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"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ

एक 
--------
रात 
होते ही 
"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ 
और मेरे सीने के
ठीक ऊपर 
इक चाँद उग आता है 
अपनी पूरी भव्यता 
और ख़ूबसूरती  के साथ 
जो अपनी चॉँदनी सी किरणे 
बरसाने लगता हैं लगातार 
और -- तब 
मेरे सीने से तमाम लहरें
मेरे दोनों बाँहे बन 
हरहरा कर उठती हैं 
आसमान तक 
उस हंसीं चाँद को अपनी आगोश में भर लेने के लिए 
पर - 
हर बार लहरें हताश हो हो कर लौट आती हैं 
और फिर फिर उठती हैं "चाँद' को छूने 
उधर "चाँद" मेरी बेबसी पर मुस्कुराता है 
रात भर -  और सुबह होते ही 
न जाने किन बादलों के 
या पर्वतों की ओट में 
साँझ फिर मुझे जलाने और चिढ़ाने के लिए 
दो 
---
रात 
होते ही मै 
समंदर में तब्दील हो जाता हूँ 
जिसके अंदर तमाम 
बड़े बड़े घड़ियाल, व्हेल ,और मगरमच्छ 
नज़र आते हैं 
जो अपने जीव को खाते रहते हैं 
और छोटे जीव बिलबिलाते रहते हैं 
इसके अलावा कई बार 
मेरे अंदर का समंदर हरहरा कर सब कुछ बहा ले जाना चाहता है 
और कई बार अपनी लहरों को 
ऊपर ऊपर उछाल कर आसमान के चमकते धमकते सितारों 
को नोच लाना चाहता है 
लेकिन जब वो फ़लक़ तक नहीं पहुंच पाता तो निराश हो कर 
अपने ही साहिल पे अपना सर पटकता है रात भर 
इस बात को भूल कर कि 
उसके ख़ुद के अंदर न जाने कितने हीरे मोती छुपे हुए हैं 
.
मुकेश इलाहाबादी
मौलिक एवम अप्रकाशित 
 

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Comment by Samar kabeer on February 23, 2020 at 7:27pm

जनाब मुकेश श्रीवास्तव जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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