्कराई थी तुम

याद है मुझको वसन्त रजनी में

कल…

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Added by vijay nikore on February 15, 2020 at 6:30am — 4 Comments

धरणी भी आखिर रोती है

कितने ही द्रव्य और निधियाँ,

वह अपने गर्भ संजोती है

पर पल में मानव नष्ट करे

धरणी भी आख़िर रोती है



काटे नित हरे वृक्ष , पर्वत

माँ की काया श्री हीन करे

अपनी ही विपुल संपदा को

वह काँप-काँप कर खोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उसके ही सीने पर चढ़कर

जो भव्य इमारत खड़ी हुईं

उन बोझों से दबकर,थककर

अपनी कराह को ढोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उद्योग और कारखाने 

हैं कचरा नदियों में डालें

इनमें घुल गए रसायन में

मारक क्षमता तो…

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Added by Usha Awasthi on February 14, 2020 at 4:59pm — 6 Comments

एक ताज़ा ग़ज़ल

7 फेलुन 1 फ़ा

मेरी यादों से वो यारो जब भी घबराते हों गे

माज़ी के क़िस्सों से अपने दिल को बहलाते हों गे

काले बादल शर्म से पानी पानी हो जाते हों गे

बाम प आकर जब वो अपनी ज़ुल्फ़ें लहराते हों गे

जैसे हमको यार हमारे समझाने आ जाते हैं

उसके भी अहबाब यक़ीनन उसको समझाते हों गे

हम तो उनके हिज्र में तारे गिनते रहते हैं शब भर

वो तो अपने शीश महल में चैन से सो जाते हों…

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Added by Samar kabeer on February 13, 2020 at 5:55pm — 20 Comments

नए बीज / कविता

कुछ ख्वाबों के बीज लाकर

मैंने दिल के गमले में बोये थे।

पसीने का पानी पिलाकर

पौधे भी उगा दिये।

वो बात और है कि

गमले की मिट्टी मेरे दिल में भर गई।

और दिल भर देख भी नहीं…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 13, 2020 at 1:38pm — 6 Comments

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम गली अति सांकरी

------------------------

सुमी,



सुना है, किसी सयाने ने कहा है। ' प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई न समाय'

जब कभी सोचता हूँ इन पंक्तियों के बारे में तो लगता है, ऐसा कहने वाला, सयाना

रहा हो या न रहा हो, पर प्रेमी ज़रूर रहा होगा,जिसने प्रेम की पराकष्ठा को जाना होगा

महसूस होगा रोम - रोम से , रग - रेशे से, उसके लिए प्रेम कोई शब्दों का छलावा न

रहा होगा, किसी कविता का या ग़ज़ल का छंद और बंद न रहा होगा, किसी हसीन

शाम की यादें भर न रही होगा,…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 12, 2020 at 1:58pm — 4 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15

बीच सफर में धीरज टूटा,हाथों से पतवार गई.

मेरे मन की लाचारी से मेरी कोशिश हार गई.

एक अधूरा ख्वाब जो मुद्दत से आंखों में जिंदा है,

उसको लिखने की कोशिश में स्याही भी बेकार गई.

पिछले साल में और कोई था अब के साल में और कोई,

एक नए इजहार को चाहत फूलों के बाजार गई.

बरसों पहले जिसको चाहा उसकी यादें साथ रहें,

एक दुआ के आगे मेरी हर इक ख्वाहिश हार गई.

पापा की आंखों ने उसको जाने क्या क्या समझाया,

बेटी जब…

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Added by मनोज अहसास on February 12, 2020 at 1:10pm — 5 Comments

बिसासी सुजान(उपन्यास का एक अंश ) :: डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

हिन्दी की रीतिमुक्त धारा के शीर्षस्थ  कवि थे i उनकी प्रेमिका थी सुजान. जो दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह 'रंगीले' के दरबार में तवायफ थी i इनके मार्मिक प्रेम की अनूठी दास्तान पर आधारित है-उपन्यास 'बिसासी सुजान ' i पेश है उसका एक अंश ----घनानन्द

[48]

          

       जून का महीना I शुक्ल पक्ष की नवमी I दिन का अंतिम प्रहर I सूर्यास्त का समय I  यमुना नदी का काली घाट I घाट पर सन्नाटा I चंद्रमा की किरणें यमुना की लहरों से खेलती हुयी I हल्की आनंददायक हवा I आनंद…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 10, 2020 at 11:43am — 1 Comment

अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

221   2121   1221   212

आएगा जब तलक नहीं मौसम गुलाब का,

बदला रहेगा मूड मेरे आफताब का।

मज़बूरियों में जल गई इक उम्र की वफ़ा,

उसने दिखाया मुझको सलीका नकाब का।

मैं ऐसी शाइरी की तमन्ना में कैद हूँ ,

इक शेर में जो कह दे फसाना किताब का।

वो बेहिसाब बातों से भर देंगे सबका पेट,

जिनको समझ रहा है तू पक्का हिसाब का।

तासीर क्या है होठों से छूकर पता करो,

इक जाम ही बहुत है सुखन या शराब…

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Added by मनोज अहसास on February 9, 2020 at 11:30pm — 2 Comments

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द


चढ़ाये मैंने जो कुछ स्वर



बस केवल अंजुरी भर



पूरे युग के चौराहे पर



कुछ कानों को क्यों नागवार गुजरे



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द




वैसे सच है ये भी कि



उम्मीद ही नहीं थी इस बार



कि खाली जाएंगे सब वार



कि किसी को चुभेंगे ही नहीं



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द





ये भी नहीं कहना चाहते मेरे शब्द



कि अब जो कुछ भी हैं…

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Added by amita tiwari on February 9, 2020 at 9:00am — 2 Comments

देश की संस्कृति

संस्कृति देश की है प्राचीनतम,

यह कथा गल्प अथवा कहानी नहीं

है ये अविराम थोड़ा लचीली भी है

पर पयस है महज स्वच्छ पानी नहीं

यह पली है सहनशीलता धैर्य में 

ऐसी उद्दाम कोइ रवानी नहीं

हैं उदात्त हम तो ग्रहणशील भी

और अध्यात्म की कोई सानी नही  

    

दूर भौतिक चमक से रहे हम सदा

ऐसी धरती कहीं और धानी नही

दे  गए पूर्वज जो हमें सौंपकर

वैसी अन्यत्र जग में निशानी नहीं

वन्दे मातरम् I     {मौलिक व…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 9, 2020 at 8:30am — 2 Comments

रखकर जो नाम राम का -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२

**

जो भी वतन में दोस्तो दिखते कलाम हैं

हर वक्त उसकी शान में कहते सलाम हैं।१।

**

दुत्कार उनको हम रहे केवल सुनो यहाँ

जयचन्दी नीयतों में  जो  रहते इमाम हैं।२।

**

उनका भी मान है  नहीं  केवल लताड़ है

रखके जो नाम राम का रावण से काम हैं।३।

**

नेता  सभी  हैं  एक  से  जो  फूट चाहते

समझेंगे क्या कभी इसे जो लोग आम हैं।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2020 at 4:48am — 8 Comments

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