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ये तन्हाई अब काटने को दौड़ती है 
यह गुमनामी हमें अन्दर से  तोडती है 
हम उस कीड़े की तरह  हैं जो आबाद समंदर में होकर भी
एक सीपी में कैद है 
हम उस पेड़ की तरह हैं जो घने जंगल में 
होकर भी सूरज की रौशनी  से अब तक महफूज़  है 
हम उस कैद पंच्छी  की तरह हैं, 

 जो असमानों को छोड़ एक पिंजरे में कैद है ।

यह तन्हाई यह वीरानगी ये  भीड़ में  फैला सन्नाटा
ये  अकेलापन ये सूनापन ये  दर्द
लगता है यही हमारा साथी है 
यही हमारा दोस्त है , यही हमारा हमसफ़र है
कोई साथ रहे न रहे पर दर्द ने तन्हाई ने कभी हमे अकेला न छोड़ा
जब भी औरों ने हमसे रुख मोड़ा , तन्हाई ने हमे खुद से है  जोड़ा

कुछ लम्हे हैं पुराने जिनकी यादों में हम खो  जाते हैं
क्यूंकि नए लम्हे तो अब हमे ही शराब की तरह  पी जाते हैं

हर नशे से हम  दूर ही रहते हैं , मगर लगता है की तन्हाई के साथी वही सच्चे हैं 
नशे में बेसुध  होकर लोग जिए जाते हैं
जब छोड़ के  साथी अपने सारे चले जाते हैं
तन्हाई में बस ये  नशे ही सच्ची दोस्ती निभा जाते  हैं
नशा ही यार अपना और आशिक सच्चा है
देता है हमे ख़ुशी होठों से लगता है , और गम भी मिटता है
ज़िन्दगी तो कम्बखत वैसे ही काटने को दौड़ती है
नशा ही हमे ज़िन्दगी से बेहतर मौत के नजदीक  ले जाता है ।

by: Rohit Dubey

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Comment by Rohit Dubey "योद्धा " on April 24, 2013 at 9:22am

yah kavita meri zindagi me hi aa gai thi, ab me maut se bacha magar mera punar janm jarur ho gaya.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 29, 2013 at 2:52pm

पलायन किसी रूप में हो कभी स्वीकार्य नहीं है. साहित्य में वीभत्सरस भी पलायन का पर्याय  हो कर यथार्थ का ही प्रस्तुतिकरण होता है.  व्यंग्य का भी अपना स्वरूप है. उसकी धार उलटबासियों में विशिष्ट होती है. ’योद्धा’ भाई जी.. . बहुत ही नकारात्मक सोच के साथ भिड़ रहे हैं इस ज़िन्दग़ी के साथ ?

मैं अभिव्यक्त ’नशा’ को प्रतीक या बिम्ब मान भी लूँ,  आपकी इन पंक्तियों के आवरण में अनुमोदित नहीं कर पा रहा हूँ.

शुभं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 28, 2013 at 8:17pm

अंतर्मन के भावों की, बेबसी और तन्हाई की नकारात्मकता की सुन्दर अभिव्यक्ति..

काव्य सृजन यदि सकारात्मक हो तभी सार्थकता रखता है... अन्यथा ऐसे सन्देश नकारात्मकता को ही विस्तार देते हैं.

शुभेच्छाएँ

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