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आदमी (गीतिका छंद)

आदमी से आदमीयत, खो ग है रे कहां ।

आदमी से आदमी को, डर तभी तो है यहां ।।

आदमी में जो पड़ा है, स्वार्थ का साया जहां ।

आदमी अब आदमी से, बच नही पाये यहां ।।



आदमी आतंकवादी, उग्रवादी जो बने ।

आदमी के हाथ दोनो, खून से ही हैं सने ।।

मर्द जो है आदमी में, वो बलत्कारी लगे ।

गोद की बेटी उसे तो, ना दिखे अपने सगे ।।



आदमी को आदमी जो, है बनाना फिर कहीं ।

आदमी में तो जगाओ, आदमीयत फिर वही ।।

आदमी जो आदमी से, प्रेम करने फिर लगे…

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Added by रमेश कुमार चौहान on June 17, 2014 at 11:00pm — 6 Comments

सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में..

कल घूमने गया था समंदर के गांव में,
हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में।
 
निकले उधर से जब वो समंदर ठहर गया,…
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Added by atul kushwah on June 17, 2014 at 10:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ये नुमायाँ है किसे क्या चाहिये - ग़ज़ल

2122/ 2122/ 212

ये नुमायाँ है किसे क्या चाहिये

बेख़िरद को सिर्फ़ चेहरा चाहिये                      बेख़िरद =कम अक्ल

 

हो गया है ताज़िरों का ये वतन                        ताज़िर=व्यापारी

खुश हुये वो जिनको वादा चाहिये

 

बच तो आयें लहरों से अहले जिगर

बस उन्हें कोई किनारा चाहिये

 

तख़्त पर जिसने बिठाया उनका कर्ज़

जानो दिल से अब चुकाना चाहिये

 

आप भी हँस लीजिये इस बात पर

झूठे को अब काम सच्चा…

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Added by शिज्जु "शकूर" on June 17, 2014 at 9:59pm — 23 Comments

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ

तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ

बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी

राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

तुम्हारे वाद-ए-फ़र्दा पर ..यकीं करूँ कैसे

हर दीद में इक तिश्नगी ..अजीब पाता हूँ

कूए कातिल से गुजरना ..आदत है मेरी

अपने ज़ख्मों में .अपना अज़ीज़ पाता हूँ

रूए-ज़ेबा को भला ज़हन से भुलाऊँ कैसे

बिन तुम्हारे तो मैं खुद को गरीब पाता…

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Added by Sushil Sarna on June 17, 2014 at 4:30pm — 20 Comments

किताबें कहती हैं/गज़ल/कल्पना रामानी

मात्रिक छंद

हमसे रखो न खार, किताबें कहती हैं।

हम भी चाहें प्यार, किताबें कहती हैं।



 घर के अंदर एक हमारा भी घर हो।  

भव्य भाव संसार, किताबें कहती हैं।



 बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,  

हँसकर  हर किरदार, किताबें कहती हैं।



 खरीदकर ही साथ सहेजो, जीवन भर,

लेना नहीं उधार, किताबें कहती हैं।



 धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,

रखो स्वच्छ आगार, किताबें कहती हैं।



 कभी न भूलो जो संदेश…

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Added by कल्पना रामानी on June 17, 2014 at 2:30pm — 22 Comments

दौर...(लघु-कथा)

“ आज का मैच तो बड़ा रोमांचक है यार, बड़े जबर्दस्त फार्म में  है टीम...”

“अरे हाँ यार!   तेरे घर  तो मैच देखने का आनंद ही अलग है, पर यार ये अन्दर से कराहने की आवाज तेरी मम्मी की आ रही है क्या..?”

“ आने दे यार!  वो तो उनकी रोज की आदत है, बूढी जो हो गई है थोड़ी देर में सो जाएँगी. तू तो मैच देख  मैच”

 

              जितेन्द्र ’गीत’

      ( मौलिक व् अप्रकाशित )

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on June 17, 2014 at 12:35pm — 36 Comments

साथ जीने की सज़ा

चाहतों ने गुलज़मीं पे चाँदनी जब छा दिया

आहटों ने बढ़ तराना प्यार का तब गा दिया |

 

हाथ क़ैदी की तरह सहमे हुए थे क़ैद में

क़ैदख़ाने में किसी ने दिल थमा बहका दिया |

 

पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी

हौसले ने वक़्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया |

 

होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े

फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया |…

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Added by Santlal Karun on June 16, 2014 at 9:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

 २२  २२ २२  २

शायद सूरज हार गया

छुप के दरिया पार गया

शाह हुए गुम हरमों में

कड़ी खिंचा बेकार गया

चुनाव आये फिर से तो

संसद गुनाहगार गया

कपडा जब हुआ…

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Added by gumnaam pithoragarhi on June 16, 2014 at 5:03pm — 5 Comments

बनाया था महल मैनें गजल

1222 1222 1222 122

हमारे प्‍यार को वो अब निभाती भी नहीं है

जलाये क्‍यों हमारा दिल बताती भी नहीं है

लिखा जो गीत उसने वेवफाई पे हमारी

कभी वह गीत हमको तो सुनाती भी नहीं है

बनाया था महल मैनें कभी उनके लिये जो

पड़ा है आज भी सूना जलाती भी नहीं है

बड़े अरमान थे उनसे सजाये जिन्‍दगी में

मगर उनको कभी अब वो सजाती भी नहीं है

करें किससे शिकायत जिन्‍दगी की हम बताओ

कभी भी प्‍यार से मुझको बुलाती भी नहीं है

मौलिक व अप्रकाशित अखंड…

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Added by Akhand Gahmari on June 16, 2014 at 2:09pm — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उड़ेगा कहाँ तक परों पे लिखा क्या ?(ग़ज़ल 'राज')

122  122 122 122

मनाज़िर नए हैं, सवेरा नया क्या ?

वतन पूछता है, अँधेरा हटा क्या ?

 

नई  खुशबुएँ  हैं नई सुब्ह महकी

सदी से बुझा था जो चूल्हा जला क्या ?

 

परिंदा नया है नए पंख निकले

उड़ेगा कहाँ तक परों पे लिखा क्या ?

 

सभी कह रहे हैं शजर विष भरा है

तुम्ही ये बताओ बिना जड़ उगा क्या ?

 

वहीँ  आग होगी  धुआँ है  जहाँ पर

हवा है गली में नया गुल खिला क्या ?

 

 

वो बुधवा की बेवा नहीं दी…

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Added by rajesh kumari on June 16, 2014 at 9:28am — 22 Comments

महज पाना किसी को भी मुहब्बत तो नहीं होती - ग़ज़ल

*******

1222 1222 1222 1222

*******

हुआ    जाता    नहीं   बच्चा   कभी   यारो   मचलने   से

नहीं    सूरत    बदलती   है   कभी   दरपन   बदलने   से

***

जला  ले  खुद  को  दीपक  सा  उजाला   हो   ही  जायेगा

मना   करने   लगे   तुझको  अगर  सूरज  निकलने  से

***

हमारी   सादगी   है   ये   भरोसा   फिर   जो   करते   हैं

कभी  तो  बाज  आजा  तू  सियासत  हमको  छलने  से

***

बता  बदनाम  करता  क्यों  पतित  है  बोल अब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 16, 2014 at 9:26am — 14 Comments

बाल मज़दूरी -हमारी मज़बूरी .

”बचपन आज देखो किस कदर है खो रहा खुद को ,

उठे न बोझ खुद का भी उठाये रोड़ी ,सीमेंट को .”

........................................................................

”लोहा ,प्लास्टिक ,रद्दी आकर बेच लो हमको ,

हमारे देश के सपने कबाड़ी कहते हैं खुद को .”

.......................................................................

”खड़े हैं सुनते आवाज़ें ,कहें जो मालिक ले आएं ,

दुकानों पर इन्हीं हाथों ने थामा बढ़के ग्राहक को .”…

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Added by shalini kaushik on June 15, 2014 at 11:30pm — 3 Comments

बेटियाँ

पिता

गर बेटियाँ है  तुम्हारा  स्वाभिमान

फिर क्यों

समाज के  विद्रूपताओं से  भयभीत होकर

रोकते  हो  उसकी हर  उड़ान

बनाने क्यों नहीं देते  उसकी

स्वयं की साहसी  पहचान

असुरक्षा के  डर से

देना  चाहते  हो उसको

किसी का साथ

खर्च  कर लाखोँ  लाते हो

छान बिन कर एक जोड़ी  अदद हाथ

जो  बनेगा  तुम्हारी बेटी का आजीवन रक्षक

पर क्या  होता  है सही ये फैसला

हर बार

वक्त के साथ देख  बेटियों की  दुर्दशा

क्या…

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Added by MAHIMA SHREE on June 15, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

वेदना -निग्रही

माँ
मान भरे ममता का आँचल
तो पिता
सर पर नीलाभ आसमान है
दोनों का स्नेह एक सामान है.
माँ
बच्चों के दर्द से बिलबिला जाती है
तो पिता की चिंता
दर्द की दवा बन जाती है.
माँ कोमलता से भरी है
तो पिता के परुष से
विपत्तियाँ भी डरी है.
बच्चों के लिए
दोनों का स्नेह ही
वेदना -निग्रही है.

डॉ.विजय प्रकाश शर्मा
(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 15, 2014 at 12:05pm — 10 Comments

जिंदगी तू भी अजीब है -- डॉo विजय शंकर

जिंदगी भी अजीब है

जब भी उदास होती है ,

बेहद पास होती है |

खुश होती है तो ,

हमीं से दूर होती है ||

खुश हो तो लापरवाह इतनी

कि खुद हमसे नहीं सम्हलती ,

उदास होती है तो हमें ही

नहीं संभाल पाती है ||

जिंदगी अपनी होते हुये भी

क्यों अंजानी सी लगती है

दूसरे की जिंदगी क्यों अच्छी ,

जानी पहचानी सी लगती है ||

साथ बैठें तेरे कभी आ

कुछ बात करें, तुझी से

आ जिंदगी तुझको

थोड़ा देंखें करीब से |

इक हम हैं जो जीते हैं

सिर्फ… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 15, 2014 at 11:57am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरा ग़म लगता है हमसाया मुझे

2122/ 2122/ 212

मेरा ग़म लगता है हमसाया मुझे

जीने का फन ग़म ने सिखलाया मुझे

 

ये हवा मेरे मुताबिक तो नहीं

कौन तेरे शह्र में लाया मुझे

 

मुश्किलों में सिर्फ मेरी जाँ नहीं

खौफ़ में हर इक नज़र आया मुझे

 

हौसला, हिम्मत, दुआएँ, दोस्ती

तज़्रिबे ने बख़्शा सरमाया मुझे

 

धूप की शिद्दत बहुत थी राह में

माँ के आँचल से मिली छाया मुझे

 

कौन सा मैं रंग दूँ तुझको ग़ज़ल

ज़ीस्त के रंगों ने…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on June 15, 2014 at 8:00am — 6 Comments

खोने नही़ं देती

1222   1222  1222   1222



किसी की याद रातो मे हमें सोने नहीं देती

कसम उसने दिया था जो हमे रोने नहीं देती



चली थी साथ मेरे जो कभी इक हमसफर बन कर

न जाने पास अपने क्‍यों हमें होने नहीं देती



सिखाया था हमें जिसने जमाने में रहें कैसे

वही अब प्‍यार भी हमको वहाँ बोने नहीं देती



नहीं है प्‍यार मुझसे अब मगर नफरत जरा देखो

किसी को लाश भी मेरी वो अब ढोने नहीं देती



हमारे गीत में छुपकर हमेशा जो चली आती

बने आवाज दिल की वो हमें खोने…

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Added by Akhand Gahmari on June 15, 2014 at 1:30am — 5 Comments

छपास

जब से "छपास" का

रोग लगा है.

लिखना रुकता ही नहीं ,

कविता अतुकांत,

कहानी अनगढ़ी ,

बिना यात्रा किये

यात्रा वृतांत,

बिना मिले

विरह वर्णन,

बिना प्यार किये,

रोमांच का सच.

वृद्ध हाथों में

क्रांति की मशाल,

बिना सच जाने

चेतावनी!

क्या मजाल,

कि आप कुछ बोल दें.

जरा सा सच का पर्दा खोल दें

चैनलों पर रात-दिन देखिए,

 पूरे देश में,

"नपुंसक बवाल".

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा

(मौलिक व् अप्रकाशित…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 15, 2014 at 12:30am — 14 Comments

वफादारी (लघुकथा) रवि प्रभाकर

मालिक और महा प्रबंधक कंपनी में चल रही हड़ताल को लेकर कुछ गंभीर विचार विमर्श कर रहे थे कि अचानक कुछ आवारा कुत्ते बंगले के अंदर आ घुसे। साहिब का खूंखार पालतू कुत्ता बड़ी फुर्ती से उन आवारा कुत्तों पर झपटा और उन्हें दूर तक खदेड़ आया, तभी एक नौकर धीरे से मालिक के कान में आकर फुसफुसाया

“साहिब,  वो यूनीयन के दूसरी तरफ वाले लीडर आ गए है।”

मालिक के तनावग्रस्त चेहरे पर एकाएक कुटिल मुस्कुराहट आ गई, और उसने मांस का एक बड़ा सा टुकड़ा अपने वफादार कुत्ते के आगे फैंक दिया…

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Added by Ravi Prabhakar on June 14, 2014 at 11:59am — 14 Comments

एक लघु वार्ता --- डॉ ० विजय शंकर

प्रिय मित्रों ,

मैं इस सम्मानित मंच के माध्यम से आप सभी से कुछ बातें शेयर करना चाहता हूँ , आज लाइव महोत्सव का जो विषय है, ये बातें कहीं न कहीं उस से जुडी हुई हैं . थोड़ा देखें दुनिया में और लोगों का नज़रिया उन बातों पर जो हम सभी को घेरे रहती हैं . गत तीन-चार वर्षों से वर्ष में कुछ समय मेरा अमेरिका में रहना होता है , इस प्रवास में बहुत कुछ देखने को मिलता है। कुछ इत्मीनान से , कुछ सोच समझ के साथ। जैसे , स्वतंत्रता की देवी ( statue of liberty ) की मूर्ति वाले इस विशाल देश में लोग वास्तव में… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 14, 2014 at 10:44am — 18 Comments

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