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मुद्दतों की आरजू तब तुम कही जाकर मिले

मुद्दतों की आरजू तब तुम कहीं जाकर मिले।
प्यास बढ़ने की तड़प से ज्यो नदी-सागर मिले।।

सर्द आहों को लिये तकते रहे रस्ता तेरा।
इक नज़र पाने को तेरी हम वहाँ अक़्सर मिले।।

किस्मतों का फैसला ऐसा किया तूने ख़ुदा।
एक के हिस्से में गुल,दूजे को बस पत्थर मिले।।

दो निवाले मुश्किलों से ,चैन भी दिल को नही।
तंगहाली में मगर हम बारहा क़ैसर मिले।।

तीरगी में बा ग़रज हम चल दिये यह सोचकर।
इस दफ़ा ही मुद्दतों के बाद वो रहबर मिले।।
मौलिक तथा अप्रकाशित

Added by gaurav kumar pandey on November 22, 2016 at 5:10pm — 6 Comments

लाडो ....

लाडो ....

माँ

मैं तो

लाडो ही रहना चाहती थी

तुम्हारी लाडो

नाचती

कूदती

प्यारी सी लाडो

समय ने कब

बचपन की दीवारों में सेंध मारी

पता ही न चला

ज़माने की निगाहों ने

कब ज़िस्म को

छीलना शुरू किया

ख़बर ही न हुई

मैं

तिल तिल करती

मेहंदी की दहलीज़ तक

आ पहुँची

किसी के हाथों में

तेरी लाडो

कैद सी हो गयी

कोई रस्म

तेरी लाडो की

तक़दीर बदल…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 22, 2016 at 4:34pm — 10 Comments

हसरत को दफनाया जाए-पंकज द्वारा ग़ज़ल

इक ताबूत मंगाया जाए
हसरत को दफनाया जाए

पतझर से पहले पतझर को
उपवन में बुलवाया जाए

ऐसा कर अब चल रे पंकज
मन का ताप बढ़ाया जाए

परिवर्तन का दौर चला है
रिश्तों को ठुकराया जाए

मोती रोको, गर्द जमेगी
पत्तों को समझाया जाए

बहुत हुआ अब शोर शराबा
धड़कन को समझाया जाए

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 22, 2016 at 1:15pm — 10 Comments

बचपन (कविता)

बचपन



आज के जीवन शैली में

बचपन कहीं नहीं हैं

अल्हड़पन नहीं है

मासूमियत कहीं खो गयी है ।

मोबाइलों ने छीन ली है

खुले मैदानों की चिल्लाहट

टीवी कॉम्प्यूटर चल पड़े हैं

गुल्ली डंडे की जगह पर

खेल हुए है क़ैद स्कूलों में

उनके लिए ही ट्रॉफी जितने

कॉलेज में राजनीती की निति

बच्चों के मन के गलियारों में ।

बचपन बैठा है पिंजरों में

अपने ख्वाबों की उड़ान भरने को ।

खुले आकाश से बातें करता

अपने वजूद को तलाशता ।

बचपन शायद फिर…

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 22, 2016 at 11:21am — 9 Comments

गजल(सबकुछ....)

22 22 22 22
सच होता कब कहना सबकुछ
लाख करो क्या बनता सबकुछ?1

ढाते सब बेमतलब बारिश
झूठ कहाँ हो जाता सबकुछ?2

शमशीरें ले हाथ खड़े हैं
कर सकते क्या बौना सबकुछ?3

पंथ पता बेढ़ंग चले हैं
कौन कुपथ हो सकता सबकुछ?4

कितनों ने दी कुर्बानी, पर
याद भला कब रहता सबकुछ?5

खींच रहे बस रोज लकीरें
कोई कह दे, लिखता सबकुछ?6

मिहनत की ताबीर 'मनन'मय
हो सकता क्या जीना सबकुछ?7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on November 22, 2016 at 10:16am — 7 Comments

रेट का टैग लगा रिश्तों का बाज़ार मिला- पंकज द्वारा ग़ज़ल

2122 1122 2122 112



ढूँढने प्रीत चला स्वार्थ का उपहार मिला

रेट का टैग लगा रिश्तों का बाज़ार मिला



आदमीयत भी दिखावे की कोई चीज़ हुई

कैमरा ऑन था, दुखिया को बहुत प्यार मिला



न्याय के घर में भी पैसे की खनक हावी हुई

नाचता नोट की गड्डी पे ख़बरदार/जिरहदार मिला



ये अलग बात है तुम ज़िद पे अड़े हो तो मिलो

पर मुझे भूल नहीं पाया जो इक बार मिला



देख दर्पण में हक़ीक़त को चुराता है नज़र

लोभ की कीच में पंकज भी तो बीमार मिला



मौलिक… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 22, 2016 at 7:00am — 6 Comments

व्यथित मन .....

व्यथित मन .....

कहते हैं

अंतर्मन की व्यथा को

कह देने से

हल्का हो जाता है

मन

कहा

आईने से

तो बिम्ब देख

और भी

व्यथित हो गया

मन

कहा

एकांत से

तो अंधेरों में

अट्टहास करती

असंख्य ध्वनियों ने

चीर डाला

व्यथित

मन

कहा

स्वप्न से

तो स्मृतियों के

सागर पर

मिल गया

मुझ जैसा ही

एक और

तन्हा

व्यथित

मन



देखा उसे

तो…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 21, 2016 at 9:02pm — 10 Comments

ग़ज़ल (बना है बोझ ये जीवन।)

1212 1122 1212 1122

(मुज़तस मुसम्मन मखबून)



बना है बोझ ये जीवन कदम थमे थमे से हैं,

कमर दी तोड़ गरीबी बदन झुके झुके से हैं।



लिखा न एक निवाला नसीब हाय ये कैसा,

सहन ना भूख ये होती उदर दबे दबे से हैं।



पड़े दिखाई नहीं अब कहीं भी आस की किरणें,

गगन में आँख गड़ाए नयन थके थके से हैं।



मिली सदा हमें नफरत करे जलील जमाना,

हथेली कान पे रखते वचन चुभे चुभे से हैं।



दिखी कभी न बहारें मिले सदा हमें पतझड़,

मगर हमारे मसीहा कमल खिले खिले… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on November 21, 2016 at 6:30pm — 6 Comments

आ भी जाओ परी- पंकज द्वारा गीत

तेरे दीदार को ये निगाहें मेरी

कब से व्याकुल हैं विह्वल ये धड़कन मेरी

आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।



आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।।



कितने अरमान मन में सँजोये हूँ मैं

नींद तेरे लिए ही तो खोए हूँ मैं



इस अँधेरे नगर में बिछे चाँदनी

घोल दे ज़िन्दगी में मधुर रागिनी



राग पायल की छम छम सुना सांवरी

आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।



आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।।1।।



तेरे काजल सजे दोनों चंचल नयन

फूल सा खूबरू… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 21, 2016 at 3:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बुलबुला है इक फ़कत ये जिस्म जाँ कुछ भी नहीं (तरही ग़ज़ल )

2122   2122   2122   212

बुलबुला है इक फ़कत ये जिस्म जाँ कुछ भी नहीं

जिंदगानी  से   कजा की दूरियाँ कुछ भी नही

 

बागबाँ की है कमी या पस्त है आबो हवा

पाक  नकहत फूल के अब दरमियाँ कुछ भी नही

 

मोल उसका गर न समझे तो बशर की भूल है

हम को कुदरत दे रही जो  रायगाँ कुछ भी नही

 

आशिकों की मौत पे  जो शम्मअ के दिल से उठे

नफरतों से जो निकलता वो धुआँ कुछ भी नही

 

फिक्र-ए-शाइर नापती कब  से अज़ल की दूरियाँ

उसके आगे…

Continue

Added by rajesh kumari on November 21, 2016 at 12:00pm — 16 Comments

गर्दिश में पैमाना है

*22 22 22 22 22 22 22 2*



आज बहुत सुनसान पड़ा क्यूँ, दिल का ये मैखाना है

साकी रूठ गया है मुझसे, गर्दिश में पैमाना है।



जश्न मनाते लोग यहाँ अब, बंद कपाटो के पीछे

होटल में ले जाते उनको, जब भी पड़े खिलाना है।।



देते खबर पडोसी की अब, हमको भी अखबार यहाँ।

कैद हुए है घर में सारे, सीमित हुआ ठिकाना है।।



भरी पड़ी है फ्रेंड लिस्ट भी फेसबुकी दिलदारों से

कांधा लोग नहीं देंगे पर, खुद ही बोझ उठाना है।।



नुक्कड़ पर अब लोग नही है, मिलती है… Continue

Added by नाथ सोनांचली on November 21, 2016 at 5:30am — 7 Comments

उल्टी गंगा

ट्राफ़िक पुलिस को देख उसे आईडिया आया । उसने झट अपनी बाईक किनारे लगाई, हेलमेट सिर से उतारकर बाईक के पीछे लटकाया । उस नोट बंदी के मारे ने, धड़धड़ाते हुये बाईक लेजाकर इन्स्पेक्टर के सामने रोकी ।

“सर, मेरा चालान काटिये मै हेल्मेट नही पहना हूं ।“ वह बोला ।

इन्स्पेक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा । पूछा – “दो सौ रुपये छुट्टे है ?”

उसने इन्कार मे सर हिलाया ।

“ठीक है, जब छुट्टे होंगे तब आना ।“ इन्स्पेक्टर ने कहा ।

“सर, आज ही …”

“ऐसा है बेटा । अपना हेल्मेट सिर पे…

Continue

Added by Mirza Hafiz Baig on November 21, 2016 at 1:09am — 5 Comments

ग़ज़ल...भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम

फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्

122 122 122 122

वो पलछिन सभी याद आने लगेंगे

भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे



यहाँ बैठ कर हमने खाई हैं कसमें

ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे



यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर

यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे



सरे आइना जो मेरा अक्स होगा

वो दर्पन से नजरें चुराने लगेंगे



सखी हाल दिल का कभी पूँछ लेगी

कभी हाले दिल आजमाने लगेंगे



(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 20, 2016 at 4:30pm — 16 Comments

अभी आई है पतझड़ ये बहार कभी तो आएगी(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 1222 1222



अभी आई है पतझड़ ये बहार कभी तो आएगी

खिलेंगे फूल खुशियों के सुकूँ देकर ही जाएगी।



जुदाई सह नहीं पाया हुआ था दर्द सीने में

उसे ही याद है रक्खा वही जीना सिखाएगी।



जो जोड़ी चोर ने दौलत नहीं कुछ काम है आई

छुपाने की रही कौशिश दिखाई तो फ़ँसाएगी।



बड़े अरमान से चाहा, जिसे पूजा,जिसे माना

नहीं यह जान पाए थे वही हमको सताएगी।



लगाया जोर था जिसको बड़ी ऊपर ले जाने में

नहीं अच्छी बनी सीढ़ी तुझे नीचे… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 20, 2016 at 4:18pm — 7 Comments

ग़ज़ल ( किस ने फूंके नशेमन तमाम )

ग़ज़ल

---------

212 -212 -2121 /212

उसपे वारा है जीवन तमाम ।

जिस में मौजूद हैं फ़न तमाम ।

सख़्त लहजे का अंजाम है

हो गए तुझ से बद ज़न तमाम ।

उनको देखूंगा जब तक नहीं

दिल की होगी न धड़कन तमाम।

अबतो आ जाओ बन कर बहार

उजड़ा उजड़ा है गुलशन तमाम ।

किस को सौंपें क़यादत भला

रहबरों में हैं रहज़न तमाम ।

पूछना है तो बिजली से पूछ

किस ने फूंके नशेमन तमाम ।

इश्क़ तस्दीक़ आसाँ…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 20, 2016 at 2:25pm — 10 Comments

उतर जाए अगर झूठी त्वचा तो (ग़ज़ल)

बह्र : १२२२ १२२२ १२२

 

उतर जाए अगर झूठी त्वचा तो।

सभी हैं एक से साबित हुआ, तो।

 

शरीअत में हुई झूठी कथा, तो।

न मर कर भी दिखा मुझको ख़ुदा, तो।

 

वो दोहों को ही दुनिया मानता है,

कहा गर जिंदगी ने सोरठा, तो।

 

समझदारी है उससे दूर जाना,

अगर हो बैल कोई मरखना तो।

 

जिसे मशरूम का हो मानते तुम,

किसी मज़लूम का हो शोरबा, तो।

 

न तुम ज़िन्दा न तुममें रूह ‘सज्जन’

किसी दिन गर यही…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 19, 2016 at 10:08pm — 10 Comments

गजल (बह्रे मीर )

  2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2

इंसानी फितरत के जलवे दिन ये कैसे आये हैं

सन्नाटा गलियों में छाया संगीनों के साये हैं

 

चप्पे-चप्पे पर दिखता है आतुर सैनिक का पहरा

धरती की रक्षा करने की शत-शत कसमे खाये हैं

 

कुछ तो अजगुत कहता है यह सघन सुरक्षा का घेरा

क्या फिर से तारामंडल में घन संकट के छाये हैं

 

पोथी लेकर भोली बाला घूम रही वीराने में

अक्षर ने शब्दों से मिल कर गीत सुहाने गाये हैं  

 

खौल रहा है खून वतन…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 19, 2016 at 7:27pm — 4 Comments

और फिर से इक दफ़ा-पंकज मिश्र

और फिर से इक दफ़ा इस, दिल ने धोख़ा दे दिया
सो रहा था, बेवफ़ा का, नाम सुनकर जग गया

और फिर से इश्क़ ने, तूफ़ान की सौगात दी
और हमने यूँ किया की, आज जी भर रो लिया

और फिर से इक दफ़ा हम प्रश्न लेकर हैं खड़े
दोस्ती कैसे निभेगी बोल मेरे साथिया

और फ़िर से इक दफ़ा मिलने वो आये हैं मग़र
हम कफ़न में और वो पर्दानशीं उफ़ ये हया

और फिर से इक दफ़ा पत्थर से गङ्गा बह चली
वत्स कुल में इक भगीरथ फिर हुआ पैदा नया

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 19, 2016 at 4:22pm — 8 Comments

है यही पाथेय मेरा // रवि प्रकाश

है यही पाथेय मेरा

एक नन्हा सा अकेला

पल कि जिसमें एक मैं हूँ एक तुम हो

दूर तक कोई नहीं है

और भीतर झिलमिलाते कोटि दीपक

टिमटिमाते हैं सितारे और सूरज भी दमकते

फूटते निर्झर सहस्रों

अति सघन हिमरेख गल कर बह निकलती,

चाह कर भी छुप न पाती

हैं उमंगें दो दिलों की

देह आगे और आगे ही सरकती

चाहती अस्तित्व का अंतिम सिरा

छू कर पिघलना,

देखते हैं नैन ऐसे

आ गया हो ज्वार जैसे

और फिर यूँ बंद होते

लाज में लिपटे अचानक

दूर परबत के शिखर… Continue

Added by Ravi Prakash on November 19, 2016 at 2:24pm — 6 Comments

बकरे की अम्मा

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती ।

आखिर वे लोग आ पहुंचे तो बकरे की अम्मा रोने लगी “देखिये आराम से … ज़्यादा तकलीफ़ तो नहीं होगी न … बड़े प्यार से पाला है …”

“आप चिंता न करें हमारे कसाई हाई स्किल्ड हैं …” वे बोले ।

“फ़िर भी …” वह विनती करने लगी ।

“देखिये ! हम किसी पर अत्याचार नहीं करते । हमारी व्यवस्था भी लोकतांत्रिक है । हम हर एक बकरे को वोट का अधिकार देते हैं । हमारे बकरे अपना कसाई खुद चुनते हैं …”

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mirza Hafiz Baig on November 19, 2016 at 9:06am — 8 Comments

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