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सांस भर की ज़िंदगी ...

सांस भर की ज़िंदगी ...

वक़्त के साथ

हर शै अपना रूप

बदलती है

धूप ढलती है तो

छाया भी बदलती है

वक़्त के साथ

मोहब्बत की चांदी

केश वन में

चमकने लगी

उम्र की पगडंडियां

झुर्रियों में झलकने लगीं

वक़्त के साथ

यौवन का दम्भ

लाठी का मोहताज़ हो गया

दर्पण

आँख से नाराज़ हो गया

अनुराग

दर्द का राग हो गया

हदें

निगाहों से रूठ गयी

नफ़स

छटपटाई बहुत

आखिर

थककर टूट गयी…

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Added by Sushil Sarna on December 27, 2017 at 6:37pm — 18 Comments

ग़ज़ल - अक्सर खुद से खुद ही लड़ कर, खुद से खुद ही हारे हम - अजय तिवारी

फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ा

 22      22      22       22     22      22      22      2  

अक्सर खुद से खुद ही लड़ कर, खुद से खुद ही हारे हम

और किसी  से  शिकवा कैसा, अपने हाथ  के मारे हम

 

हम अपनी पर आ जाते तो, दुनिया बदल भी सकते थे

लेकिन थी कोई बात कि जिससे, बन के रहे बेचारे हम

तन्हाई ने कर डाला है,  जिस्म को अब  मिट्टी का ढेर 

साथ तेरे  चाहा था  मिल कर,  छूते  चाँद-सितारे …

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Added by Ajay Tiwari on December 27, 2017 at 2:12pm — 26 Comments

ग़ज़ल (यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन)

यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है |

मुझ से उस शोख़ ने बे लौस मुहब्बत की है |

दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना

मैं ने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है |

मुझ से उम्मीद वफ़ा की है उसी को यारो

उम्र भर जिसने मेरे साथ अदावत की है |

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको

हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

सोच लेना वो कोई ग़ैर नहीं अपने हैं

तुमने…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 27, 2017 at 2:00pm — 24 Comments

गुस्सा(लघु कथा)


-बस जरा बर्त्तन पटक देती हूँ,वे समझ जाते हैं।
-कि तू गुस्से में है?
-और क्या?
-तू भी न।
-तू भी क्या री?रातभर जगाते हैं।बर्त्तन मेरे,सुबह मेरी।
-पर मेरा काम तो इस तरह पटकने-झटकने से नहीं चलता है न।
-क्यूँ?
-वो सुन नहीं सकते री।
-तो फिर?
-क्या करूँ,मुझे तो बेलन ही भाँजना पड़ता है।
-धत्त तेरी!
 "मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on December 27, 2017 at 10:04am — 12 Comments

ग़ज़ल - झूठ का इश्तहार खूब चला

बह्र - फाइलातुन मफाइलुन फैलुन

झूठ का इश्तहार खूब चला।
इस तरह कारोबार खूब चला।

कोने कोने में मुल्क के साहब,
आप का ऐतबार खूब चला।

गाँव तो गाँव हैं नगर में भी,
रात भर अंधकार खूब चला।

जो हक़ीक़त से दूर था काफी,
वो भी तो बार बार खूब चला।

नोट में दाग थे बहुत लेकिन,
नोट वो दाग़दार खूब चला।

सबने देखा है किस अदा के साथ,
बेवफा तेरा प्यार खूब चला।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Ram Awadh VIshwakarma on December 26, 2017 at 10:14pm — 20 Comments

ग़ज़ल : अब दवाओं का नहीं मुझ पे असर होने को है

अरकान : 2122 2122 2122 212

एक तरफ़ा इश्क़ मेरा बेअसर होने को है

ख़त्म यानी ज़िन्दगी का ये सफ़र होने को है

कहने को तो सर पे सूरज आ गया है दोस्तो

ज़िन्दगी में पर हमारी कब सहर होने को है

हर किसी ने हाथ में पत्थर उठाये देखिये

और फिर उनका निशाना मेरा सर होने को है

आपको चाहा था मैंने बेतहाशा टूट कर

अब यही तकलीफ़ मुझको उम्र भर होने को है

करना है कुछ आपको तो बस दुआएँ कीजिए

अब दवाओं का कहाँ मुझ पे असर होने को…

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Added by Mahendra Kumar on December 26, 2017 at 10:00pm — 18 Comments

बरवै छंद के जन्मदाता - एक जानकारी

 हिन्दी साहित्य में ‘बरवै’ एक विख्यात छंद है . इस छंद के प्रणेता सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' माने जाते हैं . कहा जाता है कि रहीम का कोई दास अवकाश लेकर विवाह करने गया.  वह  जब वापस आया  तो  उसकी विरहाकुल नवोढा ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर उसे दीं-

नेह-छेह  का  बिरवा  चल्यो  लगाय  I      

सींचन की सुधि लीजो मुरझि न जायII  

रहीम के साहित्य-प्रेम से तो सभी परिचित थे . अतः उस दास ने  ये पंक्तियाँ रहीम…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2017 at 9:00pm — 6 Comments

नदी के ऊपर का पुल (लघुकथा)

नदी के ऊपर का पुल पुल पर से रात और दिन गाड़ियों की आवाजाही को देख उसके नीचे बहती हुई नदी ने पूछा ," तुमको परेशानी नहीं होती ! दिन भर बजन लदा रहता है तुमपर । " " अरी पागल ! ये भी कोई बात है भला , अब लोग मुझपर से गाडी नहीं ले जायेंगे तो तुझे पार कैसे करेंगे।" पुल की इस बात पर नदी हँस पड़ी। पुल ने पूछा ," इसमें हँसने की क्या बात है। तुम वर्षों से यहाँ से बहती आई हो, तुम्हारा पाट भी विशाल है और प्रवाह भी। पर सच कहूँ तो कभी कभी मुझे डर लगता है तुमसे।" " डर और मुझसे!वो क्यों भला?" " जब बाढ़ की स्थिति…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 26, 2017 at 8:23pm — 3 Comments

स्मार्ट (लघुकथा)राहिला

"हैलो.., गुड मॉर्निंग मैडम!"

"गुड मॉर्निंग, कौन बोल रहे हैं?"

"मैडम ! हम एस बी आई से बोल रहे हैं।

मैडम ! आपका एटीएम ब्लॉक होने वाला है, यदि आप चाहती हैं कि आपका एटीएम यथावत चालू रहे, तो आप अपने एटीएम का नम्बर वेरिफाई करवाएं।"

"ये आप क्या कह रहे हैं?"

"घबराइए नहीं मैडम ! यदि आप इस असुविधा से बचना चाहिती हैं तो अपना  एटीएम नम्बर बतलायें।"

"भाई साहब! नम्बर तो मैं बता दूं, लेकिन थोड़ी देर बाद कॉल कीजियेगा ।पहले जरा इनकी खबर ले लूं इनकी हिम्मत कैसे हुई मेरा…

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Added by Rahila on December 26, 2017 at 3:30pm — 11 Comments

ख़ुद से ये शर्मशार सा क्यों है (ग़ज़ल)

अरकान-: 2122  1212  22

ख़ुद से ये शर्मसार सा क्यों है

आदमी बेक़रार सा क्यों है 

मेरे दिल ने सवाल ये पूछा,

नेता हर इक गंवार सा क्यों है

आने वाले नहीं हैं अच्छे दिन,

फिर हमें इन्तिज़ार सा क्यों है

मैंने कुछ भी नहीं छुपाया फिर

तुझमें ये इंतिशार सा क्यों है 

मैंने जब माँग ली मुआफ़ी,फिर

उनके दिल में ग़ुबार सा क्यों है 

उसकी फ़ितरत से ख़ूब वाक़िफ़ हैं,

'फिर हमें एतिबार सा…

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Added by नाथ सोनांचली on December 26, 2017 at 1:47pm — 21 Comments

ग़ज़ल -- "इसके आगे बस ख़ुदा का नाम है" / दिनेश कुमार

2122--2122--212

भाग्य तेरे कर्म का परिणाम है

तुझ पे ही निर्भर तेरा अंजाम है

मेरे हमराही को भी ठोकर लगी

मेरे दिल को अब ज़रा आराम है

सिर्फ़ सच की राह पर चलता हूँ मैं

आबला-पाई मेरा इनआ'म है

उसकी मर्ज़ी है अता कुछ भी करे

बस दुआ करना हमारा काम है

शख़्सियत अपनी निखारो मुफ़्त में

मुस्कुराहट का न कोई दाम है

हम फ़क़ीरों की नज़र से देखिये

जिस्म इक मन्दिर है पावन धाम है

हम यथा सम्भव मदद सब की करें

आदमीयत का यही पैग़ाम…

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Added by दिनेश कुमार on December 26, 2017 at 6:46am — 18 Comments

अभी दिल की गिरफ्तारी से बचिए

1222 1222 122

हरम में अब समझदारी से बचिए ।

हसीनों की नशातारी से बचिए ।।

अगर ख्वाहिश जरा सी है सुकूँ की ।

रकीबों की वफादारी से बचिए ।।

यहाँ दुश्मन से कब खतरा हुआ है ।

यहाँ अपनों की गद्दारी से बचिए ।।



नियत सबकी बड़ी खोटी दिखी है ।

नगर में आप मुख्तारी से बचिए ।।



रहेगी आपकी भी शान जिंदा ।

जरूरत है कि बेकारी से बचिए ।।



है करके कुछ दिखाने की तमन्ना ।

तो पहले…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 26, 2017 at 2:00am — 8 Comments

नामुमकिन (लघु कथा )

‘सर—---सर---‘, उसने हकलाते हुए कहा –‘सर, मेरे पास जवान, सुन्दर और हसीन लड़कियों की कोई कमी नहीं है. आप उनमे से किसी को चुन लें, पर भगवान् के लिए इस लडकी को छोड़ दें’- उसने बॉस से गिडगिडाते हुए कहा .

‘अच्छा !-----मगर इस लडकी में ऐसा क्या है जो तुम इस पर इतना मेहरबान हो ?’

‘दरअसल------दरअसल -----‘ उससे कहते न बना .

‘अरे बिदास कहो. हमसे क्या डरना ?’

‘सर, वह मेरी बेटी है‘ उसका हलक सूख गया . बॉस की आँखों में विस्मय भरी चमक आयी –‘ अरे ! तब तो यह नामुमकिन है कि हम इस जवान…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2017 at 8:58pm — 7 Comments

पीठ के नीचे ..

पीठ के नीचे ..

बेघरों के

घर भी हुआ करते हैं

वहां सोते हैं

जहां शज़र हुआ करते हैं

पीठ के नीचे

अक्सर

पत्थर हुआ करते हैं

ज़िंदगी के रेंगते सफ़र हुआ करते हैं

बेघरों के भी

घर हुआ करते हैं

भोर

मजदूरी का पैग़ाम लाती हैं

मिल जाती है मजदूरी

तो पेट आराम पाता है

वरना रोज की तरह

एक व्रत और हो जाता है

बहला फुसला के

पेट को मनाते हैं

तारों को गिनते हैं

ख़्वाबों में सो जाते हैं

मज़दूर हैं…

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Added by Sushil Sarna on December 25, 2017 at 7:00pm — 6 Comments

इक शाम दे दो ..

इक शाम दे दो ...

तन्हाई के आलम में

न जाने कौन

मेरे अफ़सुर्दा से लम्हों को

अपनी यादों की आंच से

रोशन कर जाता है

लम्हों के कारवाँ

तेरी यादों की तपिश से

लावा बन

आँखों से पिघलने लगते हैं

किसी के लम्स

मेरी रूह को

झिंझोड़ देते हैं

अँधेरे

जुगनुओं के लिए

रस्ते छोड़ देते हैं

तुम अरसे से

मेरे ज़ह्न में पोशीदा

इक ख़्वाब हो

मेरे सुलगते जज़्बात का

जवाब हो

अब सिवा तेरी आहटों के…

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Added by Sushil Sarna on December 25, 2017 at 6:30pm — 6 Comments

मत्त सवैया छंद

16,16 पर यति,चार पद, दो-दो पद समतुकांत

बढ़ती जाती है आबादी,रोजगार की मजबूरी है

पैसे की खातिर देख बढ़ी,किस-किस से किसकी दूरी है

उस बड़े शहर में जा बैठे, घर जहाँ बहुत ही छोटे हैं

विचार महीन उन लोगों के, जो दिखते तन के मोटे हैं

पहले गाँवों में बसते थे,घर आँगन मन था खुला-खुला

थोड़े में भी खुश रहते थे,हर इक विपदा को सभी भुला

कोई कठिनाई अड़ी नहीं,मिल उसका नाम मिटाते थे

जो रूखा-सूखा होता था,सब साथ बाँट कर खाते थे

तब धमा चौकड़ी होती…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 25, 2017 at 2:21pm — 12 Comments

क्षणिकाएँ

1.

शायद आज बच जाओ

साम दाम दण्ड भेद से

मगर एक कैमरा

नज़र रखे है

हर करतूत पर

बिना साम दाम दण्ड भेद के .....

 

2.

मत उलझाइये खेल

मत कीजिये घाल-मेल

सीधी है ... सीधी ही रहने दीजिये

जिंदगी की रेल

 

3.

उठ रहे हैं बच्चे

सूरज के जागने से पहले

ठिठुर रहे हैं बच्चे

पीठ में बोझ लिए

झेल रह हैं बच्चे

भविष्य का दण्ड…

Continue

Added by नादिर ख़ान on December 25, 2017 at 1:30pm — 10 Comments

डिग्री

कार्यकर्त्ता:मंत्रीजी से मिलना है।
पीए:नहीं मिल सकते।
कार्यकर्त्ता:क्यूँ?
पीए:माननीय अभी (......से ) बेगुनाही का प्रमाण पत्र खरीदने गये हैं।
का.:क्या?
पीए:अरे विरिधियों ने घोटाले में फँसा दिया है न।
का.:अच्छा्! तो डिग्री का मामला है।
"मौलिक      व  अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on December 25, 2017 at 12:47pm — 8 Comments

चलो ये मान लेते हैं... (ग़ज़ल)- बलराम धाकड़

1222, 1222, 1222, 1222

चलो ये मान लेते हैं कि दफ़्तर तक पहुँचती है।

मगर क्या वाकई ये डाक, अफ़सर तक पहुँचती है।

नज़र मेरी सितारों के बराबर तक पहुँचती है।

दिया हूँ, रोशनी मेरी हर इक घर तक पहुँचती है।

वहां कैसा नज़ारा है, चलो देखें, ज़रा सोचें,

नज़र सैयाद की चींटी के अब पर तक पहुँचती है।

शरीफ़ों की हवेली में ये आहें गूँजती तो हैं,

ज़रा धीरे भरो सिसकी, ये बाहर तक पहुँचती है।

किसी से भी पता पूछा नहीं उसने कभी…

Continue

Added by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 11:07am — 18 Comments

आउट ऑफ़ कवरेज़

आउट ऑफ़ कवरेज़

साथ-साथ बैठे हैं और दूर कहीं इंगेज हैं

4जी के दौर में घर आउट ऑफ़ कवरेज़ है |

लाइक है पॉक है ट्रेल है जोक् है ना कोई रोक है

बैठे-बैठे सारी दुनिया मुट्ठी में कर लेने का क्रेज़ है |

अंधी दौड़ है या भेड़ो का दौर है किसे किसका गौर है

अस्मिता की लड़ाई ना मालूम कौन रियल कौन फ़ेक है |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on December 24, 2017 at 10:15pm — 5 Comments

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