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२२१/२१२१/१२२१/२१२
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ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
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भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
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आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
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बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो झूठ आस भी देता नहीं कभी।४।
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जनता को सत्य कैसे भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं…
Posted on January 7, 2026 at 6:04pm
१२२/१२२/१२२/१२
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सदा बँट के जग में जमातों में हम
रहे खून लिखते किताबों में हम।१।
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हमें मौत रचने से फुरसत नहीं
न शामिल हुए यूँ जनाजों में हम।२।
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हमारे बिना यह सियासत कहाँ
जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।
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किया कर्म जग में न ऐसा कोई
गिने जायें जिससे सबाबों में हम।४।
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न मंजिल न मकसद न उन्वान ही
कि समझे गये हैं मिराजों…
Posted on December 5, 2025 at 6:20am
कर तरक्की जो सभा में बोलता है
बाँध पाँवो को वही छिप रोकता है।।
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देवता जिस को बनाया आदमी ने
आदमी की सोच ओछी सोचता है।।
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हैं लगाते पार झोंके नाव जिसकी
है हवा विपरीत जग में बोलता है।।
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जान पायेगा कहाँ से देवता को
आदमी क्या आदमी को जानता है।।
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एक हम हैं कह रहे हैं प्यार…
Posted on November 11, 2025 at 1:03pm — 1 Comment
२१२२/२१२२/२१२
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तीर्थ जाना हो गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१।
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देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला
आदमी का आदमी से बैर जब।२।
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दुश्मनो की क्या जरूरत है भला
रक्त के रिश्ते हुए हैं गैर जब।३।
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तन विवश है मन विवश है आज यूँ
क्या करें हम मनचले हों पैर जब।४।
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सोच लो कैसा समय तब सामने
मौत मागे जिन्दगी की खैर जब।५।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी…
Posted on November 4, 2025 at 10:32pm — 1 Comment
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
सादर आभार आदरणीय
अपने आतिथ्य के लिए धन्यवाद :)
मुसाफिर सर प्रणाम स्वीकार करें आपकी ग़ज़लें दिल छू लेती हैं
जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी
प्रिय भ्राता धामी जी सप्रेम नमन
आपके शब्द सहरा में नखलिस्तान जैसे - हैं
शुक्रिया लक्ष्मण जी
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