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Manan Kumar singh
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Kalipad Prasad Mandal commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीया मनन जी , खुबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें "
5 minutes ago
Ajay Tiwari commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीय मनन कुमार जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनायें. सादर "
yesterday
Mohammed Arif commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । हर शे'र बेहतरीन । शे'र दर शे'र शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।"
yesterday
Afroz 'sahr' commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीय मनन जी बहुत बधाई आपको इस रचना के लिए,,,"
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Manan Kumar singh posted a blog post

गजल(बाअदब सब....)

2122 2122 212बाअदब सब हाथ जोड़े हैं खड़ेझाड़ते तकरीर बिगड़े मनचले।1मामला लंबा चलेगा,सोचकरकातिलों ने साक्ष्य ही निपटा दिए।2फिर गवाहों को यहाँ ढूँढा गया,जो जहाँ जैसे मिले,कटते रहे।3थे विचाराधीन जो भी कैद मेंदेखिए अब तो बरी वे हो चले।4फिर सिसकती आत्मा,कहने लगी---'कब तलक मैं यूँ रहूँगी मुँह सिए?'5आँख का अंधा हकीकत तोलताहै गुमां निर्दोष को फाँसी न दे।6दे चुका अपनी गवाही आदमीउज्र लाशों के कहीं मत्थे चढ़े।7सिर खपाता है सिपाही बैठकरथक गया है मामला कैसे बने।8फिर फिजाओं ने हवा दी ---कर 'मनन',आँसुओं के बोझ दिल…See More
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Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"आदरणीय आरिफ भाई ,आपका शुक्रिया।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,बहुत ही सुंदर ग़ज़ल की सौग़ात । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।"
yesterday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"आदरणीय अजय जी,आभार एवं दीप पर्व की हार्दिक बधाइयाँ।"
Thursday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"आदरणीय समर साहिब,शुक्रिया व दीप-पर्व की शुभकामनाएँ।"
Thursday
Ajay Tiwari commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"आदरणीय मनन कुमार जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई है. बधाईयाँ. दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं. सादर"
Thursday
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें । आपको दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।"
Thursday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय उस्मानीजी,शुक्रिया।"
Thursday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(दीप जला...)
"बहुत बढ़िया हिन्दी ग़ज़ल के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। दीपोत्सव पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।"
Thursday
Afroz 'sahr' commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(आग जलने...)
"आदरणीय मनन कुमार जी इस रचना पर बहुत बहुत बधाई आपको,,,,,"
Thursday
Manan Kumar singh posted a blog post

गजल(दीप जला...)

22 22 22 2दीप जले, आभा निखरेहर्षित हो जन- मन मचले।नेह-निरूपित सुप्त मृदाज्योतित करती नेह पिए।बिखरें किरणें,भेद कहाँ?जलते हैं अनिमेष दिये।कौन नियामित कर सकता?ज्योति-कलश के कौन ठिये।आज उझकती रश्मि रथीकिसने उसको पंख दिये?"मौलिक व अप्रकाशित"See More
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Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(आग जलने...)
"आभार आदरणीय"
Thursday

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गजल(बाअदब सब....)

2122 2122 212

बाअदब सब हाथ जोड़े हैं खड़े

झाड़ते तकरीर बिगड़े मनचले।1



मामला लंबा चलेगा,सोचकर

कातिलों ने साक्ष्य ही निपटा दिए।2



फिर गवाहों को यहाँ ढूँढा गया,

जो जहाँ जैसे मिले,कटते रहे।3



थे विचाराधीन जो भी कैद में

देखिए अब तो बरी वे हो चले।4



फिर सिसकती आत्मा,कहने लगी---

'कब तलक मैं यूँ रहूँगी मुँह सिए?'5



आँख का अंधा हकीकत तोलता

है गुमां निर्दोष को फाँसी न दे।6



दे चुका अपनी गवाही आदमी

उज्र लाशों… Continue

Posted on October 20, 2017 at 6:59pm — 4 Comments

गजल(दीप जला...)

22 22 22 2
दीप जले, आभा निखरे
हर्षित हो जन- मन मचले।

नेह-निरूपित सुप्त मृदा
ज्योतित करती नेह पिए।

बिखरें किरणें,भेद कहाँ?
जलते हैं अनिमेष दिये।

कौन नियामित कर सकता?
ज्योति-कलश के कौन ठिये।

आज उझकती रश्मि रथी
किसने उसको पंख दिये?
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on October 19, 2017 at 12:11pm — 8 Comments

गजल(आग जलने...)

2122 2122 2122
आग जलने पर धुआँ होगा बखूबी
रोशनी की हो नहीं लेकिन मनाही।1

क्यूँ अँधेरा साथ चलता है दियों के
पीटते हैं ढ़ोल की जाती मुनादी।2

गुल खिलाते हैं अँधेरे रोशनी में
और मिलती खूब उनको वाहवाही।3

आ गए कुछ दूर इतना मान भी लें
लग रहा है,हो रही अब भी दिहाड़ी।4

बँट गये हम 'वाद' के 'अवसाद' में बस
और जूठन छानती भूखी 'बुलाकी'।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on October 16, 2017 at 9:07am — 10 Comments

गजल(इक गजल की शाम हो तुम...)

2122 2122
--------------------
इक गजल की शाम हो तुम
धड़कनें गुमनाम हो तुम।1

ख्वाहिशों की संगिनी हो
नींद हो ,आराम हो तुम।2

ढूँढ़ता तब से रहा मैं
ख्वाहिशे-आवाम हो तुम।3

घोल दे जो कान में रस
वह सहज-सा नाम हो तुम।4

राधिका हो तुम किशन की
बीन मेरी,'साम' हो तुम।5

टूटता है जब मनोरथ
उस घड़ी में काम हो तुम।6

भागता फिरता बटोही
बस सुफल इक धाम हो तुम।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on October 10, 2017 at 7:30pm — 6 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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