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कर्तव्य-बोध(लघुकथा)

कर्तव्य-बोध

मरे कौवे ली लाश तीन दिनों से उस पॉश कॉलोनी के बीचोबीच गुजरनेवाली सड़क पर पड़ी थी। गाड़ियाँ गुजरतीं,उसे रौंदतीं। लोग आते। चले जाते। दो लोग अपने अच्छी नस्ल के कुत्तों को सायंकालीन प्राकृतिक क्रिया से निबटारा कराने के लिए भ्रमण के बहाने वहाँ से गुजरे। कौवे की शेष बची लाश पर अकस्मात एक का पैर पड़ गया।नाक-भौं सिकोड़ते हुए वह गुर्राया,

कैसे लोग इधर रहते हैं! सड़ी लाश के परखच्चे उड़ रहे हैं। किसी को कोई चिंता ही नहीं।

नगर निगम वाले भी क्या करते हैं,पता नहीं।दूसरे ने अपने नागरिक-अधिकार का परिचय दिया।

वे सब भी तो कल से हड़ताल पर हैं।पहले ने अपनी जागरूकता जताई।

तब तो वे लोग भी मरे जानवर सड़कों पर फेंकेंगे।दूसरे ने ज्ञान बघाड़ा।

सारी स्वच्छता यहाँ हवा है,समझो।

और क्या?कोई कुछ करे तब न।

अबतक दोनों कुत्ते निवृत होकर भौं-भौं करने लगे थे। नाक पर रुमाल चिपकाए दोनों नागरिक अपने-अपने कुत्तों संग प्रस्थान कर गए। ठीक उसी क्षण बगल के घर की मालकिन बालकनी में हाजिर हुई। स्थिति भाँपकर वह तमतमाई हुई बोलने लगी,

सब गंदगी फैलाते हैं। सड़क पर चलेंगे,पर मरे कुत्ते को उठाकर कहीं फेंक नहीं सकते।

फिर उसने एक पॉलिथीन में लपेटा हुआ फलों का छिलका अपनी बाउंडरी के किनारे सड़क पर उछाला और अंदर चली गई।

"मौलिक एयवन अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on November 29, 2022 at 10:01am

आपका हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानीजी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 29, 2022 at 5:50am

आदाब। कथनी और.करनी में यही अंतर सभी समस्याओं की जड़ है। स्वयं की उपेक्षा और दूसरे से अपेक्षा। बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई जनाब मनन कुमार सिंह जी।

Comment by Manan Kumar singh on November 16, 2022 at 6:39pm

आपका आभार आदरणीय लक्ष्मण भाई जी।नमन।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 16, 2022 at 6:28pm

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। अच्छी समसामयिक कथा हुई है। यह हम सब के व्यवहार का दर्पण भी है। हार्दिक बधाई।

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