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बिन तेरे//आबिद अली मंसूरी

कितने तल्ख हैँ लम्हे
तेरे प्यार के वगैर
यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये
जैसे कोई ख़लिश
हो हवाओँ मेँ..
डसती हैँ मुझको पल-पल
पुरवाइयां
तेरी यादोँ की
बे रंग सी लगती है
ज़िंदगी अब तो
कुछ भी तो नहीँ जैसे
इन फिज़ाओँ मेँ...बिन तेरे!

(मौलिक व अप्रकाशित)

__आबिद अली मंसूरी

Added by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 9:54am — 17 Comments

गज़ल - "परवाज़"

भले ही आज जीवन में, तेरे कायम अँधेरा है

इसी दुनिया में ही लेकिन, कहीं रौशन सवेरा है



मै इक ऐसा परिंदा हूँ, नही सीमाएं है जिसकी

मेरी परवाज़ की खातिर, ये दुनिया एक घेरा है



कभी हिंदू कभी मुस्लिम. रहे हैं हारते हरदम

सियासत खेल ऐसा है, न तेरा है न मेरा है



कुतरते ही रहे है देश को, हरदम जहाँ नेता

इसे संसद न कहियेगा, ये चूहों का बसेरा है



न जलती है न मरती है, महज़ कपड़े बदलती है

“ऋषी” इस रूह की खातिर, ये जीवन एक डेरा है …

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Added by Anurag Singh "rishi" on June 5, 2013 at 7:30am — 13 Comments

विश्व पर्यावरण दिवस और हम

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून: क्या हम आप इसमें कहीं शामिल हैं? इस वर्ष खाद्यान्न की झूठन छोड़ने और संरक्षण न करने से होती बर्बादी को रोकने पर दृष्टि है.ध्येय नारा है: सोचो, खाओ, बचाओ. …



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Added by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on June 5, 2013 at 6:00am — 9 Comments

इश्क में हो गये है शेर सब

इश्क में हो गये है शेर सब 
शेरनी की गरज पर ढेर सब 

है बनी शायरी अब फुन्तरू 
आम से हो गये है बेर सब 

हां कलम भी कभी हथियार थी 
चुटकुला अब, समय का फेर सब 

जे छपे, वे छपे, हम रह गये 

चाटने में हुई है देर सब 

खो गये मीर, ग़ालिब, मुसहफ़ी 
लिख रहे है खुदी को जेर सब 
~अमितेष 
मौलिक व अप्रकाशित 

फुन्तुरु - मजाक 
मीर - मीर तक़ी 'मीर'

ग़ालिब - असद उल्लाह खां ग़ालिब 
मुसहफ़ी - शैख़ गुलाम हम्दानी मुसहफ़ी 

Added by अमि तेष on June 4, 2013 at 11:19pm — 10 Comments

"प्रकृति क्रीडा "

अडिग खड़ा है

चिर स्थिर

पुष्प से लदा

धरा से आलिंगन करता

तरुवर की निः स्वार्थ सेवा

सम भाव

वाह!

 

सब को देखने दो कुछ क्षण

रजत जड़ी ओस की डाल

चंचल है

हिला देती है बयार

तुम भी आओ मधुप

प्रतीक्षारत है कली

मृदुल होंठो के मकरंद पी लो

 

अरे ! ये क्या ?

मेघ भी उतर रहे हैं

हँसते हुए

शांत सरोवर

सरिता

बूदों संग मिलकर

अद्भुत संगीत सुनायेंगे

 

दादुर की व्याकुलता तो देखो…

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Added by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 10:00pm — 21 Comments

पहली बरसात में! (दोहे -जवाहर)

पुष्प वाटिका बीच मुदित, बाला मन को मोह 

सुमन पंखुरी सुघर मृदुल , श्यामा तन यूँ सोह!

पनघट पर सखिया सभी, करत किलोल ठठाहि ,

छलकत जल से गागरी, यौवन छलकत ताहि!

पुष्प बीच गूंजत अली, झन्न वीणा के तार .

तितली बलखाती चली, कली ज्यों करे श्रृंगार!

पीपल की पत्तियां भली, मधुर समीरण साथ,

देखत लोगन सुघर छवी, हिय हिलोर ले साथ.

पवन चले जब पुरवाई, ले बदरा को साथ 

मन विचलित गोरी भई, आंचल ढंके न माथ…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 4, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

दि फाइनल डेस्टीनेशन/ अंतिम पड़ाव - डॉ नूतन गैरोला

हम तुम रेल की बर्थ पर बैठे ठकड़ ठकड़ कितनी देर तक वो आवाजें सुनते रहे ...शायद तुम्हारे भीतर भी एक जीवन चल रहा था और मेरे भीतर भी पुरानी यादों का चलचित्र .... शायद उन यादों की कडुवाहट उनकी मिठास को सुनने वाला समझने वाला कोई न था .... कुछ जंगल हमारे साथ चलते थे और कुछ पेड़ पीछे छूटते जाते थे ...…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on June 4, 2013 at 9:30pm — 12 Comments

अभी तो मुझे

अभी तो मुझे

दौड कर पार करनी है दूरियां

अभी तो मुझे

कूद कर फलांगना है पहाड़

अभी तो मुझे

लपक कर तोडना है आम

अभी तो मुझे

जाग-जाग कर लिखना है महाकाव्य

अभी तो मुझे

दुखती लाल हुई आँख से

पढनी है सैकड़ों किताबें

अभी तो मुझे

सूखे पत्तों की तरह लरज़ते दिल से

करना है खूब-खूब प्या....र

तुम निश्चिन्त रहो मेरे दोस्त

मैं कभी संन्यास नही लूँगा...

और यूं ही जिंदगी के मोर्चे में

लड़ता रहूँगा नई पीढ़ी के साथ

कंधे से कंधा… Continue

Added by anwar suhail on June 4, 2013 at 8:21pm — 7 Comments

तेरी यादोँ के सिलसिले!

तुझे पाने की जुस्तजू मेँ
तेरा एहसास लिए,
रोज लड़ता हूं मैँ
तन्हाइयोँ से अपनी,
चाहत की रहगुजर पर,
अक्सर दे जाते हैँ
ग़म की सौगात,
और हवा मेरे जख्मोँ को,
कितने संगदिल हैँ
यह
तेरी यादोँ के सिलसिले!
(मौलिक व अप्रकाशित)
__आबिद अली मंसूरी

Added by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 12:28pm — 14 Comments

वो एक बार तबीअत से आजमाए मुझे

एक ताज़ा ग़ज़ल आप सभी की मुहब्बतों के हवाले ....

वो एक बार तबीअत से आजमाए मुझे

पुकारता भी रहे और नज़र न आए मुझे

मैं डर रहा हूँ कहीं वो न हार जाए मुझे

मेरी अना के मुक़ाबिल नज़र जो आए मुझे



मुझे समझने का दावा अगर है सच्चा तो …

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Added by वीनस केसरी on June 4, 2013 at 1:00am — 32 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
गज़ल// डॉ० प्राची

गज़ल 

बह्र : 2122  1212  22 

जाल सैयाद नें बिछाया है 

कैद में सोन पंछी आया है..

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया है..

हारी बाज़ी पलट  सका वो ही 

संग…

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Added by Dr.Prachi Singh on June 3, 2013 at 10:30pm — 25 Comments

ख्वाबों के दिन

ख्वाबों के दिन

ख्वाबों के दिन

कब मन को तड़पाते नहीं !

सुबह की पहली किरण

जब खिड़की पर थाप देती,

चिड़ियों की चहचहाहट से

जब खुलती हैं आँखें -

ज़िंदगी एक नयी करवट लेती हुई

बिस्तर की सलवटों पर

सिकुड़ी सिमटी सी , क्यों

तटस्थ हो जाती है ?

वक़्त का हर पल

एक सुनहरा ख्वाब दिखलाता है.

कुछ सपनों के दिन,

कुछ अधूरी रातें,

खुले नैनों के द्वार से

कहाँ दौड़े चले जाते है ?

एक कसमसाहट सी होती है -

अंगड़ाई…

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Added by coontee mukerji on June 3, 2013 at 10:21pm — 11 Comments

अध्याय

अध्याय

 

एक छुवन से मेरा रिश्ता था,

वो पल,…

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Added by yatindra pandey on June 3, 2013 at 9:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल - "सितारे देखिये जब शब सियाह हो जाए"

बह्रे मुज़ारे मुसम्मन मुरक़्क़ब मक़्बूज़ मख़्बून महज़ूफ़ो मक़्तुअ



1212/ 1122/ 1212/ 22

***********************

हमें अज़ीज़ मुजद्दिद की राह हो जाए;

नज़र में शैख़ की गर हो गुनाह हो जाए;…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on June 3, 2013 at 8:30pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आईना - अरुण कुमार निगम

आईना देख कर

हो गई बावरी

नैन रतनार से

देह भी मरमरी ||…



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Added by अरुण कुमार निगम on June 3, 2013 at 8:00pm — 12 Comments

"वापस न जाइये"

दिल के करीब आइये कुछ तो बताइए
यूँ आग को सुलगा के भला क्यों बुझाइए ?

दुनिया के डर से आप को तनहा न छोडिये
बस आँख बंद कीजिए मुझमे समाइये

रोयी है बहुत आँख मुकम्मल ये जिंदगी
पलकों पे मेरी फिर नए सपने सजाइए

जीवन के ओर छोर का कुछ भी पता नही
यूँ जिंदगी में आइये वापस न जाइए

मुमकिन है थोड़ी गलतियाँ होती रही “ऋषी”
खुद को न ऐसे कोसिए न ही सताइए

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by Anurag Singh "rishi" on June 3, 2013 at 7:35pm — 7 Comments

हे मन........

हे मन.....

तोङ दे सारे बन्धन.

तोङ दे सारे घमन्ड,छोङ दे मद़ पाना हॆ तुझे अमरत्व का पद

चलना हॆ तुझे सदॆव. सतत

रहना हॆ सदा संघर्षमय प्रयासरत.

अगर तुम्हे बाँधगया कोई मायाजाल

तो कॆसे पाओगे वह शिखर विशाल

जिसके लिये तुम हो सदा से अधीर

फिर बार बार नही मिलेगा तुम्हे नश्वर शरीर

चलते ही रहना हॆ…

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Added by pankaj singh on June 3, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

चुल्लू भर पानी ( लघु कथा )

 चुल्लू भर पानी

 

चिलचिलाती धूप मे भी तेरह –चौदह वर्षीय किशोर सिर पर मलबे से भरी टोकरी उठाए बहुमंज़िली इमारत से नीचे उतर रहा था । उतरते उतरते उसे चक्कर आने लगा उसने सुबह से कुछ खाया नहीं था । उसके घर मे कोई बनाने वाला नहीं था , उसकी माँ बहुत बीमार थी उसके लिए दवा का बंदोबस्त जो करना था उसी के वास्ते वह काम करने आया था । चक्कर आने पर वह वहीं सीढियों पर दीवाल से सिर टिका कर…

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Added by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 6:30pm — 5 Comments

अनोखा रिश्ता सास का

तपते रेगिस्तान मे पानी की बूंद जैसी,

उफनती नदी के बीच कुशल खिवैया सी ।

ससुराल मे तरसती बहू के लिए माँ सी ,

तमाम गलतियों के बीच समाधान सी ।

 …

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Added by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 4:30pm — 11 Comments

शक्ति है मात्र नारी (महाभुजंगप्रयात सवैया)

विधान : महभुजंगप्रयात सवैया - यगण (।ऽऽ) X 8

नहीं पुत्रियाँ क्या रहीं पुत्र जैसी उठा चिन्तनों में यही प्रश्न भारी
यही सोचते रात्रि बीती हमारी समाधान पाया नहीं बुद्धि हारी
पढ़ा सत्य है पुत्रियाँ हैं नहीं पुत्र जैसी कभी भी न होतीं विकारी
न मारो इन्हें गर्भ में पुत्र से श्रेष्ठ हैं मान लो शक्ति है मात्र नारी
*******************************


डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 3, 2013 at 3:30pm — 13 Comments

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