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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Friends

  • बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Page

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post ग़ज़ल (देते हमें जो ज्ञान का भंडार)
"आदरणीय समर साहिब रचना को आपका अनुमोदन मिला अतीव आभार।"
Sunday
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' posted a blog post

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)वो जब भी मिली, महकती मिली, गुलाब सी वो, खिली सी मिली।हो गगरी कोई, शराब की ज्यों, वो वैसी मुझे, छलकती मिली।दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे, उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा, वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।कभी वो मुझे,बताए ज़रा,जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।गिला भी किया, ज़रा भी अगर, पुरानी मगर, सफाई मिली।'नमन' तो चला, भलाई की राह, उसे तो सदा, बुराई मिली।मौलिक व अप्रकाशितSee More
Saturday
Samar kabeer commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post ग़ज़ल (देते हमें जो ज्ञान का भंडार)
"जनाब बासुदेव जी आदाब,अच्छी रचना हुई,बधाई स्वीकार करें ।"
Saturday
Samar kabeer commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)
"//मिली थी ख़ता, हुई जो ख़फ़ा,बताई न क्या, खराबी मिली" मेरे ख़याल में इस शैर को यूँ कर सकते हैं:- 'कभी वो मुझे,बताए ज़रा जो मुझ में उसे,ख़राबी मिली'"
Saturday
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर साहिब बहुत आभार। क्या उस शेर की जगह यह ठीक रहेगा। मिली थी ख़ता, हुई जो ख़फ़ा,बताई न क्या, खराबी मिली।"
Saturday
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)
"आदरणीय अजय तिवारी जी बहुत आभार।"
Saturday
Samar kabeer commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)
"जनाब बासुदेव जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करे । जनाब अजय जी की बात का संज्ञान लें ।"
Saturday
Ajay Tiwari commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)
"आदरणीय बासुदेव जी,  'हुई क्यों ख़फ़ा, पता न चला,'  'क्यों' और 'क्या' कभी गिराए नहीं जाते. एक अच्छी कोशिश के लिए हार्दिक बधाई. "
Saturday
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' posted blog posts
Jul 17
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' posted a blog post

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)वो जब भी मिली, महकती मिली, गुलाब सी वो, खिली सी मिली।हो गगरी कोई, शराब की ज्यों, वो वैसी मुझे, छलकती मिली।दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे, उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा, वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।कभी वो मुझे,बताए ज़रा,जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।गिला भी किया, ज़रा भी अगर, पुरानी मगर, सफाई मिली।'नमन' तो चला, भलाई की राह, उसे तो सदा, बुराई मिली।मौलिक व अप्रकाशितSee More
Jul 14
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"आ0 अशोक कुमार रक्ताले जी बहुत सुंदर प्रस्तुति, हृदय तल से बधाई।"
Jul 13
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"आ0 शेख सहज़ाद जी मुक्त कविता में सावन के माध्यम से सामयिक समस्याओं पर मनभावन कटाक्ष।"
Jul 13
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"वाह आ0 लक्ष्मण धामी जी दोहों में सावन के विभिन्न रूपों का सुंदर वर्णन। बहुत बहुत बधाई"
Jul 13
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"आ0 सतविंदर कुमार राणा जी 32 मात्रिक छंद में प्रदत विषय पर बहुत सुंदर प्रस्तुति। बहुत बहुत बधाई।"
Jul 13
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"आ0 सतविंदर कुमार राणा जी आपका अतिसय आभार।"
Jul 13
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-105
"आ0 लक्ष्मण धामी जी आपका हृदय तल से आभार"
Jul 13

Profile Information

Gender
Male
City State
Tinsukia
Native Place
Tinsukia
Profession
कवि
About me
परिचय -बासुदेव अग्रवाल 'नमन' नाम- बासुदेव अग्रवाल; शिक्षा - B. Com. जन्म दिन - 28 अगस्त, 1952; स्थान - सुजानगढ़ (राजस्थान) रुचि - हर विधा में कविता लिखना। मुक्त छंद, पारम्परिक छंद, हाइकु, मुक्तक इत्यादि। गीत ग़ज़ल में भी रुचि है। परिचय - वर्तमान में मैँ असम प्रदेश के तिनसुकिया नगर में हूँ। मैं नारायणी साहित्य अकादमी से जुड़ा हुवा हूँ। हमारी नियमित रूप से मासिक कवि गोष्ठी होती है जिनमें मैं नियमित रूप से भाग लेता हूँ। नारायणी के माध्यम से मैं देश के प्रतिष्ठित साहित्यिकारों से जुड़ा हुवा हूँ। whatsup के कई ग्रुप से जुड़ा हुवा हूँ जिससे साहित्यिक कृतियों एवम् विचारों का आदान प्रदान गणमान्य साहित्यकारों से होता रहता है। Blog - narayanitsk.blogspot.com बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Blog

ग़ज़ल (देते हमें जो ज्ञान का भंडार)

गुरु पूर्णिमा के विशेष अवसर पर:-

बह्र:- 2212*4

देते हमें जो ज्ञान का भंडार वे गुरु हैं सभी,

दुविधाओं का सर से हरें जो भार वे गुरु हैं सभी।

हम आ के भवसागर में हैं असहाय बिन पतवार के,

जो मन की आँखें खोल कर दें पार वे गुरु हैं सभी।

ये सृष्टि क्या है, जन्म क्या है, प्रश्न सारे मौन हैं,

जो इन रहस्यों से करें निस्तार वे गुरु हैं सभी।

छंदों का सौष्ठव, काव्य के रस का न मन में भान…

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Posted on July 16, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,

गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,

वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,

उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,

वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे,बताए ज़रा,

जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,

पुरानी…

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Posted on July 14, 2019 at 3:30pm — 5 Comments

तोटक छंद "विरह"

तोटक छंद "विरह"

सब ओर छटा मनभावन है।

अति मौसम आज सुहावन है।।

चहुँ ओर नये सब रंग सजे।

दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।

सखि आज पिया मन माँहि बसे।

सब आतुर होयहु अंग लसे।।

कछु सोच उपाय करो सखिया।

पिय से किस भी विध हो बतिया।।

मन मोर बड़ा अकुलाय रहा।

विरहा अब और न जाय सहा।।

तन निश्चल सा बस श्वांस चले।

किस भी विध ये अब ना बहले।।

जलती यह शीत बयार लगे।

मचले मचले कुछ भाव जगे।।

बदली नभ की न जरा…

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Posted on May 8, 2019 at 2:21pm — 6 Comments

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

तन-मन छीन किये अति पागल,

हे मधुसूदन तू सुध ले।

श्रवणन गूँज रही मुरली वह,

जो हम ली सुन कूँज तले।।

अब तक खो उस ही धुन में हम,

ढूंढ रहीं ब्रज की गलियाँ।

सब कुछ जानत हो तब दर्शन,

देय खिला मुरझी कलियाँ।।

द्रुम अरु कूँज लता सँग बातिन,

में यह वे सब पूछ रही।

नटखट श्याम सखा बिन जीवित,

क्यों अब लौं, निगलै न मही।।

विहग रहे उड़ छू कर अम्बर,

गाय रँभाय रही सब हैं।

हरित सभी ब्रज के तुम पादप,

बंजर…

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Posted on April 22, 2019 at 10:54am — 4 Comments

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At 11:03pm on June 27, 2019, dandpani nahak said…
बहुत शुक्रिया आदरणीय हौसला बढ़ने का
At 7:13pm on November 20, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय
श्री बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी,

सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ यहाँ पोस्ट (क्लिक करें) कर सकते है.

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