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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-७०

विश्वास के सतूने जब कमज़ोर होते हैं तो आस्था का शामियाना गिर ही जाता

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हमारे घर का एक कोना फिर से पूजा स्थल के रूप में तब्दील हो गया और मेरी पत्नी ने एक निस्सहाय धर्म-केन्द्रित याचिका का रूप ले लिया. घर की मुश्किलात जैसे जैसे बढ़ती गईं, वैसे वैसे पत्नी की आध्यात्मिकता ने धार्मिक आचरणों, अर्चनाओं, उपवासों इत्यादि का रुख कर लिया. भविष्य वाचकों की भविष्यवानियाँ सुनी जाने लगीं और ग्रह…

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Added by राज़ नवादवी on September 23, 2017 at 5:30pm — 4 Comments

कुर्सी

गुफा

से निकले हुए लोगों ने

'कुर्सी' बनाई,

अपने राजा के लिए

ज़मीन पर बैठे - बैठे

राजा कुर्सी पर बैठा है शान से

कुर्सी बनाने वाले ज़मीन पर

सबसे पहली कुर्सी 'पत्थर' की थी

फिर इंसान ने लकड़ी की कुर्सी बनाई

बाद में सोने ,चाँदी ,हीरे, जवाहरात की भी....

इतिहास में तो कई बार नरमुंडों की भी कुर्सियां बनाई गयी

और फिर उस पर बैठ के 'राजा' बहुत खुश हुआ...

कुर्सी बनाई गयी थी

इस उम्मीद में कि इस पर बैठा हुआ

राजा राज्य में

सुख शांति…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 23, 2017 at 3:06pm — 5 Comments

हौसला ( लघुकथा -जानकी बिष्ट वाही )

गोधूलि बेला में भी जब वह नौजवान उस चट्टान से नहीं उठा तो तो मेरा मन आशंकित हो उठा।साँझ तेजी से कालिमा के आगोश में समा रही थी और सागर की उत्ताल लहरें पागलों की तरह उस नौजवान के पाँवों से कुछ नीचे चट्टानों पर अपना सिर पटक रही थीं।

जब भी मैं कभी उदास या खुश होता हूँ तो यहाँ आकर सागर को निहारना मुझे सुक़ून देता है।



अब मैं घर जाना चाहता है पर उस नौजवान की भावभँगिमा मेरे पाँवों की बेड़ी बन मुझे रोक रही है।



"छोड़ो ,मुझे क्या? होगा कोई ? मैंने क्या सारी दुनिया का ठेका ले रखा… Continue

Added by Janki wahie on September 23, 2017 at 1:19pm — 18 Comments

ग़ज़ल --पाक आतंकी कभी बाज़ आएँ क्या

काफिया : आएँ , रदीफ़: क्या 

२१२२  २१२२  २१२

पाक आतंकी कभी बाज़ आएँ क्या

बारहा दुश्मन से’ धोखा खाएँ क्या ?

गोलियाँ खाते ज़माने  हो गये 

राइफल बन्दुक से’ हम घबराएँ क्या ?

जान न्योछावर शहीदों ने की’ जब

सरहदों को हम मिटाते जाएँ क्या ?

सर्जिकल तो फिल्म की झलकी ही’ थी

फिल्म पूरा अब मियाँ दिखलाएँ क्या ?

आपका विश्वास अब मुझ पर नहीं

अनकही बातें जो’ हैं बतलाएँ क्या ?

खो दिया…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 23, 2017 at 9:53am — 7 Comments

ग़ज़ल (2)

२२ २२ २२ २२ २२ २



आओगे जब भी तुम मेरे ख्वाबों में

उन लम्हो को रख लूँगी मैं यादों में



और नही कुछ चाहूँ तुमसे मेरी जां

दम टूटे मेरा बस तेरी बाहों में

मेरा जीवन इस गुलशन के फूलों जैसा

घिरा हुआ है मगर बहुत से काँटों में



तुमको में रूदाद सुनाऊं क्या अपनी

मेरा हर लम्हा बीता है आहों में



देख रही हो मुझको तुम जैसे "रौनक"

जी चाहे मैं डूब मरूँ इन आँखों में







मौलिक एवं…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2017 at 9:30am — 24 Comments

ग़ज़ल -- कीचड़ के आस पास में देखा कवँल गया

*221 2121 1221 212*



सारा चमन गुलाब था अश्कों में ढल गया ।

था बारिशों का दौर समंदर मचल गया ।।



रुसवाईयां तमाम थीं दिल में मलाल थे ।

देखा जो हुस्न आपका पत्थर पिघल गया ।।



खुशबू बनी हुई है अभी तक दयार में ।

महबूब मेरा ख्वाब में आकर टहल गया ।।



कैसा नशा था इश्क़ में मदहोशियों के बीच ।

जो भी थे दफ़्न राज़ वो पल में उगल गया।।



जब मैं जला तो लोग बहुत जश्न में मिले ।

जैसे किसी नसीब का सिक्का उछल गया ।।



कहता था है ये आग… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 2:00am — 4 Comments

कुछ खूबसूरत पल--लघुकथा

अब से मैं पूरा ध्यान रखूंगी मुकुल का, बहुत परेशान हो जाते हैं आजकल, उसके दिमाग में पूरे दिन यही घूम रहा था| जब से बेटी पैदा हुई थी, उसे एकदम व्यस्त रख रही थी, समय तो जैसे पंख लगा कर उड़ जाता था| बेचारे मुकुल खुद ही सब कुछ करते रहते थे, कभी कुछ कहते नहीं थे लेकिन उसे तकलीफ होती थी| आखिर कभी भी मुकुल को कुछ करने जो नहीं दिया था उसने|

"कपडे आयरन नही हैं, ओह फिर याद नहीं रहा", कहते हुए आज सुबह जब मुकुल ने सिकुड़े कपडे पहने तो उसे थोड़ी खीझ हुई| जल्दी से उसने नाश्ता निकालने का सोचा तभी बच्ची…

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Added by विनय कुमार on September 23, 2017 at 12:00am — 10 Comments

सम्भावना के द्वार पर

सम्भावना के द्वार पर दस्तक हुई है

देखकर मुझको हुई वह छुईमुई है

देखता ही रह गया विस्मित चकित सा

रंग, रस, मद से भरी वह सुरमई है

रम्य मौसम, रम्य ही वातावरण ये 

सुनहली इस साँझ की सज धज नई है

प्रेम की पलपल उमड़ती भावना पर

वर्जनाओं की सतत् चुभती सुई है

तरलता बांधी गयी, कुचली गयी हैं कोपलें

क्रूरता द्वारा सदा सारी हदें लांघी गयी हैं

क्रूरता सहनें को तत्पर, वर्जना मानें ना मन

प्यार का अदभुत् असर हम पर हुआ कुछ जादुई है…

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Added by नन्दकिशोर दुबे on September 22, 2017 at 11:30pm — 4 Comments

आंसू की गाथा

कुछ जाना कुछ अनजाना-सा लगता है
कुछ भूला कुछ पहचाना-सा लगता है

दर्पण में प्रतिबिम्बित अपना ही मुखड़ा
कुछ अपना कुछ बेगाना -सा लगता है

मुझ-सम लाखो लोग यहां पर बसते है
हर कोई बस दीवाना-सा लगता है

जीवन तो बस वाल्मीकि की वाणी मे
आंसू की गाथा गाना-सा लगता है !

.
मौलिक व अप्रकाशित  ---नन्दकिशोर दुबे

Added by नन्दकिशोर दुबे on September 22, 2017 at 11:00pm — 2 Comments

सरसी छंद -

1-

जब से जीवन में आया है, साथी तेरा प्यार।

तब से शीतल और सुगंधित,चलने लगी बयार।।

उठने लगा ज्वार नस-नस में, आभासित मधुमास।

प्रिय मैं तो धनवान हो गया, तुम हो मेरे पास।।

2-

आँखों ही आँखों में अलिखित, जब हो गया करार।

ख्वाब हकीकत होते देखा, मैंने पहली बार।।

पंख लगे मेरी खुशियों को, रहा न पारावार।

आसमान में उड़ा ले गया, साथी तेरा प्यार।।

3-

जीवन की अनजान डगर पर, कदम बढ़ाए साथ।

हम दोंनों ने थाम लिथा था, इक दूजे का हाथ।।

कभी-कभी संघर्षों… Continue

Added by Hariom Shrivastava on September 22, 2017 at 7:05pm — 4 Comments

और सुना, क्या हाल-चाल है

एक नवगीत 

दूर बैठ कर पूछें दद्दा,

और सुना, क्या हाल-चाल है.

कैसे कह दूं, ठीक-ठाक सब,

मस्त हमारी चाल-ढाल है  

 

तोड़ रहे हैं सभी आजकल,

अपना नाता गाँधी से.

सपनों की कंदीलें उनकी,

बचा रहा हूँ आँधी से.…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 22, 2017 at 5:02pm — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पशेमान सूरज पिघलने लगा(ग़ज़ल राज )

122 122 122 12

अना का जो खुर्शीद ढलने लगा

क़मर हसरतों का निकलने लगा

हटे मकड़ियों के वो जाले सभी

मेरा खस्ता घर भी सँभलने लगा

मुहब्बत का छोटा सा दीपक मेरा

ग़मों का अँधेरा निगलने लगा

मेरे आंसुओं की बनी झील में

पशेमान सूरज पिघलने लगा

चमन पर हुआ अब्र ज्यों महरबां

खजाँ का तभी रुख़ बदलने लगा

खुदा का करम चार हाथों से ये

सफीना मेरा आज चलने…

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Added by rajesh kumari on September 22, 2017 at 2:46pm — 6 Comments

रसाला छंद एक प्रयास – (भ न ज भ ज ज ल)

जीवन विषम अबोध , जानकर ना डर मानव |

प्राप्त प्रथम कर ज्ञान, ज्ञान बिन पार न हो भव ||

अंतर तल अँधियार , दूर कर रोशन हो मग |

हो जगमग हर पंथ , पंथ अति रोशन हो जग ||

 

श्रेष्ठ जटिल हर कर्म, है मनुज उन्नति दायक |

भूल बिसर मत कृत्य, सत्य हर भूपति नायक ||

भूमि सतह पर स्वर्ग, कर्म बिन हो कब संभव |

जीवन पथ पर कर्म , धर्म सम भूल न मानव ||

 

मानव परहित कार्य , हैं न बस दाहकता दुख |

कष्ट सहन कर लाख, एक यदि जीवन का सुख…

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Added by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2017 at 1:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल - बेसबब यूँ ही नही परदा करो

2122 2122 212

इस तरह बे फिक्र मत निकला करो ।

कुछ ज़माने को भी अब समझा करो।।



लोग पलकें हैं बिछाए राह में ।

बेसबब यूँ ही नहीं परदा करो ।।



है मुहब्बत से सभी की दुश्मनी।

ज़ालिमों से मत कभी उलझा करो ।।



फिर सितारे टूटकर गिरते मिले ।

आसमा पर भी नज़र रक्खा करो ।।



कुछ परिंदे हो गए बेख़ौफ़ हैं ।

कौन कैसा उड़ रहा देखा करो ।।



दाग दामन पर लगे कितने यहां ।

आइनो से भी कभी पूछा करो ।।



वक्तपर अक्सर मुकर जाते हैं लोग… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 22, 2017 at 8:38am — 1 Comment

समझ-- लघुकथा

जैसे ही वह ऑफिस से लौटी एक बार फिर वही नज़ारा उसके आँखों के सामने था| कितना भी समझा ले, न तो बेटा समझता था और न ही बाप, दोनों अपने आप को ही समझदार मानते थे| उसके घर में घुसते ही कुछ पल के लिए दोनों खामोश हो गए और उसकी तरफ फीकी मुस्कान फेंकते हुए देखने लगे|

"कब समझोगे तुम विक्की, मान क्यों नहीं लेते कि वह तुमसे ज्यादा समझते हैं| आखिर पिता हैं तुम्हारे, तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है उन्होंने", कहते हुए बैग उसने टेबल पर रखा और सोफे पर अधलेटी हो गयी| राजन ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, अक्सर…

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Added by विनय कुमार on September 21, 2017 at 5:00pm — 4 Comments

ज़िद कर रही हूँ ...

ज़िद कर रही हूँ ...

जानती हूँ

हर नसीब में

हर शै

नहीं हुआ करती

फिर भी

मैं असंभव को

संभव करने की

ज़िद कर रही हूँ

कुछ और नहीं

बस

उम्र के हर पड़ाव पर

सिर्फ

प्यार करने की

ज़िद कर रही हूँ

मैं नहीं जानती

सात जन्म क्या होते हैं

पर उम्र की उस अवस्था पर

जब सब ख्वाहिशें

दम तोड़ देती हैं

चाहती हूँ

तब भी तुम

किसी मठ के

सन्यासी सी एकाग्रता लिए

मुझ से प्यार करने चले आना…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 21, 2017 at 3:10pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ख़्वाब तूने कोई बुना होगा

2122 1212 22/112

ख़्वाब तूने कोई बुना होगा

तब तेरा रतजगा हुआ होगा

 

सर यक़ीनन मेरा झुकेगा जनाब

आपसे जब भी सामना होगा

 

मुद्दतों बाद मेरी याद आई

मुश्किलों से कहीं घिरा होगा

 

मुझको मेहनत लगी थी लिखने में

उसको एहसास इसका क्या होगा

 

शहर में होना आरज़ी है मगर

तज़्किरा मेरा बारहा होगा

 

आरज़ी – थोड़े समय के लिए, तज़्किरा – जिक्र

 

-मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2017 at 11:24am — 6 Comments

खोया रहता हूँ मैं जिनकी यादों में - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 2

............................

खोया रहता हूँ मैं जिनकी यादों में

उनकी  ही खुशबू है मेरी साँसों में

.

दिल के हाथों था मजबूर बहुत वरना

आता कब  मैं  उनकी मीठी बातों में

.

उनको खो देने का भी अहसास हुआ

रंग-ए-हिना जब देखा उनके हाथों में

.

खो कर दुनिया आख़िर उनको पाया है

यूँ  ही  नहीं  है नाम मेरा अफसानों में

.

हर शय में उनका ही चेहरा दिखता है

उनके  ही  सपने  हैं मे री  आँखों …

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on September 21, 2017 at 8:30am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
भले ही आईने धोये हुए हैं (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२

चढ़े सूरज तलक सोए हुए हैं

किसी की याद में खोए हुए हैं

 

ग़ज़ल लिक्खी हुई है आंसुओं से

कहें किससे कि हम रोये हुए हैं

 

तभी भीगा हुआ तकिया मिला है

इसे अश्कों से हम धोये  हुए हैं

 

कमर टूटी ज़फ़ा की चोट खाकर 

मगर फिर भी वफ़ा ढोए हुए हैं

 

वहाँ चर्चा हमारा हो रहा है

न जाने हम कहाँ खोए हुए हैं

 

तुम्हारे दाग ज्यों के त्यों दिखेंगे

भले ही  आईने धोए हुए…

Continue

Added by rajesh kumari on September 20, 2017 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल

काफिया : आये ; रदीफ़ :न बने

बहर : ११२२-| ११२२  ११२२  २२/११२

      २१२२}

तंज़ सुनना तो’ विवशता है’, सुनाये न बने

दर्द दिल का न दिखे और दिखाए न बने | 

पाक से हम करे’ क्या बात बिना कुछ मतलब  

क्यों करे श्रम जहाँ’ की बात बनाए न बने |

क्या कहूँ उनके’ हुनर की, है’ अनोखा अनजान

यही’ तारीफ़ कि हमको न सताए न बने |

कर्म इंसान का’ हो ठीक सितारा जैसा

कर्म काला किया’ तो चेहरा’ दिखाए न बने…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 20, 2017 at 8:10am — 13 Comments

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