( आपकी सेवा में मेरी ताज़ी रचना )
---------------------------------------
वक्त आने पे जो न संभल पाते हैं |
फिर शहर खंडहर में बदल जाते हैं ||…
ContinueAdded by श्रीराम on March 31, 2013 at 8:30am — 2 Comments
सरला का छोटा सा सुखी परिवार था. वह बहुत ही अनुशासप्रिय थी. उसके दो बच्चे थे. एक बेटा एक बेटी. बेटा पाँच साल का था और बेटी तीन की. दोनों को अपने काबू में रखती थी सरला.
जब भी कहीं बाहर जाती बच्चों को घर के अंदर रहने की हिदायत देकर बाहर से मुख्य द्वार में ताला लगा देती. बच्चे जब तक बोलने लायक न थे सबकुछ ठीक चलता रहा. एक दिन सरला कहीं बाहर से आयी तो देखा बेटा घर में नहीं है. वह सारा घर छान मारी, आस पास देखा. मगर
बेटा कहीं भी नहीं मिला. वह परेशान होकर अपने पति को जब फ़ोन करना चाही…
Added by coontee mukerji on March 31, 2013 at 2:00am — 9 Comments
जिस ख्वाब की बदौलत ताउम्र सो न पाये
ना उनके हो सके हम वो मेरे हो न पाये
बादल ने पलकें भींची मौसम के आंसू छलके
पर सुर्ख दग्ध धरती के दाग धो न पाये
पैग़ाम दे गया वो सरहद पे मरते- मरते
कुर्बानियो पे मेरी आँखें भिगो न पाये
चाहा भले सभी ने बरबाद मुझको करना
सरसब्ज़ हसरतों की कश्ती डुबो न पाये
कुदरत को जालिमो ने इस तरह से सताया
ना हँस सके परिन्दे अब्रपार रो न पाये
मायूस तू न…
ContinueAdded by rajesh kumari on March 31, 2013 at 12:00am — 18 Comments
भाग -5
गतांक से आगे)
भुवन की लड़की पारो (पार्वती) शादी के लायक हो चली थी. एक अच्छे घर में अच्छा लड़का देख उसकी शादी भी कर दी गयी. शादी में भुवन और गौरी ने दिल खोलकर खर्चा किया, जिसकी चर्चा आज भी होती है. बराती वालों को गाँव के हिशाब से जो आव-भगत की गयी, वैसा गाँव में, जल्द लोग नहीं करते हैं.
******
चंदर का बेटा प्रदीप शहर में रहकर इन्जिनियरिंग की पढाई कर रहा था.. दिन आराम से गुजर रहे थे. पर विधि की विडंबना कहें या मनुष्य का इर्ष्या भाव, जो किसी को सुखी देखकर खुश नहीं होता…
Added by JAWAHAR LAL SINGH on March 30, 2013 at 8:53pm — 2 Comments
प्राण-पल
पेड़ से छूटे पत्ते-सा समय की आँधी में उड़ा
मैं हल्के-से तुम्हारे सामने था आ गिरा,
तुमने मुझे उठाया, देखा, परखा, मुझको सोचा,
जाने क्यूँ मुझको लगा
कि वह पल मेरी बाकी ज़िन्दगी से अलग
मेरा ज़्यादा अपना था, अधिक प्रिय…
ContinueAdded by vijay nikore on March 30, 2013 at 3:30pm — 20 Comments
अपनी पुरानी डायरी में से आपके लिए कुछ हाज़िर कर रहा हूँ ! आशा है आपको पसंद आएगा !
ये प्रेमिकाएं बड़ी विकट होती हैं
बिल्कुल डाक टिकट होती हैं
क्योंकि जब ये सन्निकट होती हैं
तो आदमी की नीयत में थोडा सा इजाफा हो जाता है !
मगर जब ये चिपक जाती हैं तो
आदमी बिलकुल लिफाफा हो जाता है !!
सम्बन्धों के पानी से
या भावनाओं की गोंद से चिपकी हुई
जब ये साथ चल पड़ती हैं तो
अपने आप में हिस्ट्री बन जाती हैं !
जिंदगी के डाक खाने में उस लिफ़ाफ़े की
रजिस्ट्री…
Added by Yogi Saraswat on March 30, 2013 at 10:44am — 16 Comments
कल मैंने अपनी अप्रकाशित
कविताओं का एक बण्डल
नुक्कड़ के कोने पर बैठने वाले
छोले बेचने वाले को सौंप दिया
उसने इसे मुँह बंद करके हँसते हुए…
ContinueAdded by RAJEEV KUMAR JHA on March 30, 2013 at 10:31am — 6 Comments
दॊ सवैया (मत्तगयंद) हॊली संदर्भ मॆं
========================
1)
रंग बिरंग गुलाल लियॆ सखि, ताकत झाँकत गैल हमारी !!
संग दबंग लफंग लियॆ कछु, आइ गयॊ अलि छैल-बिहारी !!
मॊहन माधव मारि दई तकि, जॊबन बीच भरी पिचकारी !!
भूल गई सुधि लाजनि तॆ सखि,भीगि गई रँग कॆशर सारी !!
2)
अंग अनंग उमंग उठी सखि, भंग मतंग करैं किलकारी !!
हूक उठी…
Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 30, 2013 at 8:30am — 11 Comments
पानी को ललात कहीं, दिखी भीड़ बिललात।
लम्बी सी कतार लगी, पात्र रीते घूरते।।
सूख गए कूप सारे, सूने पड़े नल कूप।
सूखी नदियों के घाट, मन देख खीझते।।
जल की…
ContinueAdded by Satyanarayan Singh on March 30, 2013 at 12:30am — 10 Comments
क्या खूब उसने मुझको , पर्दा हटा के मारा
उम्मीद के अंचल मैं , उसने सुला के मारा
आयेगे कह गए वो ,मेरा इंतज़ार करना
उम्मीद के दामन मैं, ऐसे फुला के मार
बेमौत मर गया वह, ये दुनिया कह रही थी
इन्सनियत में उसने , सर को कटा के मारा
मेरा वजूद उसका हमशक्ल बन गया था
यादों मैं उसने मुझको , ऐसा सता के…
Added by Dinesh Kumar khurshid on March 29, 2013 at 9:22pm — No Comments
Added by anwar suhail on March 29, 2013 at 8:59pm — 13 Comments
Added by Amod Kumar Srivastava on March 29, 2013 at 5:03pm — 6 Comments
इस रहम इस वफ़ा की जरुरत नहीं
अब किसी रहनुमा की जरुरत नहीं
खुद मिलें ना मिलें अब मुझे रास्ते
मुझको तेरी दुआ की जरुरत नहीं
दो कदम चल के जाने कहाँ खो गया
दिल को उस गुमशुदा की जरुरत नहीं
कोई उसको भी जाके बता दे जरा
मुझको उस बेवफा की जरुरत नहीं
मेरे दामन में अब दाग ही दाग हैं
अब किसी बेख़ता की जरुरत नहीं
-पुष्यमित्र
Added by Pushyamitra Upadhyay on March 28, 2013 at 8:49pm — 4 Comments
शाम सी जिंदगी गुजरती है
रात कितनी करीब लगती है
याद नित पैरहन बदलती है
ये शमा बूंद बन पिघलती है
आंत महसूस अब नहीं करती
भूख पर आंख से झलकती है…
ContinueAdded by बृजेश नीरज on March 28, 2013 at 7:19pm — 14 Comments
Added by नादिर ख़ान on March 28, 2013 at 5:21pm — 7 Comments
मैं यह तो नहीं सकता कि मुझे सब कुछ आता है, पर यह बात मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है. फिलहाल तो इतना ही सीख पाया हूं कि एक अदद नौकरी ठीकठाक चल सके. लेकिन इसमें भी एक पेंच है कि अगर काम अच्छे से नहीं किया तो समझो वह भी हाथ से गई. रोजमर्रा की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगा रहता हूं, जब कभी कहीं पर परीक्षा देने की बारी आती है तो हाथ पांव फूलने लगते है. न जाने क्यों परीक्षा के नाम से बचपन से ही डर लगता था, यह अलग बात है कि मैं परीक्षा में खरा ही उतरता…
ContinueAdded by Harish Bhatt on March 28, 2013 at 1:22am — 3 Comments
सत्य कथा......‘‘जो ध्यावे फल पावे सुख लाये तेरो नाम...........।‘‘ . नाम दया का तू है सागर......सत्य की ज्योति जलाये........सुख लाये तेरो नाम..! जो ध्याये फल पाये........नाम सुमिरन का साक्षात् प्रभाव और महत्व दोनों का ही अनुभव मैंने सहज में परख लिया है। वास्तव में जो सुख में जीता है, उसे न तो नाम सुमिरन का महत्व समझ में आता है और न ईश्वर से साक्षात् ही कर पाता है। वह केवल अपने स्वार्थ में लिप्त रह कर केवल कपट और मोह मे ही फॅसा रहता है। वास्तविकता तो यह भी है जो व्यक्ति स्वयं को अकिंचन, शून्य…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 27, 2013 at 10:40pm — 6 Comments
मुक्तक-- जो कि होली के साथ सबको होली की शुभकामनायें...........
आज होली के नाम पर तरसे
रोज तरसे जो आज भी तरसे,
जिंदगी गम का इक पहाड हुई,
कल भी पत्थर थे आज भी बरसे।।
.......................................सूबे सिंह सुजान
Added by सूबे सिंह सुजान on March 27, 2013 at 10:08pm — No Comments
हमने चुना
अपने लिए
एक नर्क
या धकेल दिया था तुमने
हमें नर्क में...
कोई फर्क नहीं पड़ता...
नर्क
भले ही जैसा था
हमने उसमें बसने का
बना लिया मन
और ठुकरा दिया
तुम्हारे स्वर्ग को
उन लुभावने सपनो को
जिसे दिखलाते रहे तुम
और तुम्हारे दलाल…
ContinueAdded by anwar suhail on March 27, 2013 at 7:52pm — 4 Comments
ये तन्हाई अब काटने को दौड़ती है
यह गुमनामी हमें अन्दर से तोडती है
हम उस कीड़े की तरह हैं जो आबाद समंदर में होकर भी
एक सीपी में कैद है
हम उस पेड़ की तरह हैं जो घने जंगल में
होकर भी सूरज की रौशनी से अब तक महफूज़ है
हम उस कैद पंच्छी की तरह हैं,
Added by Rohit Dubey "योद्धा " on March 27, 2013 at 11:24am — 3 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |