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दिन बड़े ख़ुशहाल रातें भी सुहानी हो गई (ग़ज़ल)

२१२२-२१२२-२१२२-२१२

आपका आना हमारी ज़िन्दगी में यूँ हुआ
दिन बड़े ख़ुशहाल रातें भी सुहानी हो गई

जो सुनी थी या पढ़ी हमने किताबों में फ़क़त
आज बातें वो सभी मेरी कहानी हो गई

चाहतें कोई नहीं , बन्धन न था कोई यहाँ
आपकी मेरी ये' यारी बस रुहानी हो गई

आज दुनिया कर रही अपनी वफ़ाओं काे बयाँ
देखकर मेरी वफ़ा देखो सयानी हो गई

इस क़दर था पुर असर उनका वो* अन्दाज़े बयाँ
सुन कहानी कान्त ये दुनिया दिवानी हो गई ।।
.
मौलिक ऐवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by K K Dwivedi on July 14, 2015 at 10:20am
आप सभी मित्रों का ह्रदय पूर्वक आभार सर्व श्री नरेन्द्र चौहानजी, गुमनाम पिथौरागढी जी एवं डाॅ गोपालनारायण श्रीवास्तव जी ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 14, 2015 at 9:28am

बढ़िया  गजल हुयी है .

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 13, 2015 at 9:48pm

वाह बहुत खूब सर जी वाह ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by narendrasinh chauhan on July 13, 2015 at 1:48pm

खूब सूरत गज़ल

Comment by K K Dwivedi on July 13, 2015 at 9:53am
आपका हार्दिक आभार परम आदरणीय गिरिराज भण्डारी जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 13, 2015 at 8:49am

आदरणीय  के के द्विवेदी भाई , बहुत खूब सूरत गज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ गज़ल के लिये ॥

कृपया ध्यान दे...

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