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ग़ज़ल - आँसू बहाने के लिए

आप आये अब गले हमको लगाने के लिए 

जब न आँखों में बचे आँसू बहाने के लिए 

 

छाँव जब से कम हुई पीपल अकेला हो गया  

अब न जाता पास कोई सिर छुपाने के लिए

 

तितलियाँ उड़ती रहीं करते रहे गुंजन भ्रमर

पुष्प में मकरंद जब तक था लुभाने…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 19, 2019 at 9:26am — 4 Comments

इलाज़  - लघुकथा  -

इलाज़  - लघुकथा  -

मिश्रा जी की उन्नीस वर्षीय मंझली बेटी मोहल्ले की पानी की टंकी पर चढ़ गयी और शोले के वीरू स्टाइल में चिल्ला चिल्ला कर सारा मोहल्ला, मीडिया और पुलिस वालों को एकत्र कर लिया।

मसला यह था कि वह किसी गैर जाति के सहपाठी से विवाह करने को उतावली थी।

हालांकि अभी उसकी बड़ी बहिन भी क्वारी थी।घर वाले उसे समझा चुके थे कि पहले बड़ी बहिन का विवाह हो जाने दे फिर तेरे मामले को देखेंगे।लेकिन वह उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं थी।

अपना पक्ष मजबूत करने के लिये इस प्रकार…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 19, 2019 at 6:30am — 6 Comments

महक

फूल महकते हैं

वे सिर्फ महकते नहीं

अपितु देते हैं एक संदेश

कि अपने भीतर

आप भी भर लें

इतनी महक

कि आपका अस्तित्व ही

बन जाए परिमल

और वह महकाये पूरे विश्व को

बिना किसी यात्रा या भ्रमण के

और खुद दुनिया भर से लोग

आयें तुम्हारे पास

तुम्हारे सुवास से आकर्षित होकर

तुम्हारे परिमल की

एक गंध पाने को

जैसा टूट पड़ते हैं  शलभ

किसी दिए पर

बिना किये अपने प्राणों की परवाह

पर तुम जलाना…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 17, 2019 at 8:00pm — 2 Comments

दुर्मिल सवैया

सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 
----------
जबसे वह जीत चुनाव लिए, तब से नित रौब जमावत हैं | 
उनके चमचे घर आकर के,…
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Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on July 17, 2019 at 7:30pm — 3 Comments

बाढ़ का पानी- लघुकथा

सुबह से हो रही मूसलाधार बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, अब तो दोपहर होने वाली थी. पिछले कई दिनों से बादल छाते तो थे लेकिन बरसने में कंजूसी कर देते थे, मानो इसरार की कामना रखते हों. मौसम पिछले कुछ दिनों की तुलना में काफी अच्छा हो गया था, उमस ख़त्म हो गयी. उसके इलाके में पानी भरने लगा था और आज वह काम पर भी नहीं जा पाया. दुकान में उसका एक दोस्त भी काम करता था, जिसने उसकी नौकरी लगवाई थी, ने मालिक को उसके न आ पाने का बता दिया था.

कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के…

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Added by विनय कुमार on July 17, 2019 at 5:36pm — 4 Comments

बेटी बचाओ बेटी पढाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 

सिर्फ़ एक नारा भर नहीँ है

कुछ करके दिखाना भी है

एक क़दम मैंने बढाया है

एक क़दम तुम भी ढ़ाओ

झिझको मत ठहरो मत

आगे बढो और पढाओ…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 17, 2019 at 5:30pm — 1 Comment

गाड़ी स्टेशन छोड़ रही है

कण-कण, क्षण-क्षण

मिटती घुटती शाम से जुड़ती

स्वयँ को सांझ से पहले समेट रही

विलुप्त होती अवशेष रोशनी

प्रस्थान करते इंजिन के धुएँ-सी ...

दिन की साँस है अब जा रही

 

मृत्यु, अब तू अपना मुखौटा उतार दे

 

हमारे बीच के वह कितने वर्ष

जैसे बीते ही नहीं

कैसी असाधारणता है यह

कैसी है यह अंतिम विदा

मैं तुम्हें याद नहीं कर रहा

तू कहती थी न

“ याद तो तब करते हैं

जब भूले हों किसी को…

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Added by vijay nikore on July 17, 2019 at 4:56pm — 4 Comments

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा पर विशेष

 

गुरु कृपा हो जाए तो सफ़ल सिद्ध हों काम ।

कृपा हनू पर रखते हैं जैसे सियापति  राम॥

 

राम कहें शंकर गुरु ,भोले कहें श्रीराम।

दोनों ही सर्वज्ञ हैं, मैं जाऊं काकै…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 16, 2019 at 4:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल (देते हमें जो ज्ञान का भंडार)

गुरु पूर्णिमा के विशेष अवसर पर:-

बह्र:- 2212*4

देते हमें जो ज्ञान का भंडार वे गुरु हैं सभी,

दुविधाओं का सर से हरें जो भार वे गुरु हैं सभी।

हम आ के भवसागर में हैं असहाय बिन पतवार के,

जो मन की आँखें खोल कर दें पार वे गुरु हैं सभी।

ये सृष्टि क्या है, जन्म क्या है, प्रश्न सारे मौन हैं,

जो इन रहस्यों से करें निस्तार वे गुरु हैं सभी।

छंदों का सौष्ठव, काव्य के रस का न मन में भान…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 16, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

.

पूछिये मत कि हादसा क्या है ।

पूछिये दिल मेरा बचा क्या है।।

दरमियाँ इश्क़ मसअला क्या है।

तेरी उल्फ़त का फ़लसफ़ा क्या है

सारी बस्ती तबाह है तुझसे ।

हुस्न तेरी बता रजा क्या है ।।

आसरा तोड़ शान से लेकिन ।

तू बता दे कि फायदा क्या है ।।

रिन्द के होश उड़ गए कैसे ।

रुख से चिलमन तेरा हटा क्या है।।

बारहा पूछिये न दर्दो गम ।

हाले दिल आपसे छुपा क्या है ।।



फूँक कर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 16, 2019 at 12:00am — 2 Comments

ग़ज़ल: हर शख़्स ही लगा हमें तन्हा है रात को

२२१ २१२१ १२२१ २१२

चंदा मेरी तलाश में निकला है रात को!

शायद वो मेरी चाह में भटका है रात को !!

 

होती है उम्र उतनी ही जितनी कि है लिखी!

जलता दिया भी देखिये बुझता है रात को!!

 

आँखों के डोरे कर रहे सब कुछ बयां यहाँ!

लगता है तेरा ख्वाब भी उलझा है रात को!!

 

दुनिया की भीड़ में मेरा दिन तो गुज़र गया!

हर शख्स ही लगा हमें तनहा है रात को!!

 

बदनामियों के डर से ही हम तो सिहर गए!

हर ख्वाब जैसे अपना …

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Added by Abha saxena Doonwi on July 15, 2019 at 10:00pm — 3 Comments

अहसास .. कुछ क्षणिकाएं

अहसास .. कुछ क्षणिकाएं

छुप गया दर्द

आँखों के मुखौटों में

मुखौटे

सिर्फ चेहरे पर

नहीं हुआ करते

.............................

छील गया

उल्फ़त की चुभन को

एक रेशमी खंजर

चुपके से

...........................

झील की आगोश में

चाँद की

चाँद संग सरगोशियाँ

कर गई बेनकाब

सह्र की

पहली किरण

........................

बन जाती

घास पर

ओस की बूँद

रोता है

जब चाँद

आसमान…

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Added by Sushil Sarna on July 15, 2019 at 6:53pm — 6 Comments

उसने इतना कह मुझे मेरी ग़लतियों को रख दिया (ग़जल)

बहर.

2122-2122-2122-212

एक दिन उसने मेरी खामोशियों को रख दिया ।।

मेरे पेश-ए-आईने मे'री' हिचकियों को रख दिया ।।

तोड़ बंदिश हिज्र -ए-दिल ख़ुल कर युँ रोया इक दफा।

उसने दिल के सामने जब चिट्ठियों को रख दिया ।।

खन्न की आवाज ले सिक्का छुआ कांसे को जब।

भूख ने नजरें उठाई सिसकियों को रख दिया ।।

जब कभी मेरा वजू अन्धा हुआ इस भीड़ में ।

माँ ने अपनी आस के रौशन दियों को रख दिया ।।

गर कभी मायूस हो मन देख कर छत घास…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on July 14, 2019 at 6:37pm — 2 Comments

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,

गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,

वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,

उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,

वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे,बताए ज़रा,

जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,

पुरानी…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 14, 2019 at 3:30pm — 5 Comments

आज फिर ...

आज फिर ... क्या हुआ

थरथरा रहा

दुखात्मक भावों का

तकलीफ़ भरा, गंभीर

भयानक चेहरा

आज फिर

दुख के आरोह-अवरोह की

अंधेरी खोह से

गहरी शिकायतें लिए

गहराया आसमान

आज फिर 

ढलते सूरज ने संवलाई लाली में रंगी

कुछ खोती कुछ ढूँढ्ती

एक और मटमैली

उलझी-सी शाम

आज फिर

सिमटी हुई कुछ डरी-डरी

उदास लटकती शाम

डूबने को है ...

डूबने दो 

मन में…

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Added by vijay nikore on July 14, 2019 at 2:27pm — 18 Comments

दो ग़ज़लें (2122-1212-22)

1.

शमअ  देखी न रोशनी देखी । 

मैने ता उम्र तीरगी देखी । 

देखा जो आइना तो आंखों में, 

ख़्वाब की लाश तैरती देखी । 

टूटे दिल का हटाया मलबा तो, 

आरज़ू इक दबी पड़ी देखी । 

एक इक पल डरावना सा लगा, 

इतने पास आ के ज़िन्दगी देखी । 

मैने इंसानियत रह ए हक़ पर, 

दो कदम चल के हांफती देखी 

2.

आप ने क्या कभी परी देखी । 

मैने यारो अभी अभी देखी । 

उसकी आँखों में सुब्ह सी…

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Added by Gurpreet Singh jammu on July 14, 2019 at 12:30pm — 7 Comments

आई थी सूचना गाँव में

बीते मास तेहरवीं तारीख़
तीन बजे अपरान्ह में
आई थी सूचना गाँव में
कि गाँव का होरी जो दिवाली पर आने को था
अब कभी…
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Added by amita tiwari on July 13, 2019 at 1:00am — 2 Comments

दूरदृष्टि -  लघुकथा  -

दूरदृष्टि -  लघुकथा  -

"क्या हुआ अंशू, देख आया लड़की, कैसी लगी?"

"माँ, मुझे नहीं जमी |मैंने इसीलिये आप से भी साथ चलने को कहा था पर आपने तो टका सा जवाब दे दिया कि शादी तो तुझे ही करनी है| आखिरी फ़ैसला तो तेरा ही होगा, फिर मुझे इस बुढ़ापे में क्यों तंग कर रहा है?"

"पर जब तूने सबके  फोटो और बायोडेटा देखे थे  तो सबसे अधिक इसे ही प्राथमिकता दी थी|"

"हाँ माँ, उस हिसाब से तो वह अब भी सबसे बेहतर है।"

"अब उन्हें क्या जवाब देकर आया है?।"

"मैंने उन्हें बोला कि माँ…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 12, 2019 at 3:15pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

दुश्मनी हमसे  निकाली  जाएगी ।

बेसबब इज्ज़त उछाली जाएगी ।।

नौकरी मत  ढूढ़  तू इस मुल्क में ।

अब तेरे हिस्से की थाली जाएगी ।।

लग रहा है अब रकीबों के लिए ।

आशिकी साँचे में ढाली जाएगी ।।

चाहतें   अब  क्या  सताएंगी   उसे ।

जब कोई ख़्वाहिश न पाली जाएगी ।।…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on July 11, 2019 at 12:12am — 4 Comments

मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ-----ग़ज़ल

122 122 122 12

मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ
सुकूँ यूँ चुरातीं ग़लत फहमियाँ

किसी रिश्ते के दरमियाँ आएँ तो
महब्बत जलातीं ग़लत फहमियाँ

जहाँ तक भी हो इससे बच के रहो
तबाही मचातीं ग़लत फहमियाँ

अगर गर्व हावी हुआ शक्ति पे
ग़लत पथ धरातीं ग़लत फहमियाँ

उन्हें सच से जिसने न पोषित किया
उन्हीं को चबातीं ग़लत फहमियाँ

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 10, 2019 at 10:11pm — 4 Comments

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