For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

दिल आज उदास है // कान्ता राॅय

आईये पास कि दिल आज उदास है

आपकी आस में दिल आज उदास है



याद का भँवर उडा ले चला इस कदर

थाम लीजिए मुझे दिल आज उदास है





हाथ में आपकी हैं छुअन सी लगीं

घटा को देख फिर दिल आज उदास है





दिल का धडक जाना आपके नाम से

बदलियों को देख दिल आज उदास है





छतरी में सिमटना एक ठंडी शाम में

यादों में तनहा दिल आज उदास है



रूहानी तलाश रूह की जैसी प्यास

ढुंढना आस पास दिल आज उदास है



पूछना मुझसे नाम मेरे यार… Continue

Added by kanta roy on July 13, 2015 at 1:30pm — 18 Comments

अन्तर्मन (कहानी)

पेड़ के बगल ही खड़ी हो पेड़ से प्रगट हुई स्त्री ने पूछा , “अब बताओ इस रूप में ज्यादा काम की चीज और खूबसूरत हूँ या पेड़ रूप में |

पेड़ बोला , “खूबसूरत तो मैं तुम्हारे रूप में ही हूँ , पर मेरी खूबसूरती भी कम नहीं | काम का तो मैं तुमसे ज्यादा ही हूँ |”

” न ‘मैं’ हूँ |”

पेड़ ने कहा, ” न न ‘मैं’ ”

पेड़ ने धोंस देते हुए कहा , “मुझे देखते ही लोग सुस्ताने आ जाते हैं |जब कभी गर्मी से बेकल होते हैं |”

“मुझे भी तो |” रहस्यमयी हंसी हंसकर बोली स्त्री

“मुझसे तो छाया और सुख मिलता हैं…

Continue

Added by savitamishra on July 13, 2015 at 12:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हम को तो सागर का लेकिन रोष दिखाई देता है (एक हिंदी ग़ज़ल 'राज')

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २  

.

दूजे  में हमको जो अक्सर दोष दिखाई देता है 

अपने में तो वो खूबी का कोष दिखाई देता है

 

उथला पथली हो लहरों की, चाहे समझो अँगडाई 

हम को तो सागर का लेकिन रोष दिखाई देता है

 

कितना टूटा होगा बादल खुद की हस्ती को खोकर

लेकिन नभ के मुख दर्पण में तोष दिखाई देता है

 

जिसके मन में खोट नहीं है उसको लगता सब अच्छा             

 पतझड़ में भी जीवन का उद्धोष  दिखाई देता है

 

खुशियाँ हो तो…

Continue

Added by rajesh kumari on July 13, 2015 at 11:30am — 17 Comments

सीख....(लघुकथा)

“सुन बेटा!! बारिश तो ठीक हुई और खेतों में नमी पर्याप्त है, बस बीज को सही नमी और शुष्कता के बीच में ही बोना, अंकुरण का प्रतिशत अच्छा रहेगा. ज्यादा गहरी नमी में मत उतार देना, वरना सड जायगा..” रमेश ने अपने बेटे को खेत में बोनी करने से पहले समझाते हुए कहा

“ जी पिताजी.. मैं आपकी बात समझ गया, सब संभाल लूँगा. आप घर जा रहे हो, अगर हो सके तो छोटू के खाते में कुछ पैसे जमा कर आना. कल उसका फोन आया था. वहां शहर में गर्मी बहुत है पंखे से काम नहीं चलता, तो कूलर का कह रहा था..”  बेटे ने काम…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2015 at 11:02am — 5 Comments

जैसे को तैसा (लघुकथा)

इधर  गॉव से ताई जी अपने परिवार के साथ, पूरे बीस दिन के लिये आ गयीं थी! उधर पिछले तीन दिन से काम वाली बाई नहीं आरही  थी!

आखिरकार पांच दिन बाद बाई जी आईं!जैसे ही बाई रसोई की तरफ़ बढी, ताई जी ने कडकती आवाज़ में उसे रोक दिया"ए रुको, पहले बताओ तुम कौन जाति की हो"!

"किसलिये, कोई रिश्ता करना है क्या"!

"अरे यह तो बडी मुंहफ़ट है"!

“क्यों बुरा लगा ना"!

"तुमको जाति बताने में क्या परेशानी है"!

"हमने तो कभी आपसे आप की जाति नहीं पूछी"!

"अरे वाह,तुम किसलिये…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on July 13, 2015 at 11:00am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ख़ुदा हो जा, अगर क़ुव्वत है तुझ में (गिरिराज भंडारी )

1222   1222    122

बहारों पर् चलो चरचा करेंगे

ख़िजाँ का ग़म ज़रा हलका करेंगे

 

कभी सोचा नहीं, हम क्या बतायें

न होंगे ख़्वाब तो हम क्या करेंगे

 

सजा दे , हक़ तेरा है हर खता की

उमीदें रख न हम तौबा करेंगे

 

अगर जुगनू सभी मिल जायें, इक दिन

यही सर चाँद का नीचा करेंगे

 

सँभल जा ! हम इरादों के हैं पक्के

कि, मर के भी तेरा पीछा करेंगे

 

जिया अन्दर का बाहर आ तो जाये

सर इब्ने सुब्ह को नीचा…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 13, 2015 at 8:30am — 18 Comments

ग़ज़ल - इस्लाह के लिए

2122 2122 2122 212



या तो चाहत इश्क़ में थी या खुदा पाने में थी

एक समंदर की सी तमन्ना आँख के दाने में थी



बेगुनाही एक जिद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी

और मेरी हर सजा तेरे बिछड़ जाने में थी



होश के इस फैसले से क्या मुझे हासिल हुआ

ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छोटे से पैमाने में थी



सांस लेता है ये जाने कौन किसका जिस्म है

ज़िन्दगी तो अपनी तेरे गम के वीराने में थी



ये नहीं हासिल हुआ या वो नहीं मुमकिन हुआ

कशमकश ये हर घडी इस दिल को थर्राने में…

Continue

Added by मनोज अहसास on July 13, 2015 at 8:30am — 14 Comments

समझ

हाइकू



मित्र हैं वही

जो न तोड़े विश्वास

शेष तो साथी



दूसरों पर

न करो दोषारोपण

यही बहुत



परोपकार

खुशबू चन्दन

करुना बसी



निराश न हों

असफलता देती

प्रेरणा नई



धन प्राप्ति से

दरिद्रता न मिटे

वित्तेष्णा छोडो



खरीददारी में

खुश होने का भ्रम

पाले रईस



जुंबा पर आये

पुरानी कई यादें

प्यार बढाए



कह के बात

खुले मन…

Continue

Added by Manisha Saxena on July 13, 2015 at 12:12am — 4 Comments

चाँद मेरा आया है.........

चाँद मेरा आया है....

क्यों अपने रूप पे

ऐ चाँद तूं इतराया है

आसमां के चाँद सुन

मेरे चाँद का तू साया है

अक्स पानी में तेरा तो

इक हसीँ छलावा है

अक्स नहीं हकीकत है वो

जो इन बाहों में समाया है

वो ख़्वाब है मेरी नींदों का

हकीकत में हमसाया है

अपने हाथों से ख़ुदा ने

महबूब को बनाया है

एक शबनम की तरह

वो हसीं अहसास है

देख उसके रूप ने

तेरे रूप को हराया है

किसकी ख़ातिर बेवज़ह

देख तू शरमाया है

मुझसे मिलने चांदनी…

Added by Sushil Sarna on July 12, 2015 at 10:43pm — 4 Comments

लघुकथा : परमज्ञान

भक्त ने भगवान से कहा, "भगवन! आपके पास जितना ज्ञान है वो सारा का सारा मुझे भी प्रदान कर दीजिए।"

भगवान बोले, "तथास्तु।"

भक्त को दुनिया की सारी कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और धर्मग्रन्थ इत्यादि याद हो गए। उसे हर तरह की कला एवं संगीत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया। उसे दर्शन एवं विज्ञान के सभी सिद्धान्त याद हो गए। इस तरह वह परमज्ञानी हो गया।

उसने अपनी कलम उठाई और एक कविता लिखने का प्रयास करने लगा। कुछ पंक्तियाँ लिखने के बाद उसे लगा कि इस तरह की कविता तो अमुक भाषा में…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2015 at 10:30pm — 13 Comments

कौन नहीं चोर (लघुकथा)

एक व्यक्ति का नौकर उसके रुपये चोरी करके चला गया|

दूसरे व्यक्ति ने कहा "जो बेईमानी और चोरी के रूपए से अपना घर बनाता है वो कभी सुखी नहीं रह सकता"

पहले ने चौंक कर दूसरे की तरफ देखा और व्याकुल होकर कहा, "नहीं, आजकल ऐसा तो नहीं होता"

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 12, 2015 at 10:00pm — 6 Comments

लंच बॉक्स (लघुकथा)

"मैंने अपना लंच बॉक्स खुद पैक कर लिया है, निकल रहा हूँ मै।"

"आज इतनी जल्दी क्या है निखिल को' रचना सोचने लगी I

उसने बाहर कमरे में आकर समय देखा, दस बज गए थेI आज उसे हर हाल में दो बजे से पहले पोस्ट ऑफिस जाकर अपनी कविता पोस्ट कर देनी है I लगभग एक महीने पहले अपने बेटे को हिंदी कविता पढ़ाते समय उसके दिमाग़ में एक बहुत पुराना दबा हुआ कीड़ा फिर रेंगने लगा थाI कॉलेज के दिनों में वो कविता लिखती थी और तारीफ भी पाती थीI फिर सब छूट गयाI कुछ दिन पहले एक अखबार में उसने कविता भेजने का आमंत्रण पढ़ कर…

Continue

Added by pratibha pande on July 12, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

सनकी ( लघुकथा )

विदेशी कुर्सी,दुनिया की नम्बर एक साॅफ्टवेयर कम्पनी , लाखों का पैकेज। ....लेकिन मन...? एक बंधन सदा मन को जकड़े रहता था । कितने वेब डिजाइन किए।पर प्रोजेक्ट की सफलता खुशी कहाँ दे पाती थी ।



देश के प्रति जिम्मेदारी ....

वतन की मिट्टी की पुकार ,अपने बन्धन में जकड़ रही थी ।



उसके भारतीय सहकर्मी भी विदेशी नीति से संतुष्ट नहीं थे ।



गिरीश के नेतृत्व में जब उनलोगो ने लाखों के पैकेज वाली नौकरी से इस्तीफ़ा दिया तो सहयोगियों ने उन्हें " सनकी " की उपाधि से नवाज़ा… Continue

Added by kanta roy on July 12, 2015 at 1:33pm — 10 Comments

लेखक मंडी ( हास्य )



कवि सम्मेलन

---------------

ट्रिन-ट्रिन

''हेलो '' लेखक मंडी

''दो दर्जन कवि , दोपहर ११ बजे , राम नाथ हाल, बेहाल मंडी भेज दीजिए''

''दहाड़ी कितनी ?

फिर दिमाग खराब हो गया तुम्हारा , दूसरे जिले से मंगवा लूँ ?मारे -मारे घूम रहे हैं। न इन्हें कोई सुनता , न छापता और न ही पढता।

'' फिर भी , कुछ तों देना ही होगा ''

'' २ टाइम चाय, बिस्कुट., ''

''बस, और कुछ नही भूखे मर जायेंगे बेचारे ''

''अभी कौन जिन्दा है ''

''कुछ तों बढाइये , बाल बच्चे दार…

Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 12, 2015 at 12:30pm — No Comments

सेवानिवृत्ति (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘अरे बहू ! चाय नहीं लाई अभी तक, और अखबार कहाँ है, मेरा शेव का सामान भी नज़र नहीं आ रहा।

‘बाबू जी, पहले बच्चों को तैयार करके स्कूल भेज दूँ फिर आपके लिए चाय बनाती हूँ। अखबार तो अभी मुन्नी के पापा पढ़ रहें है आप बाद में आराम से पढ़ लेना। और अब आपको हर रोज़ दाढ़ी बनाने की क्या ज़रूरत ही ? आपको अब कौन सा दफ्तर जाना है।’…

Continue

Added by Ravi Prabhakar on July 12, 2015 at 11:00am — 11 Comments

दिन बड़े ख़ुशहाल रातें भी सुहानी हो गई (ग़ज़ल)

२१२२-२१२२-२१२२-२१२



आपका आना हमारी ज़िन्दगी में यूँ हुआ

दिन बड़े ख़ुशहाल रातें भी सुहानी हो गई



जो सुनी थी या पढ़ी हमने किताबों में फ़क़त

आज बातें वो सभी मेरी कहानी हो गई



चाहतें कोई नहीं , बन्धन न था कोई यहाँ

आपकी मेरी ये' यारी बस रुहानी हो गई



आज दुनिया कर रही अपनी वफ़ाओं काे बयाँ

देखकर मेरी वफ़ा देखो सयानी हो गई



इस क़दर था पुर असर उनका वो* अन्दाज़े बयाँ

सुन कहानी कान्त ये दुनिया दिवानी हो गई ।।

.

मौलिक…

Continue

Added by K K Dwivedi on July 12, 2015 at 10:00am — 6 Comments

आशिक हो पर..........."जान" गोरखपुरी

२२१२      २२१२      २२

 

फ़रियाद ये मेरी सुनो कोई

दो इश्क में मुझको डबो कोई

..

सात आसमां पार उनका गर है शह्र

कू-ए-सनम ही ले चलो कोई

..

है दोजखो जन्नत मुहब्बत में

आशिक हो पर शायर न हो कोई

..

जाने गज़ल तुम मुझको दो थपकी

बरसों न पाया मुझमें सो कोई

..

‘जान’ आखिरी वख्त अपना जाने कौन?

लो प्रीत के मनके पिरो कोई

.

जीने की ख्वाहिश फिर न जाग उट्ठे

मरता हूँ नाम उस का न लो…

Continue

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 12, 2015 at 9:30am — 11 Comments

दोहा छंद...सब पीतीं मकरंद

मुरली तो मन मोहनी, हरे जगत की पीर.

उसे चुरा कर राधिका, स्वयं हुई गम्भीर.

 

मुरली हर मन मोहती, लिये फकीरी रूप.

सरस कण्ठ निष्काम रख,…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 11, 2015 at 8:30pm — 4 Comments

अँधा (लघुकथा)

“अरे बाबा ! आप किधर जा रहे है ?,” जोर से चींखते हुए बच्चे ने बाबा को खींच लिया.

बाबा खुद को सम्हाल नहीं पाए. जमीन पर गिर गए. बोले ,” बेटा ! आखिर इस अंधे को गिरा दिया.”

“नहीं बाबा, ऐसा मत बोलिए ,”बच्चे ने बाबा को हाथ पकड़ कर उठाया ,” मगर , आप उधर क्या लेने जा रहे थे ?”

“मुझे मेरे बेटे ने बताया था, उधर खुदा का घर है. आप उधर इबादत करने चले जाइए .”

“बाबा ! आप को दिखाई नहीं देता है. उधर खुदा का घर नहीं, गहरी खाई है…

Continue

Added by Omprakash Kshatriya on July 11, 2015 at 6:00pm — 18 Comments

लाठी (लघुकथा )

" पिताजी , मुझे प्रोन्नत कर आप ही के दफ़्तर में स्थानांतरित कर दिया गया है ।निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ , बेटे या बॉस की भूमिका में किसे चुनूँ ? "
" 'अफकोर्स !' बॉस की ।रहा तुम्हारे अधीन काम करना , तो बेटा.. , पिता भले ही संतान को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाये परंतु , उसे पिता होने का वास्तविक अहसास तभी होता है , जब संतान के कदम , आगे हों और हाथ लाठी बन पीछे ।

.
मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on July 11, 2015 at 5:00pm — 10 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
18 hours ago
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service