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ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

1222    1222    1222     1222

*********************************

जहन  की  हर  उदासी  से  उबरते तो सही पहले

जरा तुम नेह के पथ से गुजरते  तो सहीे पहले

**

हमारी  चाहतों  की  माप  लेते  खुद ही गहराई

जिगर  की  खोह में थोड़ा उतरते तो सही पहले

**

ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक

हमारे  नाम  पर  थोड़ा  सॅवरते तो सही पहले

**

तुम्हें भी धूप सूरज की बहुत मिलती दुआओं सी

घरों  से  आँगनों  में  तुम  उतरते तो सही पहले

**

गलत फहमी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2014 at 9:30am — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जय-जय कन्हैया लाल की.. (नवगीत) //--सौरभ

लिख रही हैं यातनायें

अनुभवों से

लघुकथायें -

मौसम-घड़ी-दिक्काल की !

जय-जय कन्हैया लाल की !!



शासकों के चोंचले हैं   

लोग गोवर्द्धन उठायें

हम लुकाठी…

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Added by Saurabh Pandey on August 17, 2014 at 2:00am — 26 Comments

चार ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)

(चार ग़ज़लें)

1

रास्तों को देखिए कुछ हो गया है आजकल

इस शहर में आदमी फिर खो गया है आजकल

 

काँपते मौसम को किसने छू लिया है प्यार से

इस हवा का मन समंदर हो गया है आजकल

 

अजनबी-सी आहटें सुनने लगे हैं लोग सब

मन में सपने आके कोई बो गया है आजकल

 

मुद्दतों तक आईने के सामने था जो खड़ा

वो आदमी अब ढूँढने खुद को गया है आजकल

 

आदमी जो था धड़कता पर्वतों के दिल में अब

झील के मन में सिमटकर सो…

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Added by Dr. Rakesh Joshi on August 16, 2014 at 6:00pm — 37 Comments


प्रधान संपादक
बलिदानी - (लघुकथा)

मँच पर बुला बुला कर उन सभी बुज़ुर्गों को सम्मानित किया जा रहा था जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था. उनमें से किसी ने जेल काटी थी, किसी ने अंग्रेज़ों की लाठियां खाईं थीं, कोई सत्याग्रह में शामिल था तो कोई भारत छोडो आंदोलन में. उन सभी की देशभक्ति के कसीदे मँच पर पढ़े जा रहे थे. हाथ में तिरँगा पकडे एक बूढा यह सब देख देख मुस्कुराये जा रहा था. जब भी किसी को सम्मान देने के लिए बुलाया जाता तो वह झट से दूसरों को बताता कि यह उसके गाँव का है, या उसका दोस्त है या उसका जानकार है. पास ही खड़े एक…

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Added by योगराज प्रभाकर on August 16, 2014 at 10:30am — 20 Comments

'संस्कार' कहानी

सुमन बदहवास सी घटना स्थल पर पहुंची, अपने बेटे प्रणव की हालत देख बिलखने लगी| भीड़ की खुसफुस सुन वह सन्न सी रह गयी, एक नवयुवती की आवाज सुमन को तीर सी जा चुभी "लड़की छेड़ रहा था उसके भाई ने कितना मारा, कैसा जमाना आ गया ......|" "अरे नहीं, 'भाई नहीं थे', देखो वह लड़की अब भी खड़ी हो सुबक रही है" बगल में खड़ी बुजुर्ग महिला बोली  ....यह सुन सुमन का खून खौल उठा,  और शर्म से नजरें नीची हो गयी| प्रणव पर ही बरस पड़ी "तुझे क्या ऐसे 'संस्कार' दिए थे हमने करमजले, अच्छा हुआ जो तेरे बहन नहीं है| प्राण ..."मम्मी…

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Added by savitamishra on August 16, 2014 at 12:00am — 22 Comments

हम पाखी जिन बाग वनों के //गज़ल//कल्पना रामानी

हम पाखी जिन बाग वनों के, हरें वहाँ से शूल।

चन्दन सी जो खुशबू बाँटें, उपजाएँ वे फूल।

 

सावन साधें,…

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Added by कल्पना रामानी on August 15, 2014 at 9:30pm — 10 Comments

आज़ादी और दीवाने (लघुकथा)

बाजार से गुजरते हुए उसने एक बहेलिए के पास पिंजरे में कैद कुछ पंछी देखे। बहेलिए को पैसे देकर उसने पिंजरा खोल दिया। पिंजरा खुलते ही एक पंछी फुर्र से उड़ता आसमान की तरफ लपका। अनायास कुछ चीलें आई और उन्होनें उस पंछी को दबोच लिया। उड़ने के लिए तैयार बाकी पक्षी सहम कर पिंजरे में दुबक गए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on August 15, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

नज़्म - वो शख़्स मुझको मिल गया - (ज़ैफ़)

(2122 2122 2122 212)



दो दिलों ने एक होने का किया है फ़ैसला,

अब हमारे दरमियाँ कोई भरम होगा नहीं।

मैं तुझी पे वार दूँ जो कुछ भी मेरे पास है,

इक दफ़ा बस बोल दे, ये प्यार कम होगा नहीं।



जो उजाला चाहिए था ज़िंदगी के वास्ते,

वो तिरी सूरत की मीठी धूप में मुझको मिला।

मैं जिसे भी ढूँढता था हर चमन में, बाग़ में,

वो महकता फूल तेरे रूप में मुझको मिला।



आज सबके सामने, करता हूँ इज़हारे-वफ़ा,

हाँ तिरी चाहत में मेरी जाँ गयी औ' दिल गया,

ज़िंदगी से,… Continue

Added by Zaif on August 15, 2014 at 5:34am — 5 Comments

आज पंद्रह अगस्त है । (आलेख)- अन्नपूर्णा बाजपेई

आज पंद्रह अगस्त है, देश की स्वतंत्रता की याद दिलाने वाला एक राष्ट्रीय पर्व । एक ऐसा दिवस, जब स्कूल-कालेजों में मिठाई बंटती है, जिसका इंतजार बच्चों को रहता है – बच्चे जो अपने प्रधानाध्यापकों की उपदेशात्मक बातों के अर्थ और महत्त्व को शायद ही समझ पाते हों । एक ऐसा दिवस, जब सरकारी कार्यालयों-संस्थानों में शीर्षस्थ अधिकारी द्वारा अधीनस्थ मुलाजिमों को देश के प्रति उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है, गोया कि वे इतने नादान और नासमझ हों कि याद न दिलाने पर उचित आचरण और…

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Added by annapurna bajpai on August 14, 2014 at 1:30pm — 7 Comments

नहीं बदले हम - डॉo विजय शंकर

समय सरसठ साल

कम नहीं कहलाता है

एक अबोथ शिशु

वयोवृद्ध हो जाता है |

बदले कोई तो दुनियाँ

जहान बदल जाए

न बदले तो जमीं क्या

पावदान न बदल पाये |

बहुत कुछ बदला , नहीं बदला ,

आदमी का आदमी के प्रति रुख

नहीं बदला आदमी का

आदमी के प्रति व्यवहार |

बदले हैं तो उपकरण ,

कपड़े और कीमतें ,

सत्ता के नायक और आका

सत्ता के गलियारों के लोग |

नहीं बदली हमारी दृष्टि ,

न ही हमारी सोच |

सरकार हम बन गए ,

सरकार हम दे न पाये… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 14, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

इज़्ज़त (लघुकथा)

" ये सब छोड़ क्यों नहीं देती ", कपड़े पहनते हुए उसने कहा । "एक नयी जिंदगी शुरू करो, इस गन्दगी से दूर, इज़्ज़त की जिंदगी" ।

"ऐसा है, ऐसे भाषण देने वाले बहुत मिलते हैं, लेकिन कपड़े पहनने के बाद । और ये काम मैं किसी के दबाव में नहीं करती, अपनी मर्ज़ी से करती हूँ और अच्छे पैसे भी मिल जाते हैं । मुझे पता है ज्यादे दिन नहीं चलना है ये , इसीलिए भविष्य के लिए भी कमा लेना चाहती हूँ । एक बात और, इज़्ज़त जब तुम लोगों की नहीं जाती, तो मेरी क्यों जाएगी" ।

  

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 13, 2014 at 11:30pm — 11 Comments

बंधन

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

नारी  का   जननी में ढलना

जीवन का जीवन में पलना

 

नभ पर मधु-रहस्य-इन्गिति के आने का अवसर लाते है

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

जग में  धूम मचे   उत्सव की

अभ्यागत के पुण्य विभव की

 

मंगल साज बधावे लाकर प्रियजन मधु-रस सरसाते  हैं

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

आशीषो      के   अवगुंठन   में

शिशु अबोध बंधता बंधन में

 

दुष्ट ग्रहों से मुक्त कराने स्वस्ति लिए ब्राह्मण…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 13, 2014 at 8:30pm — 15 Comments

बलिदानी.....तुकांत कविता

देख तेरे देश की हालत क्या हो गयी बलिदानी

कितना बदल गया है यहाँ हर एक हिन्दुस्तानी|



की क्यों तुने स्वदेश पर मर मिटने की नादानी

अपनों में ही खोया यहाँ हर एक हिन्दुस्तानी|



की क्यों तुने स्वदेश पर मर मिटने की नादानी

अपनों में ही खोया यहाँ हर एक…

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Added by savitamishra on August 13, 2014 at 8:00pm — 9 Comments

लक्ष्य हमारा

आकाश में उड़ने की चाह लिये

कल्पना रूपी पंखों को फैलाने की कोशिश करता हूँ

पर

अक्सर नाकाम होता हूँ

उस ऊँची उड़ान में,

फिर भी आस लगाये रहता हूँ

कि कभी तो वो पर निकलेंगे

जो मुझे ले जायेंगे

मेरे लक्ष्य की ओर,

और अनवरत ही

बढता जाता हूँ

अथक प्रयास करते हुए

सुनहरे ख्वाब की ओर अग्रसर करने वाले पथ पर।…

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Added by Pawan Kumar on August 13, 2014 at 12:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अकड़न - अतुकांत -(गिरिराज भंडारी)

‘ अकड़न ’  

*********

जहाँ कहीं भी अकड़न है

समझ लेने दीजिये उसे

अगर वो ये सोचती है कि, दुनिया है , तो वो है

तो ये बात सही भी हो सकती है

और अगर वो ये सोचती है कि , वो है, इसलिए दुनिया है

तो फिर उसे देखना चाहिए पीछे मुड़कर

कि, कोई भी नहीं बचा है , ऐसी सोच रखने वालों में से

और दुनिया आज भी है ,

वैसे तो तुम्हारा होना बस तुम्हारा होना ही है , इससे ज्यादा कुछ नहीं

बस एक घटना घटी और तुम हो गए

एक और…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 13, 2014 at 9:30am — 17 Comments

बहुत गहरा गए हैं अंधेरे हर सू

बहुत गहरा गए हैं अंधेरे हर सू

रोशनी की किरन अब कहां खोजें

 

गुम हो गई है कहां दुनिया में

आओ मिल के हम वफा खोजें

 

खतावार जब कि थे हम दोनों ही

क्यूं न इक जैसी ही सजा खोजें

 

जीत जाएं न कहीं दूरियां हमसे

आओ मिल के अपनी खता खोजें

 

नफरतों के वास्ते न जगह बाकी हो

पूरे जहान में एसा कोई पता खोजें

-----प्रियंका

 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Added by Priyanka Pandey on August 12, 2014 at 11:00pm — 4 Comments

छोटी बह्र की एक ग़ज़ल-रात

जैसे जैसे बिख़री रात,

बिस्तर बिस्तर पिघली रात.

.

चाँद के साथ बदलती रँग,

काली भूरी कत्थई रात.

.

चाँद ज़मीं पर उतरा था,

हुई अमावस पिछली रात.

.

एक शम’अ थी साथ मेरे,  

फिर भी तन्हा सुलगी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 12, 2014 at 10:24pm — 15 Comments

खुरचन

गुरु लघु और लघु गुरु, आपस में है मेल

चूक हुई तों समझिये, बिगड़े सारा खेल

खीरे सा मत होइये , गर्दन काटी जाय

दुनिया से तुम तो गये, स्वाद न उनको आय



इन्द्र देव नाखुश हुए, धरती सूखी जाय

फसल बाजरा तिल करें , दूजा न अब उपाय

जग में संगत बडन की, करो सोच सौ बार

जोड़ी सम होती भली , खाओ कभी न मार



चौबे जी दूबे बने, पीटत अपना माथ

छब्बे बनने थे चले, कुछ नहि आया हाथ



मोबाइल ले हाथ में , बाला करती चैट

गिटपिट…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 12, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

एक बड़ा हादसा (लघुकथा)

फैक्ट्री में हुए एक भयानक हादसे में उसे अपनी दोनों टाँगे गंवानी पड़ गई, जबकि उसके तीन साथियों को जान से हाथ धोना पड़ा था.
"तुम्हें ठीक होनें में तो अभी बहुत समय लगेगा, जबकि एक महीने के बाद ही तुम्हारी रिटायरमेंट है। इसलिए मैनेजमेंट ने फैसला किया है कि तुम्हें एक महीना पहले ही रिटायर कर दिया जाए।”  उसका हाल चाल पूछने आए सहकर्मियों में से एक ने उसे सूचित किया

“चलो कोई बात नहीं यार, भगवान…
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Added by Ravi Prabhakar on August 12, 2014 at 6:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल (ख़्वाबों पे उसका पहरा है)

ख़्वाबों पे उसका पहरा है!

यादों का सागर गहरा है !!

चीखें वो फिर सुनाता कैसे!

मुझको तो लगता बहरा है !!

आईने में भी देखा कर !

क्या ये तेरा ही चेहरा है !!

बातें उसनें कर दी ऐसी !

दिल में सन्नाटा ठहरा है !!

कतरा -कतरा जीता हूँ मैं!

मेरे अन्दर भी सहरा है !!

*************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित 

Added by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 1:00pm — 7 Comments

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