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बढ़ते कदम (लघुकथा)

अगला कदम उठाते ही उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे सैकड़ों टन का भार उसके पैरों पर रखा हो, वह लड़खड़ा उठा और उसने अपने साथी के कंधे का सहारा लिया, लेकिन साथी भी बहुत थका हुआ था, वह डगमगा गया, बर्फ के पर्वत पर चढ़ते हुए सेना के उन दोनों जवानों ने तुरंत एक-दूसरे को थाम लिया|

 

उसके साथी ने उसकी बांह को जोर से पकड़ते हुए कहा, "सोलह घंटों से चल रहे हैं, अब तो पैर उठाने की ताकत भी नहीं बची..."

"लेकिन चलना तो है ही...", उसने उत्तर दिया

"क्यों न कुछ खा लिया जाये?"…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 19, 2016 at 12:30pm — 22 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 24, 25

कल से आगे ...........

-24-

‘‘प्रिये लंका में आपका स्वागत है।’’ रावण ने कक्ष में प्रवेश करते हुये कहा।

मंदोदरी पर्यंक से उठकर खड़ी हो गयी और उसने आगे बढ़कर झुककर रावण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

‘‘अरे ! यह क्या करती हैं ? आपका स्थान तो रावण के हृदय में है।’’ कहते हुये रावण ने उसे उठा कर अपने सीने से लगा लिया।

मंदोदरी ने भी पूर्ण समर्पण के साथ अपना सिर उसके विशाल वक्ष पर रख दिया।

यह तय हुआ था कि कुबेर के प्रस्थान से…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 19, 2016 at 9:54am — No Comments

ग़ज़ल: पास रह कर भी न हम तेरे हुए.

2122-2122-212

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

 

झूठ की बुनियाद पर रिश्ते हुए,

ख़त्म सारे वास्ते उस से हुये.

 

बेवजह तुमने  मिटाईं दूरियां,

पास रह कर भी न हम तेरे हुए.

 

गाल पर गिर कर भी जो लहरा रहे,

हर नज़र में कान के झुमके हुए.

 

जिंदगी से आज भी उम्मीद है,

हम नहीं रहते हैं अब सहमे हुए.

 

आपसे अक्सर  सुना मैंने  सनम

चार दिन की चांदनी कहते हुए

 

है मुखौटा आदमी का आज…

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Added by Abha saxena Doonwi on July 19, 2016 at 8:30am — 10 Comments

सब आहिस्ता सीखोगे (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २

जल्दी में क्या सीखोगे

सब आहिस्ता सीखोगे

 

एक पहलू ही गर देखा

तुम सिर्फ़ आधा सीखोगे

 

सबसे हार रहे हो तुम

सबसे ज़्यादा सीखोगे

 

सबसे ऊँचा, होता है,

सबसे ठंडा, सीखोगे

 

सूरज के बेटे हो तुम

सब कुछ काला सीखोगे

 

सीखोगे जो ख़ुद पढ़कर

सबसे अच्छा सीखोगे

 

पहले प्यार का पहला ख़त

पुर्ज़ा पुर्ज़ा सीखोगे

 

हाकिम बनते ही…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 18, 2016 at 11:00pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मूल में क्या नशा बो रहा (महालक्ष्मी छंद )

महालक्ष्मी छंद

 

घूस से जो खड़ा हो गया

क्या सभी से बड़ा हो गया?

आग में जो तपा झूठ की

एक थोथा घड़ा हो गया

 

ज्ञान वाला यहाँ हारता

मूर्ख बाजी यहाँ मारता

मार देता वही साँच को    

झूठ का वेष जो धारता   

 

आज का  हाल क्या हो रहा

क्यूँ युवा देश का खो रहा

सूखती पौध आशा भरी

मूल में क्या नशा बो रहा

 

सोचता है युवा क्यूँ पढूँ

है कहाँ राह आगे बढूँ

हो न पूरे यहाँ जो…

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Added by rajesh kumari on July 18, 2016 at 9:09pm — 12 Comments

मेरी जान

मेरी जान

बनकर दुल्हन

बनी ठनी 

सजी संवरी

मृदु मुस्कान

भर चली ।

मेरी लाडो

बन दुल्हन

घर चली | 

वीरान आँगन

वो मेरा

कर चली ।

मेरी जान

अपने सजन की 

हो चली ।

घर बाबुल का 

पीछे छोड़ 

चल पड़ी…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 18, 2016 at 8:30pm — 8 Comments

दुश्मन नए मिले.

२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

जब छीनने छुडाने के साधन नए मिले

हर मोड़ पर कई-कई सज्जन नए मिले

 

कुछ दूर तक गई भी न थी राह मुड़ गई

जिस राह पर फूलों भरे गुलशन नए मिले

 

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था

उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

 

जितने भी काटता गया जीवन के फंद वो  

उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले

 

अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी  

गलियों से अब जो गाँव की आँगन नए…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 18, 2016 at 2:00pm — 19 Comments

दोहे : सतविन्द्र कुमार

दोहे



जग से ईर्ष्या क्यों करें,क्यों हो कोई होड़

सबकी अपनी राह है,दौड़ें या दें छोड़।।



प्रेम-प्रीत की रीत से,जग को लेते जीत

ईर्ष्या व बुरी भावना, रखती है भयभीत।



जिसको कोई चाहता ,वह ही उसका मीत

स्नेह-प्रेम के जोर से,बने हार भी जीत।।



ठाले बैठे क्यों रहें, कर लें कुछ तो काम

ईर्ष्या जाती यूँ उपज,कर देती बदनाम।



सबकुछ उनके पास है,हम ही हैं कंगाल

बैठे खाली सोचते,कैसे आए माल।।



सोच-सोच कर मन मुआ,विचलित हुआ… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 18, 2016 at 11:30am — 9 Comments

घुमावदार प्रश्न -- ( लघु-कथा ) -- डॉo विजय शंकर

अधिकारी - सर , इस बार पब्लिक ने जो प्रश्न उठाया है , वह बड़ा घुमावदार है। कोई हल मिल नहीं रहा है।
माननीय नेता जी - फिर तो बड़ा अच्छा है , हम भी उसे घुमाते रहेंगे। घुमाते-घुमाते उसे ही घुमा देंगे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on July 18, 2016 at 10:54am — 4 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 23

कल से आगे ...



‘‘महर्षि प्रणाम स्वीकार करें।’’ महर्षि अगस्त्य के आश्रम में प्रवेश करते हुये इंद्र ने कहा।

‘‘देवेंद्र को क्या आशीर्वाद दूँ मैं ?’’ अगस्त्य ने हँसते हुये कहा ‘‘देवेन्द्र के सौभाग्य से तो सारा विश्व पहले ही ईष्र्या करता है।’’

‘‘क्या गजब करते हैं मुनिवर ! इस समय तो इंद्र को आपके आशीर्वाद की सर्वाधिक आवश्यकता है। इस समय यह कृपणता, दया करें, इस समय भरपूर आशीर्वाद दें।’’

‘‘ महर्षि गौतम के साथ ऐसा घात करने के बाद भी जो विश्व में पूजनीय है भला उसे अगस्त्य के…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 18, 2016 at 9:00am — 3 Comments

तज़मींन बर तजमींन

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



"तज़मीन बर तजमीन समर कबीर साहिब बर ग़ज़ल हज़रत सय्यद रफ़ीक़ अहमद "क़मर" उज्जैनी साहिब"







कोई पूछे ज़रा हमसे कि क्या क्या हमने देखा है

सुलगता शह्र औ' बिखरा वो कुनबा हमने देखा है

नया तुम दौर ये देखो पुराना हमने देखा है

"ख़ज़ाँ देखी कभी मौसम सुहाना हमने देखा है

अँधेरा हमने देखा है,उजाला हमने देखा है

फ़सुर्दा गुल कली का मुस्कुराना हमने देखा है"

"ग़मों की रात ख़ुशियों का सवेरा हमने देखा है

हमें… Continue

Added by shree suneel on July 18, 2016 at 2:00am — 9 Comments

अमन की राह--

थक गए थे जलील चचा, कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था| सबको बस एक ही बात समझ आ रही थी कि बड़ी बड़ी बंदूकें उठाओ और हर उस शख्श को रास्ते से हटा दो जो उनकी बात नहीं माने| पता नहीं ये उन भड़काऊ तकरीरों का असर था या उनके द्वारा दिखाए गए प्रलोभन का असर| आज उनको बेहद अफ़सोस हो रहा था, अपने ऊपर और पत्नी के ऊपर भी जो उनको अकेला छोड़कर जन्नत सिधार गयी थी| काश उनको एक औलाद दे गयी होती तो कम से कम उसे तो सही रास्ते पर चला पाते|

आज शाम की मीटिंग में फिर से सबने उनके शांति और सौहार्द के प्रस्ताव को…

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Added by विनय कुमार on July 17, 2016 at 3:23pm — 8 Comments

सावन गीत (उल्लाला छंद)/सतविन्द्र कुमार

क्यों अब तक सोये पड़े, सुनों पवन संगीत जी

झम झम झम बूँदें गिरें,गर्मी बनती शीत जी।



उमस बढ़ी जब जोर से,जिस्म पसीना सालता

दम घुट-घुट कर आ रहा,मुश्किल में ये डालता

राहत औ ठंडक मिले,सो बरखा से प्रीत जी

झम झम झम बूँदें गिरें,गर्मी बनती शीत जी।



धान-कटोरा सूखता,बिन पानी के मेल से

कृषक सभी उकता गए,लुक-छिप के इस खेल से

बादल अब जाओ बरस,करो नहीं भयभीत जी

झम झम झम बूँदें गिरें,गर्मी बनती शीत जी।



सावन भी यह टीसता, बिन बरखा के साथ के

अब… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 12:00pm — 4 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 22

कल से आगे ........



समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा।



महाराज दशरथ पिता बन गये। बड़ी रानी कौशल्या ने पुत्र को जन्म दिया। दशरथ का मन खुशी से नाचने लगा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अपना उल्लास कैसे व्यक्त करें। उनका बस चलता तो वे मुकुट आदि सारे राजकीय आडम्बरों को एक ओर रखकर नाचते, गाते, चिल्लाते अयोध्या की सड़कों पर निकल जाते और एक-एक आदमी को पकड़ कर उसे यह शुुभ समाचार सुनाते। पर हाय री पद की मर्यादा ! वे ऐसा नहीं कर सकते थे। फिर भी अयोध्या का कोष खोल दिया गया था। पूरी पुरी…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 17, 2016 at 10:26am — 1 Comment

गजल(सो रहा माझी....)

2122 2122 2122 2

सो रहा माझी किनारा दूर लगता है

बढ़ रही कश्ती पथिक मजबूर लगता है।1



रोशनी का जो सबब हमदम कभी बनता,

आँख पे पट्टी चढ़ी मद चूर लगता है।2



सिर गिने जाते अभी तक थे जमाने में

हो रहा उल्टा नशा भरपूर लगता है।3



खेल चलता है यहाँ शह-मात का कबसे

मात चढ़ती शाहपन काफूर लगता है।4



हो रहीं सब ओर हैं बाजार की बातें

बिक गया जैसे यहाँ हर नूर लगता है।5



दाँव पर लगता यहाँ अब जो बचा कुछ था

लुट रहा कोई बिका मशकूर… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 17, 2016 at 10:00am — 5 Comments

सभी नादान बन गए

२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

ये रूप रंग गंध सभी  शान बन गए

कुछ रोज में ही जो मेरी पहचान बन गए

 

नफरत के सिलसिले जो चले धूप छाँव बन

इंसानियत के शब्द भी मेहमान बन गए

 

तुम-तुम न रह सके न ही मैं-मैं ही बन सका

दोनों ही आज देख लो शैतान बन गए

 

खेमों में बँट गए हैं सभी आज इस तरह

कुछ राम बन गए कई रहमान बन गए

 

हद के सवाल पर या कि जिद के सवाल पर

हद भूलकर गिरे सभी नादान बन…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 17, 2016 at 9:35am — 5 Comments

नारी तू नारायणी (उलाला छंद)/सतविन्द्र कुमार

नारी भारत में कभी,पाती थी सम्मान को

उसको थे सब पूजते,रखते उसके मान को

कष्ट बहुत सहने पड़े,कालांतर में नार को

कमतर था समझा गया, दुर्गा के अवतार को।



फिर नारी ने भी सही,दी खुदको पहचान है

आदिकाल से ही रही,नारी की तो शान है

सूया-सीता रूप में,नारी पर अभिमान है

जीजा माँ ,दुर्गावती,भारत-भू की आन है।



मातृशक्ति है जो बनी,नारी जीव महान है

जिसके आँचल में पले, पाती सुख संतान है

हर सुख अपने छोड़ दे,ममता-गुण की खान है

हे देवी! हम मानते,… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 7:30am — 4 Comments

ग़ज़ल

२१२२        २१२२     २१२२       २२

जिंदगी क्या है ज़रा नज़रे उठा कर  देखो

अश्क बारी  बंद कर चश्में सुखा कर  देखो |

जिंदगी भर  लालसा के पीछे भागे तुम क्यूँ    

शांति से तुम सोचकर कारण पता कर देखो |

मुफलिसी को तुम भी हंसी  में चिढ़ाया होगा

मुफलिसों को कुछ कभी तो तुम खिला कर देखो |

चश्मा पहने हो जो उसको  साफ़ करना  होगा

शान शौकत  धन के ऐनक को हटा कर  देखो |

मानुषिकता में नहीं कोई बड़ा या…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on July 17, 2016 at 7:30am — No Comments

रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

हम मुहब्बत की बात करते हैं



वहशते ग़म के साथ रहके भी

हम मसर्रत की बात करते हैं



जो इशारे हैं उनकी आँखों के

सब शरारत की बात करते हैं



ज़िक्र होता है वस्ल का जब भी

वो क़यामत की बात करते हैं



पूछता है जो कोई हाले दिल

उसकी रहमत की बात करते हैं



दिल में क्या है बयां नहीं करते

बस सियासत की बात करते हैं



क्यूँ डरें इश्क़ में ज़माने से

हम बग़ावत की बात करते हैं



जो लुटेरे थे… Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 17, 2016 at 1:56am — 12 Comments

धर्म-प्रदूषण (लघुकथा)

उस विशेष विद्यालय के आखिरी घंटे में शिक्षक ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए, गिने-चुने विद्यार्थियों से कहा, "काफिरों को खत्म करना ही हमारा मक़सद है, इसके लिये अपनी ज़िन्दगी तक कुर्बान कर देनी पड़े तो पड़े, और कोई भी आदमी या औरत, चाहे वह हमारी ही कौम के ही क्यों न हों, अगर काफिरों का साथ दे रहे हैं तो उन्हें भी खत्म कर देना| ज़्यादा सोचना मत, वरना जन्नत के दरवाज़े तुम्हारे लिये बंद हो सकते हैं, यही हमारे मज़हब की किताबों में लिखा है|"

 

"लेकिन हमारी किताबों में तो क़ुरबानी पर ज़ोर…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 16, 2016 at 10:26pm — 9 Comments

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