VISHAAL CHARCHCHIT liked संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी''s discussion ग़ज़ल में शब्दों का प्रयोग: मूल अथवा प्रचलित रूप में
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संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' commented on अरुन शर्मा 'अनन्त''s blog post ग़ज़ल : चोरी घोटाला और काली कमाई
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संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' commented on दिव्या's blog post माँ तुम मेरी सहेली हो
संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' replied to वीनस केसरी's discussion विश्व भाषा समुदाय में वर्तमान भारतीय बोलचाल की भाषाएं in the group ग़ज़ल की बातें
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संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' left a comment for बृजेश नीरज
संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' liked वीनस केसरी's discussion हिन्दी में अन्य भाषा के प्रचलित शब्दों का सही रख रखाव - वीनस केसरी
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संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' commented on Kewal Prasad's blog post ‘‘गजल‘‘Posted on April 5, 2013 at 2:00am 14 Comments 1 Like
बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़
122/122/122/12
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न पीपल की छाया, न पोखर दिखे;
मेरे गाँव के खेत बंजर दिखे; (1)
हैं शुअरा जहाँ…
Posted on February 5, 2013 at 3:30pm 17 Comments 1 Like
बह्रे हज़ज़ मुसम्मन सालिम
१२२२-१२२२-१२२२-१२२२
दिमाग़ी सोच से हट कर मैं दिल से जब समझता हूँ;
ज़माने की हर इक शै में मैं केवल रब समझता हूँ; (१)
ख़ुशी बांटो सभी को और सबसे प्यार ही करना,
यही ईमान है मेरा यही मज़हब समझता हूँ; (२)
मरुस्थल है दुपहरी है न कोई छाँव मीलों तक,
ये दुनिया जिसको कहती है वो तश्नालब समझता हूँ; (३)
कभी गाली, कभी फटकार तेरी, सब सहा मैंने,
मिला है आज हंस कर तू, तेरा मतलब समझता हूँ; (४)
फ़ितूर इस को कहो चाहे सनक या…
ContinuePosted on November 14, 2012 at 2:30pm 23 Comments 1 Like
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दवा ही बन गई है मर्ज़ इलाज क्या होगा;
उसे सुकून यक़ीनन बहुत मिला होगा; (१)
मैं नूरे-चश्म था जिसका कभी वो कहता है,
नज़र भी आये अगर तो बहुत बुरा होगा; (२)
हमारे बीच मसाइल हैं कुछ अभी बाक़ी,
ठनी है जी में यही, आज फ़ैसला होगा; (३)
जहाँ ख़ुलूस दिलों में है धड़कनों की तरह,
वहीं पे मंदिरों में जल रहा दिया होगा; (४)
तेरे गुनाह की पोशीदगी है दुनिया से,
मगर ख़ुदा की निगाहों से क्या छुपा होगा;…
ContinuePosted on September 3, 2012 at 3:00am 32 Comments 5 Likes
ये कहाँ खो गई इशरतों की ज़मीं;
मेरी मासूम सी ख़ाहिशों की ज़मीं; (१)
फिर कहानी सुनाओ वही मुझको माँ,
चाँद की रौशनी, बादलों की ज़मीं; (२)
वक़्त की मार ने सब भुला ही दिया,
आसमां ख़ाब का, हसरतों की ज़मीं; (३)
जुगनुओं-तितलियों को मैं ढूंढूं कहाँ,
शह्र ही खा गए जंगलों की ज़मीं; (४)
दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कभी,
है मुयस्सर कहाँ, फ़ुर्सतों की ज़मीं; (५)
गेंहू-चावल उगाती थी पहले कभी,
बन गई आज ये असलहों…
Roshni Dhir said… धन्यवाद वाहिद जी ... आशा है की आप का मार्गदर्शन मिलता रहेगा ...आभार
बृजेश नीरज said… संदीप भाई आपका आभार!
Laxman Prasad Ladiwala said…
अरुन शर्मा 'अनन्त' said… संदीप जी जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएं.....
Admin said… प्रिय सदस्य / सदस्या
Vinay Kull said… आपका स्वागत है !
Albela Khatri said… आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय संदीप द्विवेदी 'वाहिद' साहेब
SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR said… प्रिय वाहिद भाई आप के व्यस्त लम्हे कुछ हम सब को खलते तो हैं ही ....शब्दों के अर्थ आप ने बताये अच्छा लगा ...आप की शुभकामनाओं और बधाई के लिए बहुत बहुत आभार अपना स्नेह बनाये रखें
RAJEEV KUMAR JHA said… बहुत खूबसूरत गजल संदीप जी.सभी पंक्तियाँ काबिलेतारीफ़ हैं.
बात कानों में घुलती शहद की तरह,
रात ही रात में क्यूँ ज़हर हो गयी;
अब तलक तो खुदा को न सजदा किया,
ये दुआ मेरी कैसे असर हो गयी.
बहुत सुन्दर.
RAJEEV KUMAR JHA said… संदीप जी,महीने का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर बधाई!
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Jitendra Pastariya commented on sanju singh's blog post अब चाँद तारे ख्वाबों में आते नहीं,
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कल्पना रामानी commented on कल्पना रामानी's blog post गजल : कितनी भला कटुता लिखें© 2013 Created by Admin.
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