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गुफा
से निकले हुए लोगों ने
'कुर्सी' बनाई,
अपने राजा के लिए
ज़मीन पर बैठे - बैठे

राजा कुर्सी पर बैठा है शान से
कुर्सी बनाने वाले ज़मीन पर

सबसे पहली कुर्सी 'पत्थर' की थी
फिर इंसान ने लकड़ी की कुर्सी बनाई
बाद में सोने ,चाँदी ,हीरे, जवाहरात की भी....

इतिहास में तो कई बार नरमुंडों की भी कुर्सियां बनाई गयी
और फिर उस पर बैठ के 'राजा' बहुत खुश हुआ...

कुर्सी बनाई गयी थी
इस उम्मीद में कि इस पर बैठा हुआ
राजा राज्य में
सुख शांति समृद्धि लाएगा.....

कई बार ऐसा भी हुआ
कुर्सी की वजह से ही
सुख शांति और समृद्धि राज्य से विदा हो गईं....

सबसे पहली कुर्सी पत्थर की थी
पर अब तो राजा भी पत्थर का हो गया है ..
भले ही कुर्सी किसी भी धातु की हो

मुकेश इलाहाबादी --------------------

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 7:31pm

बहुत ख़ूब. आ. मुकेश जी. इस बढ़िया कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Samar kabeer on September 25, 2017 at 3:27pm
जनाब मुकेश जी आदाब,वाह मज़ा आ गया,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 25, 2017 at 4:45am
मुकेश जी कुर्सी के माध्यम से बढ़िया ताना बाना बुना आपने, बधाई आपको।
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on September 24, 2017 at 9:40am

rachna pasandgee ke liye aap ka bahut bahut abhar mitra Mohammed Arif bhaee

Comment by Mohammed Arif on September 24, 2017 at 7:40am
आदरणीय मुकेश जी आदाब, आज की कुर्सी का अच्छा चरित्रांकन किया आपने । कुर्सी के माध्यम से सबकुछ बयाँ कर दिया । अदनी सी कुर्सी ने सबका चरित्र गिरा दिया है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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