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पियूष कुमार पंत
  • Male
  • हल्द्वानी, उत्तराखंड
  • India
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  • PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA
  • संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी'
 

पियूष कुमार पंत's Page

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संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' liked पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
Oct 15, 2012
Rajeev Mishra liked पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
Oct 14, 2012
suryajeet kumar singh liked पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
Oct 14, 2012
seema agrawal commented on पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
"सच कहा  मूल स्थान छूटता है या कभी कभी छोड़ना पड़ता है  पर हम जहाँ भी जाएँ वहाँ की प्रिय स्मृतियाँ हमारी दिल में सदैव बसी रहती हैं सुन्दर प्रस्तुति पीयूष जी "
Oct 5, 2012
राजेश 'मृदु' commented on पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
"बिछड़े पल की कसक लिए बड़ी अच्‍छी रचना है, बधाई आपको"
Oct 5, 2012
पियूष कुमार पंत's blog post was featured

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,वो शहर जो हर पल मुझे,बस याद उसकी दिलाता था,वो शहर की जिसमें महकती थी,बस उसी की खुशबू,वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,वो वही शहर था जहां रहते थे,बस चाहने वाले उसके,आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,अपने इस नए शहर में भी बस,उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,बस शहर ही बदला है मैंने, अपना दिल नहीं बदलावो उस शहर में नहीं इस दिल में रहा करती है...See More
Oct 5, 2012
राज़ नवादवी liked पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
Oct 5, 2012
लक्ष्मण रामानुज लडीवाला commented on पियूष कुमार पंत's blog post मैं शहर छोड़ आया उसका...
"अब इस नए शहर में तो मन नहीं लगता होगा उखडा उखडा रहता होगा  दिल तो उसी शहर के अन्दर जा रमड़ता होगा, आपके कव्य से आपके कष्ट को समझा जा सकता है | काव्य के माध्यम से सन्देश हेतु बधाई |"
Oct 5, 2012
पियूष कुमार पंत posted a blog post

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,वो शहर जो हर पल मुझे,बस याद उसकी दिलाता था,वो शहर की जिसमें महकती थी,बस उसी की खुशबू,वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,वो वही शहर था जहां रहते थे,बस चाहने वाले उसके,आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,अपने इस नए शहर में भी बस,उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,बस शहर ही बदला है मैंने, अपना दिल नहीं बदलावो उस शहर में नहीं इस दिल में रहा करती है...See More
Oct 5, 2012

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on पियूष कुमार पंत's blog post कौन है वो बूढ़ी .....
"आपकी रचना ने मन को झकझोर दिया दिल तक मर्म पहुचाने में सफल हुई रचना हार्दिक आभार लिखते रहिये शुभकामनाएं "
Oct 4, 2012
satish mapatpuri commented on पियूष कुमार पंत's blog post बटवारा आसमान का......
"बटवारे सिर्फ जायजाद ही कहाँ बाटते हैं, बटवारे छीन लेते हैं, दिलों के एहसास भी, बटवारे जो एक को दो कर देते हैं, वो भला दो को एक रखें कैसे, ......... बँटवारा वो चाहे परिवार का हो , समाज का हो , राष्ट्र का हो या दिलों का हो कष्टकारी होता ही है .…"
Oct 4, 2012
पियूष कुमार पंत posted a blog post

बटवारा आसमान का......

आज डूबते हुए सूरज को एक बार फिर देखा, लालिमा से भरा सूरज अलविदा कहता हुआ, अब सूरज छुप जाएगा बस कुछ ही पलों में, और आकाश में दिखने लगेगा चाँद वो सुंदर सा, कभी कभी ये भ्रम भी होने लगता है, की क्या चाँद और सूरज अलग अलग हैं, या सूरज ही रूप रंग बदल लौट आता है, और दो किरदार निभाता है अलग अलग तरह के, जैसे फिल्मों में एक ही आदमी दो हो जाता है एक होते हुए भी,आखिर क्यों नहीं ये दोनों एक साथ दिखते हैं, ये सोचते सोचते ही नज़र खोजने लगी आकाश में, सूरज अभी डूबा नहीं था, और उधर बहुत दूर सूरज से चाँद दिखने लगा…See More
Oct 3, 2012

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on पियूष कुमार पंत's blog post कौन है वो बूढ़ी .....
"प्रतीकों में इस रचना ने वह कुछ कहा है जो हृदय को भेद गया.. . मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ, पियूषजी."
Oct 3, 2012
पियूष कुमार पंत commented on पियूष कुमार पंत's blog post कौन है वो बूढ़ी .....
"आप सभी का हार्दिक शुक्रिया.......... "
Oct 3, 2012
लक्ष्मण रामानुज लडीवाला commented on पियूष कुमार पंत's blog post कौन है वो बूढ़ी .....
"बुजुर्गों के प्रति कैसे भाव कालांतर से चले आ रहे है, चाँद में दिख रहे चित्र और अपनी नानी दादी अम्मा से बचपन से सुन रहे- कहानी के आदर पर कल्पना का सुन्दर चित्रं किया हां बधाई पियूष कुमार पन्त भाई "
Oct 3, 2012

मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi" commented on पियूष कुमार पंत's blog post कौन है वो बूढ़ी .....
"रचना झकझोर देने में सक्षम है, बिम्ब और प्रतिक के माध्यम से बहुत बड़ी बात कह गए है पियूष जी, बधाई स्वीकार करें |"
Oct 3, 2012

Profile Information

Gender
Male
City State
हल्द्वानी
Native Place
बागेश्वर
Profession
सरकारी कर्मचारी
About me
अभी कुछ है नहीं कहने लायक.......... कुछ हो जाए... तो फिर बतलाऊंगा.....

पियूष कुमार पंत's Blog

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,

वो शहर जो हर पल मुझे,

बस याद उसकी दिलाता था,

वो शहर की जिसमें महकती थी,

बस उसी की खुशबू,

वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,

वो वही शहर था जहां रहते थे,

बस चाहने वाले उसके,

आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,

पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,

अपने इस नए शहर में भी बस,

उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,

बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,

पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,

बस शहर ही…

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Posted on October 4, 2012 at 9:10pm — 4 Comments

बटवारा आसमान का......

आज डूबते हुए सूरज को एक बार फिर देखा,

लालिमा से भरा सूरज अलविदा कहता हुआ,

अब सूरज छुप जाएगा बस कुछ ही पलों में,

और आकाश में दिखने लगेगा चाँद वो सुंदर सा,



कभी कभी ये भ्रम भी होने लगता है,

की क्या चाँद और सूरज अलग अलग हैं,

या सूरज ही रूप रंग बदल लौट आता है,

और दो किरदार निभाता है अलग अलग तरह के,

जैसे फिल्मों में एक ही आदमी दो हो जाता है एक होते हुए भी,

आखिर क्यों नहीं ये दोनों एक साथ दिखते हैं,

ये सोचते सोचते ही नज़र खोजने लगी आकाश…

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Posted on October 3, 2012 at 9:30pm — 2 Comments

कौन है वो बूढ़ी .....

आज चाँद दिखा आसमान में पूरा,

और वो बुढिया भी जो कात रही है,

सूत कई वर्षों से बैठी हुई तन्हा,

मैं हैरान हूँ, और परेशान भी,

क्या चाँद पर भी लोग हम जैसे ही रहते हैं,

क्या वहाँ भी बूढ़ों को यूं ही छोड़ दिया जाता है,

अकेला और तन्हा, विज्ञान कहता है कि,

कोई बुढ़िया नहीं रहती है चाँद पर,

पर मुझको तो मेरी माँ ने तो बचपन बताया था ,

सूत कातती उस बुढ़िया के बारे में,

वो चाँद मामा है हमारा हमने ये बचपन से सुना है,

तो…

Continue

Posted on October 2, 2012 at 9:00pm — 7 Comments

आँसू चाँद के....

कई दिन की बारिश के बाद,

आज बड़ी अच्छी सी धूप खिली थी,

नीला सा आसमान,

जो भरा था कई सफ़ेद बादलों से,

कई लोगों ने अपने कपड़े,

फैला दिये थे सुखाने को छ्तों पर,

जो कई दिन से नमी से सिले पड़े थे,

याद आ ही गई बचपन की वो बात बरबस,

की जब कहा करते थे की,

बारिश होती है जब ऊपर वाला कभी रोता है,

फिर जब धूप खिलती थी,

और आसमान भर जाता था सफ़ेद बादलों से,

तब कहा करते थे की,

ऊपर वाले ने भी सुखाने डाली…

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Posted on September 27, 2012 at 10:47pm — 4 Comments

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