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संवेदना के शुष्क तरु
के सानिध्य में,
पुष्प प्रीति के,
ढूंढे जा रहे हैं
आज।
पत्थरों को ईश मान,
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से
पिपासाकुल खग...
भगाए जा रहें हैं
आज।
प्रसाधन-जनित
यज्ञशाला की अग्नि में,
आंच के भय से
आहुति,
सब घटा रहे हैं।
सुना है,देखा नहीं
भगवान औ भूत,दोनों
पर...ईशास्था से अभय
को नकार
भूत में विश्वास कर,
उर काँपते हैं आज।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Vindu Babu on June 13, 2013 at 11:30pm
आदरणीय रक्ताले महोदय आपका हृदयातल से बहुत आभार।
स्नेह बनाए रखें..
सादर
Comment by Ashok Kumar Raktale on June 3, 2013 at 7:54pm

आदरणीया वन्दना तिवारी जी सादर, बहुत ही कटु सत्य को सम्मुख लाने का सुंदर और सफल प्रयास किया है आपने पंक्ति पंक्ति मुग्ध कर रही है. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Vindu Babu on June 2, 2013 at 10:57am

आदरणीय सादर अभिनन्दन्!
महोदय मैंने जो देखा,वही वर्णित करने का प्रयास किया है, श्री शिवपूजन सहाय जी को पढ़ने का सौभाग्य मुझे अभी प्राप्त नहीं हो पाया है। आपने इंगित किया, इसके लिए आपकी बहुत आभारी हूं, अब शीघ्र ही उनके साहित्य तक पहुंचने का प्रयास करूंगी।
आपकी प्रतिक्रिया पाकर मेरा मनोबल बहुत बढ़ा है, आदरणीय आपके आशीष के लिए विनयी हूं।
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 11:25pm

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचजगत्यांजगत् .. .  फिरभी विश्वस्वरूप के प्रतीकों के प्रति जो अन्यमनस्कता है उसकी ओर इंगित करने का एक सुगढ़ प्रयास हुआ है, आदरणीया.

शिवपूजन सहाय की कथा ’दरिद्र नारायण’ इसी कथ्य का गद्यस्वरूप थी. 

सामयिक सर्वग्राह्यता को लताड़ देने का एक सार्थक प्रयास हुआ है.

इस प्रयास केलिए बधाई.

Comment by ram shiromani pathak on May 29, 2013 at 4:00pm

आ0 वंदना जी,बहुत ही हृदय स्पर्शी रचना !सुन्दर...बधाई स्वीकार करें 

Comment by Vindu Babu on May 29, 2013 at 3:15pm
आदरणीसा शालिनी जी सादर नमस्कार के साथ आपका बहुत-बहुत स्वागत् और आभार है।
इस बदलाव को क्या नाम दिया जाय,
उन्नति,विकास,आधुनिकता या फिर और कुछ???
सादर
Comment by Vindu Babu on May 29, 2013 at 3:10pm
परम् आदरणीय निकोर सर सादर नमन्!
बिल्कुल विचारणीय विषय है आदरणीय कि जब हम ईश्वर की लौकिक कृति/प्रकृति/स्थिति को नहीं सहेज,संवार और सह पा रहे हैं तो अलोकिक को साधने चल देते हैं??
आपका बहुत आभार। निवेदन है स्नेह बनाए रखिएगा।
सादर
Comment by Vindu Babu on May 29, 2013 at 3:05pm
आदरणीय केवल प्रसाद जी 'बहुत सुन्दर प्रसंग' या 'बहुत दु:खद प्रसंग'???
आप यहाँ पधारे इसके लिए आपका बहुत आभार महोदय।
सादर
Comment by Vindu Babu on May 29, 2013 at 3:02pm
आदरेया कुंती जी यथार्थ कल्पना कविता का उत्तम गुण हो सकता है,पर यह बेढंगी सी रचना का उद्गम 'पूर्णतय: आँखों देखी' से ही हुआ है। आप रचना के मूल तक पहुंची इसके लिए आपका बारम्बार आभार व अभिनन्दन!
आपके आदेश का पालन करते हुए कहना चाहूंगी आदरेया कि जो दृश्य हृदय में धंस नहीं पाते वो लेखनी से उतार देती हूं बस।
एक वाक्य साझा करना चाहूंगी जो इस रचना का कारण बना- ''पानी पीते पीते रोज घड़े का धागा खींच देती है नालायक,(चिड़िया)तो जल धारा रुक जाती है,इतने तालाब नाली न जाने किसके लिए भरे हैं।''
बाकी आप लोग ही बता सकते हैं कि मैं अपनी बात कहने में सफल कहाँ तक हो पाई हूं,जो कुछ इस तरह है-
*हघट बंधाना,यज्ञ-औपचारिकता
खग भगाना-सूखती संवेदना
*प्रसाधन जनित अग्न- लाइटर से उत्पन्न अग्नि उद्यम से पलायनवादिता का लक्षण प्रतीत होता है,परिणाम में अनास्था और हतोत्साह।
*पहले,लकड़ी की रगड़ से उत्पन्न अग्नि-उद्यम जनित उत्साहवर्धक तथा आस्थावर्धक होती थी।
*आँच-सहनशीलता में उत्तरोत्तर कमी
*भूत मे विश्वास भगवान में अविश्वास-आज की नकारात्मता।
Comment by shalini rastogi on May 29, 2013 at 2:15pm

पत्थरों को ईश मान,
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से
पिपासाकुल खग...
भगाए जा रहें हैं
आज।... .... बहुत बड़ा सत्य है है ये आज का ... बहुत ही हृदय स्पर्शी  व विचार पूर्ण रचना !

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