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बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Blog (34)

ग़ज़ल (आज फैशन है)

ग़ज़ल (आज फैशन है)

1222 1222 1222 1222

लतीफ़ों में रिवाजों को भुनाना आज फैशन है,

छलावा दीन-ओ-मज़हब को बताना आज फैशन है।

ठगों ने हर तरह के रंग के चोले रखे पहने,

सुनहरे स्वप्न जन्नत के दिखाना आज फैशन है।

दबे सीने में जो शोले जमाने से रहें महफ़ूज़,

पराई आग में रोटी पकाना आज फैशन है।

कभी बेदर्द सड़कों पे न ऐ दिल दर्द को बतला,

हवा में आह-ए-मुफ़लिस को उड़ाना आज फैशन है।

रहे आबाद हरदम ही अना की बस्ती…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 2, 2018 at 8:30am — 13 Comments

ग़ज़ल (कैसी ये मज़बूरी है)

ग़ज़ल (कैसी ये मज़बूरी है)

22 22 22 22 22 22 22 2

गदहे को भी बाप बनाऊँ कैसी ये मज़बूरी है,

कुत्ते सा बन पूँछ हिलाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

एक गाम जो रखें न सीधा चलना मुझे सिखायें वे,

उनकी सुन सुन कदम बढ़ाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

झूठ कपट की नई बस्तियाँ चमक दमक से भरी हुईं,

उन बस्ती में घर को बसाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

सबसे पहले ऑफिस आऊँ और अंत में घर जाऊँ,

मगर बॉस को रिझा न पाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

ऊँचे घर…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 22, 2018 at 3:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल(याद आती हैं जब)

ग़ज़ल(याद आती हैं जब)

212 212 212 212

याद आतीं हैं जब आपकी शोखियाँ,

और भी तब हसीं होतीं तन्हाइयाँ।

आपसे बढ़ गईं इतनी नज़दीकियाँ,

दिल के लगने लगीं पास अब दूरियाँ।

डालते गर न दरिया में कर नेकियाँ,

हारते हम न यूँ आपसे बाज़ियाँ।

गर न हासिल वफ़ा का सिला कुछ हुआ,

उनकी शायद रही कुछ हों मज़बूरियाँ।

मिलता हमको चराग-ए-मुहब्बत अगर,

राह में स्याह आतीं न दुश्वारियाँ।

हुस्नवालों से दामन बचाना ए…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 3, 2018 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल ,(तेरे चहरे की जब भी अर्गवानी याद आएगी।)

ग़ज़ल ,(तेरे चहरे की जब भी अर्गवानी याद आएगी।)

1222 1222 1222 1222

तेरे चहरे की रंगत अर्गवानी याद आएगी,

हमें होली के रंगों की निशानी याद आएगी।

तुझे जब भी हमारी छेड़खानी याद आएगी

यकीनन यार होली की सुहानी याद आएगी।

मची है धूम होली की जरा खिड़की से झाँको तो,

इसे देखोगे तो अपनी जवानी याद आएगी।

जमीं रंगीं फ़ज़ा रंगीं तेरे आगे नहीं कुछ ये,

झलक इक बार दिखला दे पुरानी याद आएगी।

नहीं कम ब्लॉग में मस्ती…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 2, 2018 at 11:30am — 9 Comments

ग़ज़ल(रहे गर्दिश में जो हरदम)

जनाब साहिर लुधियानवी के मिसरे पर तरही ग़ज़ल।

1222 1222 1222 1222

रहे गर्दिश में जो हरदम, उन_अनजानों पे क्या गुजरी,

किसे मालूम ऐसे दफ़्न अरमानों पे क्या गुजरी।

कमर झुकती गयी वो बोझ को फिर भी रहें थामे,

न जाने आज की औलाद उन शानों पे क्या गुजरी।

अगर हो बात फ़ितरत की नहीं तुम जानवर से कम,

*जब_इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी।*

मुहब्बत की शमअ पर मर मिटे जल जल पतंगे जो,

खबर किसको कि उन नाकाम परवानों…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on February 6, 2018 at 4:04pm — 9 Comments

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल (कज़ा मेरी अगर जो हो)

गुणीजनों के सुझाव के हेतु।

काफ़िया=आ

रदीफ़= *मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर*

1222×4



खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर,

सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,

वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती,

अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक,

शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 22, 2017 at 11:11am — 16 Comments

ग़ज़ल (दीपावली)

ग़ज़ल (दीपावली)
212×4

जगमगाते दियों से मही खिल उठी,
शह्र हो गाँव हो हर गली खिल उठी।

लायी खुशियाँ ये दीपावली झोली भर,
आज चेह्रों पे सब के हँसी खिल उठी।

आप देखो जिधर नव उमंगें उधर,
हर महल खिल उठा झोंपड़ी खिल उठी।

सुर्खियाँ सब के गालों पे ऐसी लगे,
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी।

ओ बी' ओ को बधाई 'नमन' पर्व की
मंच पर आज दीपावली खिल उठी।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 19, 2017 at 9:42am — 8 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

तिजारत हुक्मरानी हो गई है।
कहीं गुम शादमानी हो गई है।।

न अब गांधी न शास्त्री से हैं रहबर।
शहादत उनकी फ़ानी हो गई है।।

तेरा तो हुश्न ही दुश्मन है नारी।
कठिन इज्जत बचानी हो गई है।।

लगी जब बोलने बिटिया हमारी।
वो घर में सबकी नानी हो गई है।।

हमीं से चार लेकर एक दे कर।
'नमन' सरकार दानी हो गई है।।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2017 at 4:00pm — 8 Comments

छोटी बहर की ग़ज़ल

बहर - 2112
काफ़िया - आम; रदीफ़ - चले

जाम चले
काम चले।

मौत लिये
आम चले।

खुद का कफ़न
थाम चले।

सांसें आठों
याम चले।

सुब्ह हो या
शाम चले।

लोग अवध
धाम चले।

मन में बसा
राम चले।

पैसा हो तो
नाम चले।

जग में 'नमन'
दाम चले


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 24, 2017 at 3:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल (सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी)

भाषा बड़ी है प्यारी जग में अनोखी हिन्दी,

चन्दा के जैसे सोहे नभ में निराली हिन्दी।



पहचान हमको देती सबसे अलग ये जग में,

मीठी जगत में सबसे रस की पिटारी हिन्दी।



हर श्वास में ये बसती हर आह से ये निकले,

बन के लहू ये बहती रग में ये प्यारी हिन्दी।



इस देश में है भाषा मजहब अनेकों प्रचलित,

धुन एकता की डाले सब में सुहानी हिन्दी।



शोभा हमारी इससे करते 'नमन' हम इसको,

सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी।





आज हिन्दी दिवस…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 14, 2017 at 11:30am — 65 Comments

आज़ादी का गीत

"आज़ादी का गीत"

(2212 122 अंतरा 22×4 // 22×3)

(तर्ज़- दिल में तुझे बिठा के)



भारत तु जग से न्यारा, सब से तु है दुलारा,

मस्तक तुझे झुकाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।



सन सैंतालिस मास अगस्त था, तारिख पन्द्रह प्यारी,

आज़ादी जब हमें मिली थी, भोर अज़ब वो न्यारी।

चारों तरफ खुशी थी, छायी हुई हँसी थी,

ये पर्व हम मनाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।



आज़ादी के नभ का यारों, मंजर था सतरंगा,

उतर गया था जैक वो काला, लहराया था तिरंगा।

भारत की जय थी गूँजी, अनमोल… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on August 15, 2017 at 1:29pm — 5 Comments

कृष्णावतार

"कृष्णावतार"



रास छंद। 8,8,6 मात्रा पर यति। अंत 112 से आवश्यक और 2-2 पंक्ति तुकांत आवश्यक।)



हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।

घोर घटा में, कड़क रही थी, बीजलियाँ

हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।

दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।



यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।

विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।

मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।

कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।



घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।

जग को करते,… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on August 14, 2017 at 11:35am — 5 Comments

राखी

"राखी" (चौपइया छंद)



पर्वों में न्यारी, राखी प्यारी,

सावन बीतत आई।

करके तैयारी, बहन दुलारी,

घर आँगन महकाई।

पकवान पकाए, फूल सजाए,

भेंट अनेकों लाई।

वीरा जब आया, वो बँधवाया,

राखी थाल सजाई।।



मन मोद मनाए, बलि बलि जाए,

नव उमंग है छाई।

भाई मन भाए, गीत सुनाए,

खुशियों में बौराई।

डाले गलबैयाँ, लेत बलैयाँ,

छोटी बहन लडाई।

भाल पे बिंदिया, ओढ़ चुनरिया,

जीजी मंगल गाई।।



जब जीवन चहका, बचपन महका,

तुम थी तब… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on August 7, 2017 at 6:21pm — 6 Comments

ग़ज़ल (मधुर मास सावन लगा है)

ग़ज़ल (मधुर मास सावन लगा है)



बहर:- 122 122 122



मधुर मास सावन लगा है,

दिवस सोम लगते पड़ा है।



महादेव को सब रिझाएँ,

ये संयोग अद्भुत हुआ है।



तेरा रूप सबसे निराला,

गले सर्प माथे जटा है।



कुसुम बिल्व चन्दन चढ़ाएँ,

ये शुभ फल का अवसर बना है।



शिवाले में अभिषेक जल से,

करें भक्त मोहक छटा है।



करें कावड़ें तुझको अर्पित,

सभी पुण्य पाते महा है।



करो पूर्ण आशा मेरी शिव,

'नमन' हाथ जोड़े खड़ा… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 10, 2017 at 12:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल(रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक)

221 1221 1221 122

रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक,
खुशियों का ये दे सबको असर ईद मुबारक।

घुल आज फ़िज़ा में हैं गये रंग नये से,
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

पाँवों से ले सर तक है धवल आज नज़ारा,
दे कर के दुआ कहता है हर ईद मुबारक।

सब भेद भुला ईद गले लग के मनायें,
ये पर्व रहे जग में अमर ईद मुबारक।

ये ईद है त्योहार मिलापों का अनोखा,
दूँ सब को 'नमन' आज मैं कर ईद मुबारक।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on June 26, 2017 at 10:38am — 15 Comments

आओ सब मिल कर संकल्प करें

आओ सब मिल कर संकल्प करें।

चैत्र शुक्ल नवमी है आज, नूतन कुछ तो करें।

आओ सब मिल कर संकल्प करें॥



मर्यादा में रहना सीखें, सागर से बन कर हम सब।

मर्यादा में रहना सिखलाएं, तोड़े कोई इसको जब।

मर्यादा के स्वामी की, धारण तो यह सीख करें।

आओ सब मिल कर संकल्प करें॥



मात पिता गुरु और बड़ों की, सेवा का ही मन हो।

भIई मित्र और सब के, लिए समर्पित ये तन हो।

समदर्शी सा बन कर हम, सबसे व्यवहार करें।

आओ सब मिल कर संकल्प करें॥



उत्तम आदर्शों को हम,… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 5, 2017 at 11:49am — 3 Comments

ग़ज़ल(जीवन पथिक संसार में चलते चलो तुम सर्वदा)

बह्र-- 2212 2212 2212 2212



जीवन पथिक संसार में चलते चलो तुम सर्वदा,

राहों में आए कष्ट जो सहते चलो तुम सर्वदा।



अनजान सी राहें तेरी मंजिल कहीं दिखती नहीं,

काँटों भरी इस राह में हँसते चलो तुम सर्वदा।



बीते हुए से सीख लो आयेगा उस को थाम लो,

मुड़ के कभी देखो नहीं बढ़ते चलो तुम सर्वदा।



बहता निरंतर जो रहे गंगा सा निर्मल वो रहे,

जीवन में ठहरो मत कभी बहते चलो तुम सर्वदा।



मासूम कितने रो रहे अबला यहाँ नित लुट रही,

दुखियों के मन… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 3, 2017 at 7:24pm — 14 Comments

ग़ज़ल (इंसानियत)

ग़ज़ल (इंसानियत)



2212 2212 2212 2212



इंसान के खूँ की नहीं प्यासी कभी इंसानियत,

फिर भूल तुम जाते हो क्यों अक्सर यही इंसानियत।



जो जिंदगी तुम दे नहीं सकते उसे लेते हो क्यों,

पर खून बहता ही रहा रोती रही इंसानियत।



जब गोलियाँ बरसा जमीं को लाल खूँ से तुम करो,

संसार में आतंक को ना मानती इंसानियत।



हे जालिमों जब जुल्म तुम अबलों पे हरदम ही करो,

मजलूम की आहों में दम को तोड़ती इंसानियत।



थक जाओगे तुम जुल्म कर जिंदा रहेगी ये… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 21, 2017 at 12:33pm — 7 Comments

"होली" सायलीछंद

"होली" सायलीछंद



शिल्प- 1 2 3 2 1 शब्द



(1)

होली

का त्योहार

जीवन में लाया

रंगों की

बौछार।



(2)

होली

में जलते

अत्याचार, कपट, छल

निष्पाप भक्त

बचते।



(3)

होली

लाई रंग

हों सभी लाल

खेलें पलास

संग।



(4)

होली

देती छेद

ऊँच नीच के

मन से

भेद।



(5)

सत्रह

की होली

भाजपा की तूती

देश… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 12, 2017 at 1:22pm — 3 Comments

ग़ज़ल (चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए)

1222 1222 1222 1222



चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए,

बड़े अब इस जहाँ में हम बनेंगे जो भी हो जाए।



कोई कमजोर ना समझे नहीं हम कम किसी से हैं,

सफलता की बुलन्दी पे चढ़ेंगे जो भी हो जाए।



हमारे दरमियाँ जो भेद कुदरत का बड़ा गहरा,

बराबर उसको करने में लगेंगे जो भी हो जाए।



बहुत देखा हिक़ारत से न देखो और अब आगे,

नहीं हक जो मिला लेके रहेंगे जो भी हो जाए।



जमीं हो आसमां चाहे समंदर हो या पर्वत हो,

मिला कदमों को तुम से हम… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 8, 2017 at 10:30am — 10 Comments

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