For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
.
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
प्रस्तुत है.....
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128
विषय : विषय मुक्त
अवधि : 29-11-2025 से 30-11-2025
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, 10-15 शब्द की टिप्पणी को 3-4 पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पाए इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ-साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
.    
यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सकें है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.
.
.
मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)

Views: 687

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

स्वागतम

वतन में जतन (लघुकथा) :
अमेरिका वाले ख़ास रिश्तेदार अपने युवा बच्चों को स्वदेश घुमाने और रिश्तेदारों से परिचित करवाने आ रहे हैं। नज़दीकी रिश्तेदारों में होड़ लगी हुई है कि कौन उनका ज़बरदस्त स्वागत कर ठहरने और घुमाने की बेहतरीन व्यवस्था करता है। मौसम अनुसार सभी इंतज़ाम कर लिए गए हैं। बहुत सी चीज़ें ख़रीदनी भी पड़ी हैं हाई प्रोफाइल स्तर वाला प्रभाव जमाने के लिए। आपस में तैयारियों पर चर्चाएं जारी हैं घरों में और मोबाइल फोनों पर।
"दैनिक ज़रूरतों की चीज़ें मिनरल वाटर, टॉवल, दवायें वगैरह तो वे अपने साथ लायेंगे ही। हमें तो बस लक्ज़री बेडरूम और वाशरूम का कामचलाऊ इंतज़ाम करना चाहिए घर की बढ़िया साफ़-सफ़ाई करवा कर।" चाचीजी ने अपने युवा बेटे नितिन से कहा।
"हॉं मम्मी। भोजन वग़ैरह की च्वाइस तो उसी समय पूछ लेंगे या फिर ऑनलाइन मॅंगा लिया करेंगे।‌ गपशप और घूमने के लिए समय भी बचाना है न!" नितिन ने एक ऑंख दबाते हुए कहा, "एक-दो दिन ही तो रुकेंगे, नो टेंशन!" 
"स्वच्छता पर ख़ास ध्यान दो। हम तो हर तरह के हालात में भी रह लेते हैं। विदेशियों को इनफेक्शन ज़ल्दी होते हैं। 'हेल्थ और हाइजीन' पर नज़र रहती है उन लोगों की।" अबकी बार चाचीजी ने अपने पति से कहा उनके नज़दीक़ जाकर।
"लेकिन तुम अपने और अपने बच्चों की दिमाग़ी सेहत और हाइजीन का विशेष ध्यान रखना। दो दिन में ही ये विदेशी रिश्तेदार तुम लोगों को स्वदेश की खामियों को गिना कर इंफेक्टेड कर जाते हैं। भाव‌ बढ़ जाते हैं विदेशी झौंके से तुम लोगों के। ज़मीन पर रहो, आसमान पर उड़ने, उड़वाने की ज़रूरत नहीं, समझीं!" मेहमानों के लिए ख़रीदी गई ब्रांडेड चीज़ों को घूरते हुए चाचाजी ने कहा और अपने कमरे में चारपाई पर‌ लेट गये। 
(मौलिक व अप्रकाशित)

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी, अपने शीर्षक को सार्थक करती बहुत बढ़िया लघुकथा है। यह लघुकथा बहुत तीखा, लेकिन सटीक आईना है हमारी उस मानसिक गुलामी का, जो आज़ादी के सात दशक बाद भी बरकरार है। विदेश से आने वाले रिश्तेदार कोई मेहमान नहीं, जज बनकर आते हैं,और हम सब मिलकर उनके सामने “सिविलाइज़्ड” साबित होने की होड़ में लग जाते हैं। यह लघुकथा सिर्फ़ मेहमाननवाजी की नहीं, आत्म-सम्मान की है।  इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें. सादर 

आदाब।‌ रचना पटल पर समय देकर रचना के मर्म पर समीक्षात्मक टिप्पणी और प्रोत्साहन हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी।

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, आपकी लघु कथा हम भारतीयों की विदेश में रहने वालों के प्रति जो मानसिकता है। उसका सही चित्रण है। सुंदर लघु कथा की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें।

सादर नमस्कार।‌ रचना पटल पर अपना अमूल्य समय देकर रचना के संदेश पर समीक्षात्मक टिप्पणी और प्रोत्साहन हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय दयाराम  मेठानी जी।

भड़ास
'मुझे हिंदी सिखा देंगे?फेसबुक की महिला मित्र ने विकल जी से गुजारिश की।
'क्यों नहीं?जरूर सिखाऊंगा।' विकल जी ने उत्साहपूर्वक जवाब लिखा।
कल होकर महिला मित्र ने विकल जी को एक कहानी भेजी।लिखा था,'एक युवती अपनी सहेली के घर आती जाती थी।सहेली के घर कार थी। उसके पापा ड्राइव करते।एक दिन युवती ने कार ड्राइविंग की इच्छा प्रकट की।सहेली के पापा के साथ कार में मैदान में गई।अंकल जी ने एक्सीलेटर,ब्रेक,क्लच वगैरह से उसे परिचित कराया।फिर कार स्टार्ट कर उसे गियर में दिया और युवती को हैंडल पकड़ा दी।उनका हाथ भी हैंडल पर था।अभी एक्सीलेटर लगता कि युवती का हाथ उठा और चटाक की आवाज हुई।अंकल जी अपना गाल सहलाने लगे।'
"मौलिक व अप्रकाशित"

क्या बात है! ये लघुकथा तो सीधी सादी लगती है, लेकिन अंदर का 'चटाक' इतना जोरदार है कि कान में गूंज जाता है। विकल जी का उत्साह तो ठीक था, लेकिन महिला मित्र ने हिंदी सिखाने के बहाने एकदम सटीक 'भड़ास' निकाल दी—वो भी बिना एक शब्द ज्यादा खर्च किए।  इस लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय Manan Kumar singh जी।  सादर। 

आदरणीय मनन कुमार जी, आपने इतनी संक्षेप में बात को प्रसतुत कर सारी कहानी बता दी। इसे कहते हे बात छोटी घाव करे गंभीर। बहुत बहुत बधाई आपको।

आदाब। सोशल मीडियाई मित्रता के चलन के एक पहलू को उजागर करती सांकेतिक तंजदार रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। /कल होकर/ .. ये शब्द कुछ अटपटे लगे। इसके बजाय यदि ऐसा कुछ लिखा जा सके, तो? -

एक बार गुज़ारिश की थी।

जवाब लिख दिया था।

फ़िर अचानक महिला मित्र ने...

लघुकथा गोष्ठी" अंक-128

शीर्षक — वापसी

आज कोर्ट में सूरज और किरण के तलाक संबंधी केस का निर्णय सुनाया जाना था। जैसे ही आवाज लगी सूरज व किरण कोर्ट में अपनी अपनी जगह जाकर खड़े हो गए। कोर्ट ने अपना फैसला सुनाने की तारीख 15 दिन आगे बढ़ानें की सूचना सुना दी।
कोर्ट से निकल कर सूरज मुँह लटकाये अपनी कार की ओर बढ़ा और कार का दरवाजा खोलने वाला ही था कि किसी ने उसका पीछे से आकर हाथ पकड़ लिया। सूरज ने मुड़कर देखा तो अवॉक रह गया फिर संभल कर बोला - किरण जी, इस तरह किसी गैर मर्द का हाथ तुम्हें पकड़ना नहीं चाहिए। किरण ने जवाब देने में देर नहीं की और बोली ‘अभी तुम गैर कहाँ हुए हो? अभी तो मुकदमा चल रहा है जब तक फैसला नहीं होता तब तक हम पति पत्नी है और एक दूसरे को गैर नहीं कह सकते।’
यह सुन कर सूरज कुछ बोला नहीं वरन् वह किरण को अचरज से देखता रहा। वह सोच रहा था जिसने मेरा फोन करने पर हर बार काट दिया। जिसके वकील ने मुझ पर अनेको झूठे आरोप लगाये और मैने बिना ऐतराज के स्वीकार कर लिए तब किरण को मुझ पर रहम नहीं आया और आज अचानक आकर हाथ पकड़ लिया। किरण उसका हाथ अभी भी पकड़े हुए थी। अचानक सूरज के कानों में किरण की आवाज आई ‘‘ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है’’। सूरज ने सीधे ही कहा, ‘‘बोलो क्या कहना है?’’ किरण बोली यहाँ नहीं कहीं रेस्तरॉ में बैठ के तसल्ली से बात करनी है। सूरज मान गया। बोला बैठो कार में और किरण सूरज के साथ वाली अगली सीट पर जाकर बैठ गई।
सूरज उसे एक पुराने रेस्तरॉ में ले आया जहाँ वे पहले भी कभी कभी आया करते थे। लंच टाईम खत्म हो गया था अतः रेस्तरॉ में अधिकतर कुर्सिया खाली थी। सूरज व किरण कोने वाली जगह पर जाकर बैठे और बैरे को चाय व कुछ अन्य खाने की उन चीजोें का आर्डर किया जो किरण को पसंद थी।
चाय आगई तो सूरज ने किरण से कहा - अब बोलो क्या कहना है? किरण ने चाय घूंट पीते हुए अत्यंत धीमी व मधुर आवाज में कहा - मै घर वापिस आना चाहती हूँ। बच्चे भी यही चाहते है।
सूरज ने तत्काल कुछ नहीं कहा किन्तु वो मन में बहुत खुश हुआ। अपनी खुशी को प्रकट किए बिना सूरज ने कहा - इसमें प्रमीशन की क्या ज़रूरत है? घर तुम्हारा है। तुम्हें मैने तो घर से नहीं निकाला था। तुम खुद ही चिट्ठी रख कर चली गई थी और फिर न कभी मेरा फोन उठाया और न कभी कोई बात की। घर की एक चाबी आज भी तुम्हारे पास है। तुम जब चाहो आ सकती हो। चाहो तो अभी मेरे साथ ही चलो।
किरण बोली - ऐसे नहीं। मैं कल कोर्ट में केस वापिस लेने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर फिर अपना पूरा सामान व बच्चों के साथ कल शाम तक ऑटो में जैसे बैठ कर घर से गई थी वैसे ही आँऊगी। यह सुन कर सूरज बहुत भावुक हो गया और बिन कुछ इधर उधर देखे उसने किरण का अपने बाहुपाश में ले लिया।
- दयारम मेठानी
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

आदरणीय Dayaram Methani जी, लघुकथा का बहुत बढ़िया प्रयास हुआ है। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service