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उद्येश्य बदल गया-
भावों की पहरन
शब्द का
परिमाण बदल गया,
साहित्य,दर्पण समाज का
धुंधला हो गया।
प्रतिद्वंदी
तलवार का,कलम
लोकेष्णा का दास बन गया।
बाढ़ है, तो बारिश भी है
आऽज,भावेश का
बहाव बदल गया।
साहित्य का...
उद्येश्य बदल गया।
परिवेश बदल गया।।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Vindu Babu on May 24, 2013 at 12:40pm
आदरणीय निकोर सर सादर अभिनन्दन!
क्षमा करें महोदय बहुत विलम्ब के बाद आपकी प्रतिक्रिया तक पहुंच सकी.
वास्तविकता यही है आदरणीय रचना का उद्भव गहन सोंच के बाद ही हुआ है।कदाचित् मेरे सम्प्रेषण में कमी रह है।
सादर
Comment by vijay nikore on April 29, 2013 at 7:04pm

बहुत सोचने को दिया है आपकी रचना ने।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:45pm
आदरणीय विजय मिश्र जी सादर प्रणाम्।
आपने रचना के तल को छुआ और कथ्य का अनुमोदन किया,इसके लिए हृदयातल से आभार आपका।
सादर
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:40pm
जी बिल्कुलआदरणीय रक्ताले सर।परिवर्तन के दो पहलू अवश्य होते है-नकारात्मक और सकारात्मक।वर्तमान में मुझे कईबार ये अनुभव हुआ कि समाज के कल्याण से पहले रचनाकार अपनी लोकप्रियता/पाठक की रुचि पहले सोचता है।भले ही रुचि में कोई सार्थकता न हो।
आपने रचना का अवलोकन किया बड़ा अच्छा लगा।
सादर आभार
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:39pm
आदरणीय आशीष जी आपका बहुत शुक्रिया।
सादर
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:38pm
परम् आदरणीय सौरभ महोदय आपने रचना का मर्म समझा,इसके लिए आपका हृदयातल से बहुत आभार।
सादर
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:38pm
परम् आदरणीय सौरभ महोदय आपने रचना का मर्म समझा,इसके लिए आपका हृदयातल से बहुत आभार।
सादर
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:35pm
आदरेया कंती जी आपसे सहमत हं।आपने अनुमोदन किया रचना सार्थक हुई।
सादर
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:34pm
आपको भी मेरा हार्दिक धन्यवाद आदरणीय केवलप्रसाद जी।
Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:33pm
आदरणीय कुशवाहा सर सादर नमस्कार।
सही कहा आपने 'खड़े खड़े बांसुरी बजाते रहे...'
आपकी अनोखी प्रतिक्रया पाकर मन प्रसन्न हुआ।स्नेह बनाए रखें महोदय।
आपका सादर आभार

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