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फायदा क्‍या गजल

2122 2122 1222

क्‍या शिकायत करू मैं इस जमानें से

फायदा क्‍या है किसी को बतानें से

अब मजारो की तरफ यूँ न देखो तुम

आ सकेगें हम न आँसू बहानें से

बदनसीबी साथ मेरे उम्र भर थी

सो रहा हूँ चोट खा कर जमानें से

यार मेरे तुम बहाओ न अश्‍को को

फायदा क्‍या अब यहाँ दिल जलानें से

रूठ कर हम से चले ही गये वो जब

साथ ना अब तो मिले कुछ बतानें से

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी गहमर…

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Added by Akhand Gahmari on April 16, 2014 at 6:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल ‘ ऐसा दिया है ज़हर ‘ --- 'चिराग'

221 2121 1221 212

 

बाज़ारे-इश्क़ सज गया पूरे उफान पर

शीला का नाम चढ़ गया सबकी ज़बान पर

 

धंधे की बात कीजिए कच्ची कली भी है

क्या कुछ नहीं मिलेगा मेरी इस दुकान पर

 

मुँह में दबाए पान मियाँ किस तलाश में

रंगीनियाँ भुला भी दो उम्र अब ढलान पर

 

कूंचे में आए हुस्न का बाज़ार देखने

चोरी से देखते है सभी इक निशान पर

 

रोज़ आते हैं दीवाने यहाँ गम को बाँटने

करते है वाह-वाह वो घुंघरू की तान…

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Added by Mukesh Verma "Chiragh" on April 16, 2014 at 5:00pm — 30 Comments

मेरे खतों को लगा दिल से चूमती है वो

१२१२     ११२२    १२१२     २२

हसींन जुल्फ कहीं पर बिखर रही होगी

हवा है महकी उधर से गुजर रही होगी

 

फलक पे चाँद है बेताब चांदनी गुमसुम

कहीं जमी पे वो बुलबुल निखर रही होगी

 

जमी पे आज हैं बिखरे तमाम आंसू यूं

ग़मों में डूबी ये शब किस कदर रही होगी

 

मेरे खतों को लगा दिल से चूमती है वो

खुदा कसम ये खबर क्या खबर रही होगी

 

जो जान हम पे छिड़कती उसे नहीं देखा

वो झिर्रियों से ही तकती नजर रही…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 16, 2014 at 12:12pm — 17 Comments

इशारों को शरारत ही कहूं या प्यार ही समझूं

1222 1222 1222 1222

इशारों को शरारत ही कहूं या प्यार ही समझूं

कहूं मरहम इन्हें या खंजरों का वार ही समझूं

कशिश बातों में तेरी अब अजब सी मुझको लगती है

कहूं बातों को बातें या इन्हें इकरार ही समझूं

वो डर के भेडियो से आज मेरे पास आये हैं

कहूं हालात इसको या कि फिर एतवार ही समझूं

झरे आँखों से आंसू आज तो बरसात की मानिंद

कहूं मोती इन्हें या सिर्फ मैं जलधार ही समझूं

तेरी नजरों ने कैसी आग सीने में लगाई है …

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 16, 2014 at 11:00am — 8 Comments

बेटियाँ होंगी न जब /गजल/कल्पना रामानी

212221222122212

गर्भ में ही निज सुता की, काटकर तुम नाल माँ!

दुग्ध-भीगा शुभ्र आँचल, मत करो यूँ लाल माँ!

 

तुम दया, ममता की देवी, तुम दुआ संतान की,

जन्म दो जननी! न बनना, ढोंगियों की ढाल माँ!

 

मैं तो हूँ बुलबुल तुम्हारे, प्रेम के ही बाग की,

चाहती हूँ एक छोटी सी सुरक्षित डाल माँ!

 

पुत्र की चाहत में तुम अपमान निज करती हो क्यों?

धारिणी, जागो! समझ लो भेड़ियों की चाल माँ!

 

सिर उठाएँ जो असुर, उनको…

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Added by कल्पना रामानी on April 16, 2014 at 10:00am — 28 Comments

स्वप्न और सत्य /नीरज नीर

कभी कभी खो जाता हूँ ,

भ्रम में इतना कि 

एहसास ही नहीं रहता कि 

तुम एक परछाई हो..

पाता हूँ तुम्हें खुद से करीब 

हाथ बढ़ा कर छूना चाहता हूँ.

हाथ आती है महज शुन्यता .

स्वप्न भंग होता है ..

पर सत्य साबित होता है

क्षणभंगुर.

स्वप्न पुनः तारी होने लगता है.

पुनः आ खड़ी होती हो

नजरों के सामने .. 

नीरज कुमार नीर 

मौलिक एवं प्रकाशित 

Added by Neeraj Neer on April 16, 2014 at 8:07am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी – 16 वॉल्थट में वह पहली रात !

आँखों देखी – 16 वॉल्थट में वह पहली रात !

 

     “थुलीलैण्ड” में क्रिसमस की पूर्व संध्या का अनुभव यादगार बनकर रह गया हमारे मन में. अगले दो दिनों में हेलिकॉप्टर द्वारा कई फेरों में आवश्यक सामग्री जहाज़ से शिर्माकर स्थित भारतीय शिविर, जिसे नाम दिया गया था ‘मैत्री’, तक पहुँचा दिया गया. 27 दिसम्बर 1986 के दिन ‘मैत्री’ को पूरी तरह रहने योग्य बनाकर छठे अभियान के ग्रीष्मकालीन दल के हवाले कर दिया गया. विभिन्न वैज्ञानिक कार्यक्रमों को इसी शिर्माकर ओएसिस में अथवा मैत्री को…

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Added by sharadindu mukerji on April 16, 2014 at 2:00am — 5 Comments

एक कुण्डलिया छंद --- गर्मी


फागुन बीता देखिये ,खिली चैत की धूप
सर्दी की मस्ती गई, झुलस रहा है रूप
झुलस रहा है रूप ,सुहाती है वैशाखी
धरती तपती खूब ,करे क्या मनुवा पाखी
होते सब बीमार ,बढ़ी मच्छर की भुन भुन ।
आगे जेठ अषाढ़ , कहाँ अब भीगा फागुन ॥..

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on April 15, 2014 at 9:20pm — 8 Comments

कुण्डलियाँ छंद - लक्ष्मण लडीवाला

बेशर्मी को ओढ़कर कायर हुआ समाज

चीखे अबला द्रोपदीकौन बचाए लाज

कौन बचाए लाजखुले घूमे उन्मादी

अपराधी आजादमिली ऐसी…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 15, 2014 at 5:30pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल '' चाँद भी अब साँवला हो जायेगा '' - ( गिरिराज़ भंडारी )

2122     2122     2122       212

क्या मुआफी मांग इंसा यूँ भला हो जायेगा

एक अच्छाई से दानव,  देवता हो जायेगा ?

 

खूब घेरी चाँद को , बेशक हज़ारों बदलियाँ

क्या लगा ये ? चाँद भी अब साँवला हो जायेगा

 

जिस तरह से धूप अब अठखेलियाँ करने लगी

सच अगर तू देख लेगा , बावला हो जायेगा

 

थोड़ा डर भी है सताता इस जमे विश्वास को

पर कभी लगता, चमन फिर से हरा जो जायेगा

 

हौसलों को तुम अमल में भी कभी आने तो…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 15, 2014 at 5:00pm — 18 Comments

गज़ल - वतन को लहू की नज़र कर दिया है - इमरान

122 122 122 122



सियासी जमातो! ग़दर कर दिया है,

वतन को लहू की नज़र कर दिया है।



निशाँ भी नहीं है कहीं रोशनी का,

के हर सू अँधेरा अमर कर दिया है।



डरी और सहमी है औलादे आदम,

ज़हन पर कुछ ऐसा असर कर दिया है।



नई नस्ले नफरत को पाने की धुन में,

रगों में रवाना ज़हर कर दिया है।



यहाँ कल तलक थी हज़ारों की बस्ती,

बताओ के उसको किधर कर दिया है।



ये वादा था सिस्टम बदल देंगे सारा,

मगर और देखो लचर कर दिया है।



गबन…

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Added by इमरान खान on April 15, 2014 at 1:30pm — 11 Comments

आस के दीप गजल

212 212 212 212
गीत गा कर उसे हम सुनाते रहे
हाल दिल का उसे हम बताते रहे

रात भी तो गुजरने लगी थी मगर
पास आये न बाते बनाते रहे

प्‍यार उन से करे हम कहाँ बैठ जब
चाँद से भ्‍ाी उसे हम छुपाते रहे

प्‍यार हमने किया प्‍यार उसने किया
वो मिटाते रहे हम निभाते रहे

माँग उसकी सजाई लहू से मगर
साथ चल ना सके हम बुलाते रहे

फिर मिलेगे कभी ना कभी हम यहाँ
आस के दीप मन में जलाते रहे

मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on April 15, 2014 at 12:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल : ढंग अलग हो करने का

बह्र : २२ २२ २२ २

जीने का या मरने का
ढंग अलग हो करने का

सबका मूल्य बढ़ा लेकिन
भाव गिर गया धरने का

आज बड़े खुश मंत्री जी
मौका मिला मुकरने का

सिर्फ़ वोट देने भर से
कुछ भी नहीं सुधरने का

कूदो, मर जाओ `सज्जन'
नाम तो बिगड़े झरने का
-
(मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 15, 2014 at 10:30am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रूप की चाहत जिन्हें हर दम रही (ग़ज़ल 'राज')

2122   2122     212

वक़्त की रफ़्तार तो पैहम  रही

जिंदगी की लौ मगर मद्धम रही

 

बर्फ बनकर अब्र जो है गिर रहा 

पीर की बहती नदी भी जम रही

 

ग़म भरे अशआर जिसमे थे लिखे

धूप में भी वो ग़ज़ल कुछ नम रही

 

टूट के बिखरे सभी वो आईने

रूप की चाहत जिन्हें हर दम रही 

 

वक़्त रहते कुछ नहीं हासिल किया

सोचते हैं जिंदगी कुछ कम रही

 

कैसे कह दें वो जहाँ में खुश रहे

आँखे उनकी तो सदा…

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Added by rajesh kumari on April 15, 2014 at 9:30am — 31 Comments

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!
फिर से वही बहाने दे !!

तेरा भी हो जाऊँगा !
खुद का तो हो जाने दे !!

गैरों के घर खूब रहा!
अपने घर भी आनें दे !!

मूर्ख दोस्त से अच्छा है !
दुश्मन मगर सयाने दे!!

कागज़ की फिर नाव बनें !
बचपन वही पुराने दे !!

**************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 14, 2014 at 11:30pm — No Comments

गजल : फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 221/2121/1221/212

—————————————————————————

किरदार मेरा अपनी सहेली से पूछना

औ लम्स* मेरा अपनी हथेली से पूछना     *[स्पर्श]

मैं इक खुली किताब हूं तू खुल के बात कर

मुझसे न कोई बात पहेली से पूछना

पहले तो मुझसे कहना किसी और की हूं मैं

फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना

बेदर्द वक्त कितना है हो जाएगा पता

खंडर हुई है कैसे हवेली से पूछना

खुशबू ​तुम्हारे जिस्म की है जानता 'शकील'

अच्छा नहीं सहन* की…

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Added by शकील समर on April 14, 2014 at 11:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल: शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये

दिल में उम्मीदों का चलता कारवाँ रखिये

हर अँधेरे के लिए कोई शमाँ रखिये

 

बज़्म में आ ही गए कुछ तो निशाँ रखिये

कुछ अलग अपना भी अंदाज़े बयाँ रखिये

 

रोज़ का मेहमाँ कोई मेहमाँ नहीं होता

शह्र के बाहर सही अपना मकाँ रखिये

 

देवता, बुत और पत्थर बन के रहते हो

कुछ तो इंसानों के जैसी ख़ामियाँ रखिये

 

ख्वाब जब होंगे नहीं तासीर क्या होगी  

ख्वाब को अब तो सवार-ए-कहकशाँ रखिये

 

तीरगी को है मिटाती एक…

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Added by भुवन निस्तेज on April 14, 2014 at 10:30pm — 14 Comments

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की/गजल/कल्पना रामानी

 1212212122

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।

है कौन बातें करे अमन की।

 

हुई हुकूमत हितों पे हावी,

हताश है, हर गुहार जन की।

 

फिसल रहे पग हरेक मग पर,

कुछ ऐसी काई जमी पतन की।

 

फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर,

कदम तले बातें सत वचन की।

 

निगल के खुशबू को नागफनियाँ,

कुचल रहीं आरज़ू चमन की।

 

ये किसके बुत क्यों बनाके रावण,

निभा रहे हैं प्रथा दहन की।

 

ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं…

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Added by कल्पना रामानी on April 14, 2014 at 9:45pm — 10 Comments

इम्तेहान ( गजल )

221 2121 1221 212

----------------------------------------------

जिंदगी मैं अभी भी कुछ इम्तेहान बाकी हैं

गुजरी हैं आंधियां अभी तूफ़ान बाकी हैं

मैं दूर तेरी महफ़िल से जाऊं भी तो कैसे

महफ़िल मैं तेरी मेरे भी कदरदान बाकी हैं

बे-ईमानों की दुनिया मैं घूमता हूँ शान से

जब तक मेरे सीने मैं मेरा ईमान बाकी है

लौटकर के मौत भी घर से मेरे खाली गई

मेरी माँ का कोई ऐसा वरदान बाकी है

सो रहा है मुल्क मेरा जो सुकूं…

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Added by Sachin Dev on April 14, 2014 at 4:00pm — 29 Comments

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बचपन की वो सुन्दर यादें

गांव की मिट्टी,पेड़ों के झूले

कैसे भूलाए जा पाऐगे

रोना,हसना,और मचलना

गिरना,गिरकर फिर से संभलना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

पगडन्डी पर दौड़ लगना

खुली हवा से बातें करना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

तितली,बन्दर और गिलहरी

मोदक,मक्खन और जलेबी

कैसे भूलाए जा पाऐगेम

माँ की रोटी,दादी की कहानी

छुटपन की सहेली मीना,रानी

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बाबू जी का डान्ट लगाना

और प्यार से गोद उठाना

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

सावन के… Continue

Added by Pragya Srivastava on April 14, 2014 at 1:27pm — 12 Comments

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