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गीत (समीक्षार्थ)

 

मनवा गाये, मनवा गाये,

मोरा मनवा गये रे



इक गौरैया घर में आई

चुन-चुन तिनका नीड़ बनायी

किया है उसने प्रियतम संग फिर

प्रेम सगाई रे

मनवा गाये मनवा गाये ................



इत्-उत् मटक-मटक दिखलाती

पिया को अपने खूब रिझाती

नित अठखेलियाँ करते दोनों

ज्यूँ भँवर बौराई रे

मनवा गाये ..................................



इक दूजे रंग रंगने लगे थे

प्रणय निवेदन करने लगे थे

आने को थी संतति उनकी

हुए सुखारे रे…

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Added by Meena Pathak on July 7, 2015 at 10:05pm — 7 Comments

हवन और दानव ( लघुकथा )

अनुष्ठान में पंडितों का जमावड़ा , हवन और मंत्रों के जाप से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र और सुवासित हो उठा था । प्राँगण में महिलाओं का समूह बैठकर बडे उत्साह से ढोल मंजीरे लिये भजन गा रहा था । 

एक पंडित ने अनुष्ठान के आमदनी पर सवाल उठाये कि मंदिर कार्यकर्ताओं में खलबली मच गई ।
पल भर में ही देव सारे विलुप्त हो गये अनुष्ठान में सिर्फ दानवों का अधिपत्य हो गया ।



कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

Added by kanta roy on July 7, 2015 at 9:30pm — 10 Comments

हमें भी न आया

हमें भी न आया 

 

तू ऐसा बीज थी

जिसे न मिली धूप

न हवा, न पानी

और न कोई खाद 

फिर भी तू पनपी 

पनपी ही नही  

बन गयी एक पेड़

बरगद सी छाया

 

फिर तूने बसाया

अपना संसार 

और कहलाई माँ

फिर बांटी तेजस धूप

पवन में भरी गंध

दूध से सींचे पौधे

हृदय को मथकर

लाई खाद

हुए तेरे

लख-लख पूत आबाद…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2015 at 8:38pm — 15 Comments

सिर्फ देखा है जी भर के …

सिर्फ देखा है जी भर के …

सिर्फ देखा है जी भर के  हमने तुम्हें

इस ख़ता पे  न  इतनी सज़ा दीजिये

ज़िंदगी भर हम ग़ुलामी करेंगे मगर

रुख़ से चिलमन ज़रा ये हटा दीजिये

सिर्फ देखा है जी भर  के हमने तुम्हें

इस ख़ता पे न  इतनी  सज़ा दीजिये

हम फ़कीरों  का  दर कोई होता नहीं

हर दर  पे  फ़कीर  कभी  सोता नहीं

अब  खुदा  आपको  हम बना बैठे हैं

अब पनाह दीजिये या मिटा दीजिये

सिर्फ देखा है जी भर के हमने तुम्हें

इस ख़ता पे न…

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Added by Sushil Sarna on July 7, 2015 at 4:15pm — 18 Comments

सलीक़ा सड़क का (लघुकथा)

पुलिस के सिपाही अकसर चौराहे से नदारद रहते, । सरकारी ड्यूटी बीच में छोड़ किसी अपने निजी काम से निकल जाते।  किन्तु उनके जाते ही एक वृद्ध हाथ में तख्ती लिये वहां खड़ा हो जाता, जिस पर लिखा होता:

"जिंंदगी ज़्यादा ज़रूरी है, जल्दबाज़ी न करें'

कुछ लोग रूक कर पूछ लेते

'बरसों से देख रहे है बाबा, क्यों इतनी परेशानी उठाते हो ? इस काम के लिए पुलिस है न यहाँ।"

"हाँ बेटा, पर पुलिस क्या जाने दर्द क्या होता है।"

"उनको तो सरकार तनख्वाह देती है, तुम सारा दिन क्यों खपते रहते हो…

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Added by Nita Kasar on July 7, 2015 at 1:30pm — 9 Comments

स्वतन्त्र नदी ........इंतज़ार

बरसाती नदी सी क्यूँ हो तुम ?

किसी और की मनोदशा

निर्धारित करती है तुम्हारा बहाव

किसी की मेहेरबानी से चल पड़ती हो

तो कभी सूख जाती हो

कभी सोचा है

मेरा हाल उस मछली की तरहाँ होता है

जो बचे-खुचे कीचड़ में

तड़पती है सिर्फ़ भीगने के लिये

जिंदा रहने के लिये

और जब सैलाब आता है

तो बहुत दूर बह जाती है बेकाबू

तुम कब एक प्रवाह में स्वतन्त्र बहोगी

नदी हो... पहाड़ों से टक्कर ले जीत चुकी हो

अब कोई कैसे स्वार्थ के बांध बना

रोक सकता है तुम्हारा…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 7, 2015 at 7:59am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह - कभी पत्थर नहीं देता ( गिरिराज भंडारी )

1222   1222   1222   1222

पियाला वो किसी को भी, कभी भर कर नहीं देता

जिसे वो नींद देता है , उसे बिस्तर नहीं देता

कभी शीशा छुपाता है , कभी पत्थर नहीं देता

बहे गुस्सा मेरा कैसे , ख़ुदा अवसर नहीं देता

तुम्हारी हर ज़रूरत पर नज़र वो खूब रखता है

तुम्हारी ख़्वाहिशों पर ध्यान वो अक्सर नहीं देता

खुशी तुम भीतरी मांगो तो वो तस्लीम करता  है

अगर बाहर के सुख मांगे तो वो भीतर नहीं देता

किया तुमने नहीं वादा  शिकायत फिर…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 7, 2015 at 5:30am — 18 Comments

अंकुरण ( लघुकथा )

" अरे ,रे , ये क्या कर दिया तूने | काट दिया उस पौधे को भी घाँस के साथ "| शर्माजी एकदम से चिल्ला पड़े उस छोटी लड़की पर जिसने उनसे उनकी लॉन में से घाँस काटने के लिए पूछा था |

पेपर को किनारे रखते हुए वो उठे और लगभग धक्का देते हुए उसे लॉन से बाहर निकाल दिया | " पता नहीं फिर ये अंकुरित होगा या नहीं , कितने प्यार से लगाया था "|

छोटी लड़की उदास बाहर निकल गयी | पेपर उड़ कर घाँस पर आ गिरा , उसमे हेडलाइंस चमक रही थीं " इस साल फिर एक लड़की ने टॉप किया सिविल सर्विसेज में "| 

मौलिक एवम…

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Added by विनय कुमार on July 7, 2015 at 2:28am — 12 Comments

बेटियाँ ( कविता )

बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं !!



वो तो होती हैं-

सृष्टि की अद्भुत कल्पना 

आनंददायक भावना।

वो रहती हैं-

आँगन की हवाओं में

पिता की दुआओं में ।

तभी तो खिल जाती है 

एक स्नेहिल मुस्कान 

हर लेती जो कितनी थकान।

बांटती है हमेशा-

खुशियों की सत्त्व-दीप्ति

मधुर जीवन संस्कृति।

वैसी कोई दूजी सुवास नहीं होती ।

क्योकिं बेटियाँ कभी उदास नहीं होतीं !!



वो तो दूर करती हैं-

उदासी, दोनों ही घरों…

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Added by विनय कुमार on July 6, 2015 at 8:00pm — 16 Comments

ढाढ़स (लघुकथा)

लैपटाप बेटी के हाथों में देख माता -पिता प्रसन्न थे हो भी क्यों न आखिर चीफ़ मिनिस्टर साहब से जो मिला था | उनकी बेटी पुरे गाँव में अकेली प्रतिभाशाली छात्रों  में चुनी गयी थी |

पूरा कुनबा लैपटाप के डिब्बों में कैद तस्वीरें देखने बैठ गया |

"बिट्टी इ सब का हैं ? लाल-पीला |" माँ पहली बार रंगबिरंगे भोजन को देख पूछ बैठी |

"अम्मा, ये लजीज पकवान हैं | बड़े बड़े होटलों में ऐसे ही पकवान परोसे जाते हैं और घरो में भी ऐसे ही तरह तरह का भोजन करते हैं लोग |"

"और दाल रोटी ?"

"अम्मा, दाल…

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Added by savitamishra on July 6, 2015 at 7:30pm — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दो गज़लें

1.

फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फाइलुन

२२ २२ २२ २२ २१२ 

बहरे मुतदारिक कि मुजाहिफ सूरत 

************************************************************************************************************************

जब से वो मेरी दीवानी हो गई 

पूरी अपनी राम कहानी हो गई 

काटों ने फूलों से कर लीं यारियां 

गुलचीं को थोड़ी आसानी हो गई 

थोड़ा थोड़ा देकर इस दिल को सुकूं

याद पुरानी आँख का पानी हो गई 

सारे बादल…

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Added by Rana Pratap Singh on July 6, 2015 at 7:00pm — 28 Comments

बह्र : हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

 

हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

सीख लिया हमने भी चलना पानी पर

 

राह यही जाती रूहानी मंजिल तक

दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

 

नहीं रुकेगा निर्मोही, मालूम उसे

फिर भी दीपक रखती बहते पानी पर

 

दुनिया तो शैतान इन्हें भी कहती है

सोच रहा हूँ बच्चों की शैतानी पर

 

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर

----------

(मौलिक एवं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:30pm — 24 Comments

लघु कथा मट्ठियाँ

अम्मा  फ़ैल कर  जमीन पर   बैठी  आवाज़  करके  चाय  सुड़क  रही  थी I  मैं  अपने  दोनों  बच्चों  के  चेहरों  पर,  अम्मा  को  लेकर चिढ      साफ़  देख  पा  रही  थी I

" सविता  , तू  डब्बा भर के  मट्ठियाँ  क्यों  नहीं  बना  के  रख लेती ,I  सुबह  शाम  पकड़ा  दिया कर इनके हाथों में I दिन  भर  तंग  करते  हैं ये बना  वो  बना I"

" माँ , इन्हें  पसंद  नहीं  है मट्ठियाँ I"

" पसंद  नहीं  हैं ? अरे  तुम्हारी  मम्मा  की  बुआ , गर्मी  की छुट्टियों  में  आती  थी , दो  महीने  के  लिए अपने…

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Added by pratibha pande on July 6, 2015 at 6:16pm — 12 Comments

ज़माना (ग़ज़ल)

1222 /  1222  /1222 / 1222

--------------------------------------------------

जमाना बाज कब आता है हमको आजमाने से

न हो जाना कहीं जख्मी कभी इसके निशाने से  

       

हमेशा जंग वो जीता किये हों सर कलम जिसने 

कभी जीता नही कोई भी अपना सर कटाने से 

 

करे जो बात दुनिया की उसी की लोग सुनते हैं

किसी को वास्ता कैसा भला तेरे फसाने से 

 

कभी धेला तलक बांटा नहीं जिसने कमाई का

लगा है बांटने सिक्के वो सरकारी खजाने…

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Added by Sachin Dev on July 6, 2015 at 3:00pm — 22 Comments

एक था टाईगर (लघुकथा)

एक दिन वह अपने जर्मन शेफर्ड को सुबह घुमाने ले गई तो गलती से एक व्यक्ति के घर पर बंधा पामेरियन भी था , पामेरियन भौंका तो टाइगर ने जंजीर को तेजी से छुड़ाते हुए पास में बंधे एक पामेरियन को दबोच लिया ।

"टाइगर इधर आओ छोड़ो उसको " बिटिया चिल्लाई 

वहां खड़े और लोग भी पामेरियन को बचाने में जुट गये। और उस लड़की को  भला बुरा कहने लगे:

"जब आप से कुत्ता नहीं सम्भलता तो इसे पालते क्यों हो ?

तभी किसी ने टाइगर के सर पर तेजी से लोहे की रॉड से…

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Added by Pankaj Joshi on July 6, 2015 at 3:00pm — 4 Comments

निर्माताओं से मुलाक़ात (लघु कथा)

वो मुझे साथ लेकर गया, उसे चुपचाप इंसान ढूंढना था|

सबसे पहले उसने मिलाया एक नामी शिक्षक से, जो बात करने में तेज़ था, लेकिन खुद नकल कर के उत्तीर्ण होता था|

फिर उसने मिलाया एक बड़े चिकित्सक से, जो अपनी चिकित्सा की पद्धति को सबसे अच्छा कहता और बाकी को बुरा|

फिर मिलाया तीन भिखारीयों से, जो अपने धर्म…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 5, 2015 at 10:28pm — 8 Comments

महंगी मुस्कान (लघुकथा )

महंगी मुस्कान ( लघुकथा )









" मुस्कान का व्यापारी हूँ । मुस्कान ही बेचता हूँ । कई प्रकार की मुस्कान है मेरे पास । "



" ये क्या बात हुई भला ..!!! मुस्कान का भी कोई व्यापार होता है ! "



" होता है बाबू , आजकल मुस्कान भी बिकती है । .... मुस्कान बडी ही महंगी चीज़ होती है । "



" अच्छा !! दिखाओ तो भला ... कितने प्रकार की मुस्कान है तुम्हारे पास ..??? "



" पहले जेब से पैसा निकालो , तुम्हारा जेब ही तय करेगा कि तुम पर कौन सा मुस्कान सुट… Continue

Added by kanta roy on July 5, 2015 at 9:35pm — 13 Comments

अधूरी इच्छा (लघुकथा)

बाबूजी जी के श्राद्ध कर्म में वे सारी वस्तुएं ब्राह्मण को दान में दी गयी जो बाबूजी को पसंद थे. शय्या-दान में भी पलंग चादर बिछावन आदि दिए गए. ऐसी मान्यता है कि स्वर्ग में बाबूजी इन वस्तुओं का उपभोग करेंगे. लोगों ने महेश की प्रशंशा के पुल बांधे।

"बहुत लायक बेटा है महेश. अपने पिता की सारी अधूरी इच्छाएं पूरी कर दी."
"पर दादाजी को इन सभी चीजों से जीते जी क्यों तरसाया गया?"- महेश का बेटा पप्पू बोल उठा.

.

(मौलिक व अप्रकाशित )

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 5, 2015 at 8:30pm — 22 Comments

सिगरेट की राख सी जिंदगी

कम्पनी में गबन के आरोप में वह आज पांच साल की कैद काट कर वह जेल से छूटा तो सीधे दिव्या के घर पहुँचा । दिव्या नहीं मिली । वह काम पर गई थी । उसने उसके मोबाइल पर उसी जगह मिलने का समय दिया जहाँ वह अक्सर मिला करते थे ।

"मुझे भूल जाओ तुम । अब मेरी जिंदगी में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है ।" सिगरेट सुलगाते ही उसकी आवाज सुनाई दी ।

"पर यह सब तो मैंने तुम्हारी ख़ुशी के लिये किया था ? " सुनते ही उसका दिल रो पडा जैसे ।

"मेरी ख़ुशी या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये ....! मेरी ख़ुशी तो…

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Added by Pankaj Joshi on July 5, 2015 at 5:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये

2212 2212 2212





मीआ़दे उल्फ़त देखिये पूरी हुई

इतनी सी तब तो बात अब उतनी हुई.



क्या इश्क़ में दुनिया से तू भी तंग है

क्या तंज़ तुझ पे भी मेरे जैसी हुई.



दौरे गुज़श्ता ने असर कुछ यूँ किया

टूटा हुआ मैं,तू भी है टूटी हुई.



पाया है जो मेयार तेरे इश्क़ ने

लो! ज़िन्दगी क्या! रूह भी तेरी हुई.



ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़

देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.



उनसा खिला गमले में इक तो गुल, अरे!

ख़ुशबूू भी… Continue

Added by shree suneel on July 5, 2015 at 5:00pm — 38 Comments

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