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ट्राफ़िक पुलिस को देख उसे आईडिया आया । उसने झट अपनी बाईक किनारे लगाई, हेलमेट सिर से उतारकर बाईक के पीछे लटकाया । उस नोट बंदी के मारे ने, धड़धड़ाते हुये बाईक लेजाकर इन्स्पेक्टर के सामने रोकी ।

“सर, मेरा चालान काटिये मै हेल्मेट नही पहना हूं ।“ वह बोला ।

इन्स्पेक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा । पूछा – “दो सौ रुपये छुट्टे है ?”

उसने इन्कार मे सर हिलाया ।

“ठीक है, जब छुट्टे होंगे तब आना ।“ इन्स्पेक्टर ने कहा ।

“सर, आज ही …”

“ऐसा है बेटा । अपना हेल्मेट सिर पे रख और पतली गली पकड़ । वर्ना ऐसा चालान काटूंगा कि ज़िंदगी भर चालान भरता रहेगा । सरकार ने पांच-पांच सौ के छुट्टे देने के लिये वर्दी दी है क्या ?”

बेचारा यहां से भी मायूस होकर चला गया । इन्स्पेक्टर बड़बड़ाता रहा- “क्या ज़माना आगया देखो… गंगा उल्टी बहने लगी है…”

    (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 15, 2018 at 3:27am

 बेहतरीन प्रवाहमय, यथार्थपूर्ण, कटाक्षपूर्ण सृजन।  हार्दिक बधाई मुहतरम जनाब मिर्ज़ा ह़ाफ़िज़ बेग  साहिब।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 24, 2016 at 1:34pm

बहुत खूब ! प्रसन्न कर दिया आपने आदरणीय मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग़ साहब ! इस प्रवहमान प्रस्तुति पर आपको दिल से दाद दे रहा हूँ ..

शुभ-शुभ

Comment by नाथ सोनांचली on November 23, 2016 at 2:27pm
बेहतरीन कटाक्ष लिए उत्तम लघु कथा, बहुत खूब ।जनाब मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग जी सादर अब्गिवादन और उम्दा लघु कथा के लिए मेरी दिली बधाई निवेदित है।
Comment by Mirza Hafiz Baig on November 23, 2016 at 2:05pm

मुहतरम जनाब समर कबीर साहब, आदाब । आपकी नवाज़िश बहुत मायने रखती है । सच है कि यह लघुकथा हालात-ए-हाजरा पर है । लेकिन पता न था इस हालात-ए-हाजरा की हद इतनी मौख्तसर होगी आज ही देखा, हेलमेट का चालान 200 से 500 होगया है । छुट्टे की छुट्टी …

Comment by Samar kabeer on November 22, 2016 at 9:49pm
जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब, हालात-ए-हाज़रा पर बहतरीन तंज़ है, अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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