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संस्कृति देश की है प्राचीनतम,

यह कथा गल्प अथवा कहानी नहीं

है ये अविराम थोड़ा लचीली भी है

पर पयस है महज स्वच्छ पानी नहीं

यह पली है सहनशीलता धैर्य में 

ऐसी उद्दाम कोइ रवानी नहीं

हैं उदात्त हम तो ग्रहणशील भी

और अध्यात्म की कोई सानी नही  

    

दूर भौतिक चमक से रहे हम सदा

ऐसी धरती कहीं और धानी नही

दे  गए पूर्वज जो हमें सौंपकर

वैसी अन्यत्र जग में निशानी नहीं

वन्दे मातरम् I     {मौलिक व अप्रकाशित  )  

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Comment by Samar kabeer on February 12, 2020 at 7:48am

जनाब गोपाल नारायण जी आदाब,अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 11, 2020 at 11:57am

ख. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन । सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

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