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सपने की झलक

सपने की झलक

 

स्वर्णिम कल्पनाओं में पले, सलोने-से, परितुष्ट सपने मेरे,

लगता है कई संख्यातीत संतप्त युगों पर्यन्त  मैंने तुमको

आज  जीवन-गति की लय पर यूँ ध्वनित देखा, गाते देखा।

वर्तमान के उजले संगृहीत प्रकाश में पुन:  प्रदीप्त थे तुम,

समय की धारा पर मैंने तुमको लहरों-सा लहलहाते देखा।

जाने कितने अवशेष हैं अब सुख-निद्रा के यह प्रसन्न-पल,

गिने-चुने पलों की झोली भर कर रंजित मन में संप्रयुक्त

ऐसे ही उल्लास में अपने तू…

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Added by vijay nikore on May 27, 2013 at 1:00pm — 17 Comments

दे विधान भी कड़े कड़े

चीन ने भारतीय सीमा के अन्दर घुसकर ५ किलोमीटर लम्बी सड़क बनाई....तब कवि को लेखनी उठानी पड़ती है.......जागरण के लिए.....

1

भारती महान किन्तु अन्धकार का वितान, है अमा समान ज्ञान का नहीं प्रसार है

द्रोह वृद्धि की कमान, भ्रष्टनीति की मचान, क्यों सजी हुई कि स्वाभिमान तार तार है

मानवीयता न ध्यान, पाप पुण्य व्यर्थ मान, दानवी मनुष्य का मनुष्य पे प्रहार है

धर्म का रहा न मान, रुग्ण आँख नाक कान, शत्रु का लखो विवेक नाश हेतु वार है

2

क्यों नपुन्सकी प्रवृत्ति का…

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Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 27, 2013 at 10:38am — 16 Comments

मेरी प्यारी भारत माँ

जब देखता हूँ इस युग के भारतवर्ष के मंत्रियों को

खौल उठता है दिल जब देखता हूँ भ्रष्टाचारियों को

हर सड़क पर खुदे हैं गड्ढे

हर गली में कचरों की भरमार

हर रोज़ अख़बारों में हत्या का समाचार

राजधानी होकर भी हर रोज़ होता बलात्कार

सदाचारियों से सरकार का नहीं कोई सारोकार

गरीबी बढती दिन पर दिन

सरकार करती रोज़ भ्रष्टाचार

सदाचारी मंत्रियों की बढती दरकार

दुष्कर्मियों पर परोपकार

सद्कर्मियों का तिरस्कार

मंत्रियों के पास धन की भरमार

आम नागरिकों को…

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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on May 27, 2013 at 10:00am — 5 Comments

काँपते उर

संवेदना के शुष्क तरु
के सानिध्य में,
पुष्प प्रीति के,
ढूंढे जा रहे हैं
आज।
पत्थरों को ईश मान,
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से
पिपासाकुल खग...
भगाए जा रहें हैं
आज।
प्रसाधन-जनित
यज्ञशाला की अग्नि में,
आंच के भय से
आहुति,
सब घटा रहे हैं।
सुना है,देखा नहीं
भगवान औ भूत,दोनों
पर...ईशास्था से अभय
को नकार
भूत में विश्वास कर,
उर काँपते हैं आज।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on May 27, 2013 at 8:10am — 14 Comments

अद्भुत कला

अद्भुत कला है

बिना कुछ किये

दूजे के कामों को

खुद से किया बताकर

बटोरना वाहवाही...

जो लोग

महरूम हैं इस कला से

वो सिर्फ खटते रहते हैं

किसी बैल की तरह

किसी गधे की तरह

ऐसा मैं नही कहता

ये तो उनका कथन है

जो सिर्फ बजाकर गाल

दूसरों के कियेकामों को

अपना…

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Added by anwar suhail on May 26, 2013 at 7:49pm — 5 Comments

आओ प्रिये!

आओ प्रिये ! आओं

फिर रात ढली

फिर चाँद पुकारे

ज्यों रोशनी को

चिराग तरसे

त्यों तुम्हारी याद में

नैन बरसे।।



आओ प्रिये ! आओ

दिल की हर धड़कन

तुम्हें पुकारे ।।



तुम्हारी छुअन से मिलती

नई चेतना मुझको ।

नेह में डूबी हुई

नई प्रेरणा मुझको ।



वही चिर-परिचित सम्बल,

वही तुम्हारा अहसास,…

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Added by TARUN KUMAR SONI "TANVEER" on May 26, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

अज्ञान तिमिर

आकंठ डूबे हुये हो क्यों,

अज्ञान तिमिर गहराता है।

ये तेरा ये मेरा क्यों ,

दिन ढलता जाता है।

 

क्यों सोई अलसाई  अंखियाँ,

न प्रकाश पुंज दिखाता है ।

जीवन मरण का फंदा ,

आ गलमाल बन लहराता है।

 

तब क्यों रोते हो,

जब सब छिनता जाता है।

खोलो ज्ञान चक्षु औ,

हटा दो तिमिर घनेरा।

फैले  पुंज प्रकाश का ,

होवे  दर्शन नयनाभिराम।

 

 

(अप्रकाशित एवं मौलिक)

Added by annapurna bajpai on May 26, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

नाथ तुमरी लीला अनुपम

नाथ तुम अनुपम जाल बिछायो,

जगत को यहि मे भरमायो।

गरभवास मे करी प्रतिज्ञा,

यहाँ पर करि बिसरायो।

 

मातु पिता की गोदी खेलि के,

बाला पनहि बितायो ।

ज्वान भयो नारी घर आई,

तामे मन ललचायो।

 

सुंदर रूप देखि के भूल्यो,

जगत्पिता बिसरायो।

प्रौढ़ भए पर सुत औ नारी,

लई अंग लपटायो ।

 

आशा प्रबल भई मन भीतर,

अनगित पाप करायो।

पुण्य कार्य नहीं एकहु कीन्हे,

चारो पनहि बितायो…

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Added by annapurna bajpai on May 26, 2013 at 12:00pm — 7 Comments

ग्रीष्म और वर्षा का संगम -दोहों के माध्यम से

ग्रीष्म शुष्क लागत बदन, जागत तन में पीर.

मनुज, पशु, खगवृन्द सभी, खोजत शीतल नीर.

अरुण अनल अति उग्र हैं, तपस लगत चहुओर.

श्वेद बूँद भींगे बदन, अगन लगे अति घोर.

पल-पल बिजली जात हैं, बिजली घर में शोर.

दूरभाष की घंटिका,     बजन लगे घनघोर.

कोकिल कूके आम्र तरु, शीतल पवन न शोर.

वृन्द खगन के देखि के, नाचत मन में मोर.

वरुण,इंद्र, विनती सुनौ, बरस घटा घनघोर.

उमरि घुमरि मेघन परखी, नाचत वन में मोर.

मेघ घिरे नभ…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on May 26, 2013 at 5:56am — 8 Comments

वो जो पास होते

वो जो पास होते कुछ ऐसा यार होता,  
बेताब दिल हमारा खुश बेशुमार होता. 
 
हम हाले-दिल सुनाते बेचैन निगाहों से, 
उनका भी कुछ अपना अंदाज़े-प्यार होता. 
 
एहसास जो हमें है उनको भी काश होता, 
उनको भी मेरी चाहत का इंतज़ार होता. 
 
उनको भी इल्म होता दीवानगी का मेरे, 
दीवानगी पे मेरे उनको खुमार होता. 
 
हम साथ-साथ चलते गिरते कभी संभलते…
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Added by अमित वागर्थ on May 25, 2013 at 6:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरे मन को भाता बस्तर !

ग़ज़ल - 

नहीं युधिष्ठिर एक यहाँ पर । 

यक्ष छिपे हर तरफ बहत्तर ।

क्यों बैठा सीढी पर थककर ,

चल कबीर चौरा के मठ पर ।

साखी शबद सवैया गा तू ,

लोभ छोड़ अब चल दे मगहर ।

रिश्ते सारे स्वार्थ के धागे ,

झूठे हैं नातों के लश्कर ।

तुम गुडगावां के गुण गाओ ,

मेरे मन को भाता बस्तर ।

सेवक कोई रहा नहीं अब ,

सबके भीतर बैठा अफसर ।

ज्ञान की पगड़ी सर पर भारी ,

मगर ज़ुबाने जैसे नश्तर…

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Added by Abhinav Arun on May 25, 2013 at 3:48pm — 14 Comments

ग़ज़ल -प्रेमिका के हाथ की तुरपाइयाँ !

ग़ज़ल :-

एक पर्वत और दस दस खाइयां |

हैं सतह पर सैकड़ों सच्चाइयां ।

हादसे द्योतक हैं बढ़ते ह्रास के ,

सभ्यता पर जम गयी हैं काइयाँ 

भाषणों में नेक नीयत के निबन्ध ,

आचरण में आड़ी तिरछी पाइयाँ 

मंदिरों के द्वार पर भिक्षुक कई ,

सच के चेहरे की उजागर झाइयाँ 

आते ही खिचड़ी के याद आये बहुत ,

माँ तेरे हाथों के लड्डू लाइयाँ …

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Added by Abhinav Arun on May 25, 2013 at 3:30pm — 22 Comments

हर रूप में हर रंग में

हर रूप में हर रंग में,

कभी दूर से कभी संग में

अकेले कमरा-बंद में ,

कभी भीड़ के हडकंप में

 

तपते आँगन में नंगे पाँव से,

कभी पीपल की ठंडी छांव से

हकीक़त कि कम्पित नाव से,

कभी सपनों के रेशमी गांव से

 

नदिया कि बहती धार पे,

कभी क्षितिज के उस पार पे

पेड़ों कि हिलती डार पे,

कभी वीणा कि झंकृत तार पे

 

दूर चाँद के मुस्कुराने पर,

कभी दिन में आंसू बहाने पर

फूलों के खिलखिलाने…

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Added by Priyanka Tripathi on May 25, 2013 at 1:00pm — 15 Comments

सबने कहा गलत है राह |

मानव जब दानव बन जाता , खो देता आचार विचार |
घूमता है जानवर जैसे , कुछ भी समझाये  परिवार |
जान की परवाह ना करता , भूल जाता भरा  संसार |
पाप का घडा जब  भरता है , कोई ना मिले…
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Added by Shyam Narain Verma on May 25, 2013 at 11:50am — 2 Comments

ऐ मेरी मुश्किलों सब मिलके मेरा सामना करो

ऐ  मेरी  मुश्किलों  सब मिलके   मेरा सामना करो

 

मै  अकेला ही  बहुत हूँ  तुमसे निबटने के लिए ,

ऐ मेरी मुश्किलों सब मिलके मेरा…

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Added by Mukesh Kumar Saxena on May 24, 2013 at 9:30pm — 5 Comments

सात हाइकु

(१)

जिन्हें है जल्दी

अग्रिम श्रद्धांजलि

जाएँगें जल्दी

(२)

कैसे कहूँ मैं?

कैंसर पाँव छुए…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 24, 2013 at 9:00pm — 5 Comments

मै कौन हूँ तुम्हारा [गीत]

इतना मुझे बता दो , मै कौन हूँ तुम्हारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी की धारा ।

साँसों से बन्ध के जैसे , कोई डोर खींचती है ।

जाने मुझे क्यों पल पल , तेरी ओर खींचती है ।

हर सांस में सिसक कर, दिल ने तुम्हे पुकारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी की धारा ।

मैकश अगर मै कोई , तू मेरा मैकदा है ।

पीता हूँ जाम तेरे , मुझको तेरा नशा है ।

आँखों में तैरता है , तेरे प्यार का नज़ारा ।

तेरी ओर बहती जाये , मेरी ज़िन्दगी…

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Added by Neeraj Nishchal on May 24, 2013 at 2:54pm — 19 Comments

पहेली है ये जिंदगी ......

क्या है - जिंदगी ,

संध्या है या प्रभात,

शीत है या उष्ण,

सूरज की लाली या चांदनी है चाँद की ,

आदि है या अंत 

स्वप्न है या चैतन्य…

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Added by Anuj kumar Pandey on May 24, 2013 at 12:30pm — 8 Comments

सॉनेट/ तुम आ जाओ

14 पंक्तियां, 24 मात्रायें

तीन बंद (Stanza)

पहले व दूसरे बंद में 4 पंक्तियां

पहली और चौथी पंक्ति तुकान्त

दूसरी व तीसरी पंक्ति तुकान्त

तीसरे बंद में 6 पंक्तियां

पहली और चौथी तुकान्त…

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Added by बृजेश नीरज on May 23, 2013 at 3:30pm — 23 Comments

प्रहार ये प्रचण्ड है

खण्ड खण्ड में विभक्त है मनुष्यता अपार
आसुरी प्रवृत्ति का प्रहार ये प्रचण्ड है
आ रहा समक्ष भी न देव शक्ति का प्रभाव
दुष्ट को प्रताड़ना विधान या न दण्ड है
सन्त हीन है समाज, शक्तिवान में प्रभूत --
आज देख लो सखे बढ़ा हुआ घमण्ड है
भारती अपंग हो गई सुनो परन्तु मित्र
घोष हो रहा कि राष्ट्र नित्य ही अखण्ड है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 23, 2013 at 10:41am — 11 Comments

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