For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

प्रेम करें खुद से ही नही इस प्रकृति से भी

भक्ति में शक्ति है1 ईश्वर की भक्ति जीवन का अंतिम लक्ष्य है1  योग साधना है1योग हो या भक्ति दोनों ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम हैं1योग हमारे शरीर, मन –मस्तिष्क को स्वस्थ रखता है और इस साधना के बगैर भक्ति संभव नही1 हम बहुत सौभाग्यशाली हैं कि हमें मनुष्य जीवन मिला1 हम जन्म से लेकर मृत्यु तक सांसारिक बंधनों में लिप्त रहतें हैं1 बल्कि हमारा उदेश्य तो सांसारिकता को छोड़कर ईश्वरीय अराधनाओं में होना चाहिए वही तो सच्चा ज्ञान है1जब तक हम शिक्षित नही होंगे पहचानेगें कैसे कि सच क्या है? हमें इस जीवन का…

Continue

Added by Pragya Srivastava on June 6, 2013 at 5:35pm — 5 Comments

महंगाई

 

आज बढ़ सकते हैं दाम

हाय राम, आम तो आम

बढ़ सकते हैं गुठलियों के भी दाम

ये महँगाई सुरसा के मुहँ की तरह

बढ़ती ही जा रही है

अपनी हरकतों से बाज नही आ रही है

सरकारी नीति यही समझा रही है

जनसंख्या वृद्धि को रोकने मे

महँगाई बहुत बढ़ी भूमिका निभा रही है

भूखे मरेंगे लोग

तरसेगें पीने के लिए जल

आज नही तो कल

जनसंख्या वृद्धि जैसी समस्या का

अपने आप निकल जाएगा हल

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Pragya Srivastava on June 6, 2013 at 5:12pm — 12 Comments

अब नहीं आयेगी बेटी

बेटियों पे कब तलक बस यूँ ही लिखते जाओगे, 

कब हकीकत की जमीं पर आ के उन्हें बचाओगे... 



क्यों नहीं उठते हाथ और क्यों न करते सर कलम,

और कितनी दामिनीयों के लिए मोमबतियां जलाओगे... 

आज कहते हो की प्यारी होती है सब बेटियां, 

खुद मगर कब बेटों की चाह से निजात पाओगे... 

जानवर से इंसान बना और फिर भी रहा जानवर, 

जिस्म मानव का है पर कब इंसानी रूह लाओगे... 

छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां, 

इस जमीं को कब उसके चलने लायक…

Continue

Added by Roshni Dhir on June 6, 2013 at 4:46pm — 32 Comments

मेरे अपने कब थे तुम

मेरे अपने  कब थे तुम

गैरों के तुम सदा हुए 
सब्जबाग था प्यार तुम्हारा 
सारे वादे दगा हुए
दिल की बातें कह डाली है 
अपने कर्जे अदा हुए 
तुम निर्दोष हमेशा क्यों 
हम दोषी सर्वदा हुए 
मुझको ख़ारिज करने वाले 
ले हम तो अब दफा हुए 
                        अंजनी 
मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Anjini Rajpoot on June 6, 2013 at 3:51pm — 13 Comments

ये आदत अच्छी नही तुम्हारी

ये आदत अच्छी नही तुम्हारी

मेरा दिल जलाने की

तुम्हारा ही घर जलता है

आदत से बाज आ जाओ ....



न सुनते हो न समझते हो

बिना बात के मुझ पर बरसते हो

तुम्हारा ही चैन खोता है

आदत से बाज़ आ जाओ…

Continue

Added by Sonam Saini on June 6, 2013 at 2:20pm — 16 Comments

जल से भरा सरोवर |

एक मीन गंदा करती है  , पर सारे होते बदनाम | 
सच्चाई कोई ना जानें , लग जाता  सब पर इलजाम |
नकली ही बन जाता असली ,  झूम कर  घूमे खुलेआम |
पुलिस वाले ढूढते रहते , असली का ना…
Continue

Added by Shyam Narain Verma on June 6, 2013 at 12:30pm — 12 Comments

जिंदा है आदमी यहाँ उम्मीदों के सहारे

जिंदा है आदमी यहाँ  उम्मीदों के सहारे

मझधार फंसी कश्ती भी लगती है किनारे

देखे नहीं गए हैं  कभी मुझसे दोस्तों

यारों की आँखों बहते हुए अश्कों के धारे

पागल भी, शराबी भी, दीवाना…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on June 6, 2013 at 12:27pm — 11 Comments

ग़ज़ल// कोई मौसम नहीँ होता!

किसी की याद आने का,कोई मौसम नहीँ होता,

अश्क फुरकत मेँ बहाने का,कोई मौसम नहीँ होता!



कौन जाने कब वफा से,बेवफा हो जाये को

फ़रेब इश्क मेँ खाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

राहे उल्फ़त मेँ देखा है,हमने आसियां बनाकर,

दिल पे चोट खाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

उम्र भर का निभाई साथ कोई,यह ज़रुरी तो नहीँ,

पल मेँ बिछड़ जाने का,कोई मौसम नहीँ होता!

अजनबी सी राहोँ मेँ हमसफर मिल जाते…

Continue

Added by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 11:30am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
विवाह की इकतीसवीं वर्षगाँठ :

 

सपना-अरुण निगम

(मदिरा सवैया = भगण X7+गुरु)

 

ब्याह हुये  इकतीस सुहावन  साल भये नहिं भान हुआ…

Continue

Added by अरुण कुमार निगम on June 6, 2013 at 9:30am — 16 Comments

ओ बी ओ आभार

छपती नहिं कविता कभी, करे ताक कवि-ताक

कविता-संग्रह पर ग्रहण, अवसर-ग्रहण तपाक ।…

Continue

Added by रविकर on June 6, 2013 at 8:30am — 8 Comments

हरी भरी धरती

हरी भरी धरती मन मोहती है ,

चहुं ओर फैली हरियाली मोहती है ,

मुसकुराते खिले कुसुम मोहते हैं,

झूमते पेड़ पौधे मन मोहते है ।

 

अद्भुत है धरती का सौंदर्य ,

कल कल करती नदिया बहती ,

चम चम करते पोखर तालाब ,

अद्भुत अनुपम धरा है दिखती।

 

किन्तु .....................

ऐ! धरती पुत्र आज तो ,

धरती माँ न ऐसी दिखती है,

टप टप गिरते आँसू बस रोती है,

मेरा श्रंगार करो बस ये ही कहती है।

 

किन्तु आज…

Continue

Added by annapurna bajpai on June 6, 2013 at 8:00am — 18 Comments

ऐ दोस्त ! खुशतरीन वो मंज़र कहाँ गए

दोस्तो, एक और ग़ज़ल जो होते होते मुकम्मल हुई है, आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ जैसी लगे वैसे नवाजें   ....



ऐ दोस्त ! खुशतरीन वो मंज़र कहाँ गए

हाथों में फूल हैं तो वो पत्थर कहाँ गए



डरता हूँ मुझसे आज के बच्चे न पूछ लें

तितली कहाँ गईं हैं, कबूतर कहाँ गए…



Continue

Added by वीनस केसरी on June 6, 2013 at 12:30am — 34 Comments

मेहनत |

हार जीत का खेल अजब है , यारों निराश ना होना |
मेहनत से कभी  ना डरना ,  देखो  साहस ना खोना | 
बिना पसीना खेती ना हो ,  फिर बदले मौसम का रोना | 
बिना पसीना खेती ना हो , …
Continue

Added by Shyam Narain Verma on June 5, 2013 at 6:01pm — 5 Comments

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

दोहन करते प्रकृति का, बड़े बड़े विद्वान्

चला चला बस योजना, बनते खूब महान

बनते खूब महान , हरे जंगल कटवाते

दूषित कर परिवेश, कारखाने बनवाते

धरा बचाने आज, नहीं आने मनमोहन

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

 

संदीप पटेल “दीप”  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 5:55pm — 13 Comments

मेरा ख्याल

बारिशो के 

मौसम में 
मन जब 
चाहे किसी के 
साथ दूर तक 
ठहल आने को …
Continue

Added by दिव्या on June 5, 2013 at 5:00pm — 24 Comments

इनसे नाता जोड़



परिचय करते वक्त ही,  पहले पूछे नाम

परिचय सुद्रड़ हो तभी, करे बात की काम॥ 



परिचय देवे पेड़ का, बच्चे को बतलाय,

इनके क्या क्या नाम है,अच्छे से समझाय 

 

कन्द मूल खाकर रहे, वन में सीता राम,

चौदह वर्षों तक किया,…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2013 at 4:30pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वो खुदाया पास मेरे आ रही है (ग़ज़ल)

बहर --रमल मुसद्दस सालिम 

2122   2122   2122

 

उम्र जितनी तेज़ बढती जा रही है 

वो खुदाया पास मेरे आ  रही है 

 

राह में किस मोड़ पर हो जाए मिलना  

जिन्दगी ये सोचती सी  जा रही है 

 

क्या किसी तूफ़ान का संकेत है ये 

रेत  में बुलबुल नहा कर  जा रही है

 

जानते हैं  भाग्य अपना पीत  पत्ते

फ़स्ल देखो पतझड़ों की आ रही है  

 

खुल गयीं  हैं जुल्फ उसकी आज शायद 

वादियों…

Continue

Added by rajesh kumari on June 5, 2013 at 3:30pm — 33 Comments

प्रगति के महल

आओ ज़रा शहर निहारें

चमचमाती सड़कों पर

चमचमाती कारें

ऊँचे ऊँचे दीप्ति खंभ

अँधेरे को पीते

बड़े बड़े लट्टू

रग रग में संचरित होता दंभ



सुन्दर बाग़

ये महल अटारी

मशीन भारी भारी

और कुछ बड़ी बीमारी



सब तन रहा है

गाँव गाँव

अब शहर जो बन रहा है

बढ़ रहा है

धीरे धीरे

अटारी पर अटारी

तानी जा रही हैं

जो प्रगति की निशानी 

मानी जा रही है 



बेशुध हुआ सा आदम

भागा जा रहा है

अरमानों के…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments

"दर्श तुम्हारा"



साथी!

जिस राह पे चलकर तुम जाते

वह राह मनचली

क्यों मुड़ के लौट नही आती ...



ये बैरन संध्या

हो जाये बंध्या

न लगन करे चंदा से

न जन्में शिशु तारे

बस यहीं ठहर जाये



ये शाम मुंहजली

जो मुड़ के लौट नही पाती ...



श्वासों के तार

ताने पल पल

न टूट  जायें

ये अगले पल

ले जाओ दरस  हमारा

दे जाओ दरस तुम्हारा

यह लिखती पत्र पठाती



यह राह मनचली

जो मुड़ के…

Continue

Added by वेदिका on June 5, 2013 at 11:00am — 25 Comments

पर्यावरण दिवस पर विशेष

(मत्तगयन्द सवैया छन्द ७ भगण २ गुरु)

सोच विचार करें अब भोग प्रसार कुनीति नहीं घटती हैं
मानव में पशु वास हुआ लख स्वार्थ प्रवृत्ति नहीं नटती हैं
वृक्ष चिरें वह वृक्ष नहीं नित भूमि भुजा सुन लो फटती हैं
गाय कटें वह गाय नहीं प्रिय नित्य यहाँ बस माँ कटती हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ


सर्वथा मौलिक सर्वथा अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 5, 2013 at 10:36am — 11 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Saturday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service