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चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान।
किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।।
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हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव।
बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।।
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बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब मौन
धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।।
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मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़
सुख-दुख के साथी गये, ऐसे पथ में छोड़।।
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बन जाये यदि चाहता, जीवन…
Posted on January 29, 2026 at 11:19pm
२२१/२१२१/१२२१/२१२
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ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
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भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
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आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
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बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो झूठ आस भी देता नहीं कभी।४।
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जनता को सत्य कैसे भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं…
Posted on January 7, 2026 at 6:04pm — 3 Comments
१२२/१२२/१२२/१२
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सदा बँट के जग में जमातों में हम
रहे खून लिखते किताबों में हम।१।
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हमें मौत रचने से फुरसत नहीं
न शामिल हुए यूँ जनाजों में हम।२।
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हमारे बिना यह सियासत कहाँ
जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।
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किया कर्म जग में न ऐसा कोई
गिने जायें जिससे सबाबों में हम।४।
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न मंजिल न मकसद न उन्वान ही
कि समझे गये हैं मिराजों…
Posted on December 5, 2025 at 6:20am — 2 Comments
कर तरक्की जो सभा में बोलता है
बाँध पाँवो को वही छिप रोकता है।।
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देवता जिस को बनाया आदमी ने
आदमी की सोच ओछी सोचता है।।
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हैं लगाते पार झोंके नाव जिसकी
है हवा विपरीत जग में बोलता है।।
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जान पायेगा कहाँ से देवता को
आदमी क्या आदमी को जानता है।।
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एक हम हैं कह रहे हैं प्यार…
Posted on November 11, 2025 at 1:03pm — 2 Comments
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
सादर आभार आदरणीय
अपने आतिथ्य के लिए धन्यवाद :)
मुसाफिर सर प्रणाम स्वीकार करें आपकी ग़ज़लें दिल छू लेती हैं
जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी
प्रिय भ्राता धामी जी सप्रेम नमन
आपके शब्द सहरा में नखलिस्तान जैसे - हैं
शुक्रिया लक्ष्मण जी
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