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प्रणय को आकार दिया ....

दृग

शृंगार करते रहे

आंसुओं से

तृषित मन

आस की मरीचिका में

भटकता रहा

व्यथा

दूर तक फ़ैली नदी में

वायु वेग को सहती

बिन पाल की नाव सी

किसी किनारे की तलाश में

व्यथित रही

दृष्टि स्पर्श

प्रणय अस्तित्व को

नागपाश सा

स्वयंम में लपेटे रहा

अंतर्कथा के मौन पृष्ठों में

जीवन के इक मोड़ की त्रासदी

स्मृति सीप में

कराहती रही

कदम

धूप की तपन को

मन के अंतर्नाद में डूबे 

एक क्षितिज की तलाश में…

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Added by Sushil Sarna on October 21, 2015 at 5:43pm — 12 Comments

खास रिश्ते का स्वप्न / लघुकथा

" ये क्या सुना मैने , तुम शादी तोड़ रही हो ? "

" सही सुना तुमने । मैने सोचा था कि ये शादी मुझे खुशी देगी । "

" हाँ ,देनी ही चाहिए थी ,तुमने घरवालों के मर्ज़ी के खिलाफ़ , अपने पसंद से जो की थी ! "

" उन दिनों हम एक दुसरे के लिए खास थे , लेकिन आज ....! "

" उन दिनों से ... ! , क्या मतलब है तुम्हारा , और आज क्या है ? "

" उनका सॉफ्स्टिकेटिड न होना ,  अर्थिनेस और सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत खलता है।  आज हम दोनों एक दुसरे के लिये बेहद आम है । "

" ऐसा क्यों ? "…

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Added by kanta roy on October 21, 2015 at 4:00pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
धूप की तकसीम में कुछ तो हुआ है देखना-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122---2122---2122---212

धूप की तकसीम में कुछ तो हुआ है देखना

आज फिर सूरज सवालों में घिरा है देखना

 

नीम के ये जर्द पत्ते आंसुओं-से झर गए

इस फिज़ा की आँख में कंकड़…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 21, 2015 at 3:03pm — 9 Comments

लघुकथा - अनाथ

लघुकथा- अनाथ

पत्नी की रोजरोज की चिकचिक से परेशान हो कर महेश पिताजी को अनाथालय में छोड़ दरवाजे से बाहर तो आ गया, मगर मन नहीं माना. कहीं पिताजी का मन यहाँ लगेगा कि नहीं. यह जानने के लिए वह वापस अनाथालय में गया तो देखा कि पिताजी प्रबंधक से घुलमिल कर बातें कर रहे थे. जैसे वे बरसों से एकदूसरे को जानते हैं.

पिताजी के कमरे में जाते ही महेश ने पूछा, “ आप इन्हें जानते हैं ?” तो प्रबंधक ने कहा, “ जी मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ. वे पिछले ३५ साल से अनाथालय को दान दे रहे हैं . दूसरा बात…

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Added by Omprakash Kshatriya on October 21, 2015 at 3:00pm — 19 Comments

~बोल ~

तुम्हारें श्री मुख से

दो शब्द

निकले कि

मैंने कैद कर लिया

अपने हृदय उपवन में !!



अब हर रोज

दिल से निकाल

दिमाग तक लाऊँगी

फिर कंठ तक

फिर मुस्कराऊँगी

चेहरे पर

एक अलग सी

चमक बिखर जाएँगी

बार बार यही

दुहराती रहूंगी

क्योकि

अच्छी यादों को

बार-बार खाद-पानी

चाहिए ही होता है!!



और तब जाके

एक दिन

तैर जायेंगी

सरसराहट …

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Added by savitamishra on October 21, 2015 at 12:06pm — 6 Comments

चलते रहना रुकना मत।

चलते रहना रुकना मत।

पथ चाहे हो पथरीला ,

पर्वत हो चाहे टीला ,

सघन समूचा जंगल हो ,

गूढ़ समुंदर हो नीला ,

वीरों सा बढ़ते रहना।

झुकना मत।

चपला चमके आँधी आये,

घनघोर घटा नभ छा जाये,

हो काली रात अंधेरी भी,

सागर में धरा समा जाये,

दीपक सा जलते रहना ,

बुझना मत ।

बन सजग देश के प्रहरी तुम,

रख लक्ष्य साधना गहरी तुम,

नील गगन में चमक उठो,

बनकर चमक सुनहरी तुम,

निज सपनों को…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 21, 2015 at 11:22am — 4 Comments

नव दुर्गा की शान....

कुंडलिया

 

आश्विन मासे प्रतिपदा, शुक्ल पक्ष संज्ञान.

शारदीय नवरात्रि यह, नव दुर्गा की शान.

नव दुर्गा की शान, ध्यान नौ दिन तक चलते.

भक्ति सहित उपवास, शक्ति संयम यश फलते.

कन्या पूजन दान, पाप को क्ष्ररते निशदिन.

करे सत्य उत्थान, योग का स्वामी आश्विन.

 

के0पी0 सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 21, 2015 at 9:00am — 6 Comments

ज़मीर – ( लघुकथा ) -

  ज़मीर – ( लघुकथा ) -

गोपाल ने जैसे ही मेट्रो से बाहर निकलकर मोबाइल के लिये जेब में हाथ डाला!मोबाइल गायब था!उसके हाथ पैर फ़ूल गये!उसका सब कुछ ही मोबाइल में था!उसने क्या करना है ,कहां जाना है , उसके सारे कागज़ात की प्रतियां सब मोबाइल में ही थी!उसे कुछ नहीं सूझ रहा था!

तभी सामने उसे पी.सी.ओ. दिखा!उसने तुरंत अपना मोबाइल नंबर मिलाया!दूसरी ओर से आवाज़ आयी,हैलो, "आप कौन"!

"आप कौन हो भाई "!

"कमाल है भाई, फ़ोन आपने मिलाया है तो आप बताओ ना कि आप कौन हो"!

"देखो भाई, आप…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 20, 2015 at 1:22pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बंदगी जिनका सफीना था--(ग़ज़ल)-- मिथिलेश वामनकर

2122-- 1122 --1122 –112

 

बंदगी जिनका सफीना था, वही पार गए

नाखुदाओं पे भरोसा जो किया, हार गए

 

अम्न के वास्ते इस पार से उस पार गए…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 20, 2015 at 1:32am — 13 Comments

फूल चोर

"फूल चोर"



मंदिर में वर्मा जी की थाली में अपने बागीचे के विदेशी फूल देखकर वृंदा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे पूजा की थाली हाथ में पकडे मूर्ति के सामने खड़े हुए थे, जिसे देखकर वृंदा के चेहरे पर अविश्वास और क्रोध के मिश्रित भाव उभर आए।



दरअसल बचपन से ही वृंदा को जूनून की हद तक बागवानी का बेहद शौक था। तरह तरह से रंग सजावटी पौधों, हरी भरी घास, रंग बिरंगे फूलों तथा विभिन्न प्रकार के बेल बूटों से भरा बगीचा पूरी कॉलोनी में चर्चा का विषय बन चुका था। जो भी देखता, बगीचे और वृंदा की… Continue

Added by Nita Kasar on October 19, 2015 at 5:04pm — 25 Comments

सच्चा आनंद – (लघुकथा ) -

  सच्चा आनंद – (लघुकथा ) -

 "शुक्ला जी,सुना है आप पूरे नव रात्र छुट्टी पर हो"!

"सही सुना है आपने गौतम जी"!

"ऐसा क्या कठोर  व्रत पूजा पाठ   कर रहे हो कि पूरे नौ दिन की छुट्टी ले ली, व्रत उपवास तो हम भी करते हैं,पर छुट्टी खराब करके नहीं"!

"कुछ ऐसा ही  व्रत कर रहा हूं इस बार "!

"कुछ विस्तार से बताओगे"!

"गौतम जी अपने कार्यालय के पीछे जो कुष्ठ रुग्णालय है, उसमें दस कुष्ठ रोगी हैं!मैं पूरे नव रात्र उस रुग्णालय में अपनी सेवायें दे रहा हूं!प्रातः सात बजे से…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 19, 2015 at 3:45pm — 10 Comments

मेरी कुछ हाइकू रचनाएँ [हाइकू] (2)/ _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

(1)
छंद रच ले
छंद का समारोह
काव्य आरोह।

(2)
मन पसंद
लिख ले कुछ छंद
बिना पैबंद।

(3)

छंद में बंद
भावनायें पसंद
विधान द्वंद।

(4)
छन-छन के
निकलते ये छंद
उत्कृष्ट चंद।

(5)
छंद सुनाओ
सत्य हमें बताओ
चेतना लाओ।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2015 at 10:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जरा सा पास आकर देख तो लो----(ग़ज़ल)---मिथिलेश वामनकर

1222---1222---122

 

जरा सा पास आकर देख तो लो

कभी पलकें उठाकर देख तो लो

 

अगरचे तिश्नकामी गम बहुत है

उसे आँसू…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 2:08am — 18 Comments

तो बेहतर था

1222 1222 1222 1222



तेरे नैनों के पर्दे को उठा लेती तो बेहतर था।

निगाहों को मेरे मुख पर टिका देती तो बेहतर था।।



हाँ बेहतर तो यही होता कि तुझमें खो ही जाता मैं।

औ तुम भी मेरी आँखों में समा जाती तो बेहतर था।।



न खाली हो सके तुम भी बहुत मशरूफ थे हम भी।

घड़ी कोई हमें तुमसे मिला देती तो बेहतर था।।



पता है, मेरे इस दिल में कई सपने सुहाने थे।

तू अपने ख़्वाब सारे जो बता देती तो बेहतर था।।



यहाँ खोने का डर था तो वहाँ संकोच का…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 18, 2015 at 11:00pm — 12 Comments

स्वेटर (लघुकथा)

जनवरी की हड्डी कंपा देने वाली ठंड..मैं ऊपर से नीचे तक गर्म कपड़ों के बावजूद कांप रही थी ।कक्षा में पहुंच कर एक नजर, मेरे सम्मान में खड़े सभी बच्चों पर डाली और बैठने का इशारा किया । तभी मेरी नजर उन बच्चों पर पड़ी जिनके बदन पर कपड़ों के नाम पर बस कपड़ों का नाम था।मैंने उन सभी बच्चों को खड़ा कर दिया ।

"क्यों!स्वेटर कहां है तुम्हारे?स्कूल से स्वेटर के लिये पैसा मिला ना तुम लोगों को फिर..?"लहजा सख्त था । बच्चे सहम गये ।फिर सामने जो कहानी आई बेशक अलग-अलग थी लेकिन नतीजा एक,कि उनके अभिभावक सारा…

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Added by Rahila on October 18, 2015 at 9:30pm — 39 Comments

"गुम्मन चाय वाला" - (लघु कथा) (20)

"चच्चा, लो पियो जे कड़क चाय, लेकिन मेरी कविता ज़रूर पढ़कर जाना" - गुम्मन ने बड़े उत्साह से कहा।

थोड़ी देर बाद वहीद चच्चा बोले- "ओय गुम्मन, तू तो बड़ी अच्छी कविता लिख लेता है, आज पता चली तेरी काबीलियत और तेरा 'असली' नाम।"

"हाँ चच्चा, छुटपन में एक बार ठण्ड के साथ तेज़ बुख़ार होने पे बिना किसी को बताये टेबल पे रखी रजाई की तह में छिपकर सो गया था। घरवाले घण्टों ढूंढते रहे। जब मिला तो "गुम" कहके चिढ़ाने, बुलाने लगे। इस चाय की दुकान पे सब "गुम्मन" कहने लगे। स्कूल छूटा तो असली नाम भी गुम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2015 at 8:30pm — 7 Comments

असहज अनियंत्रित- डा0 गोपल नारायन श्रीवास्तव

आज भी कभी

जब उधर से गुजरता हूँ

उतर जाता हूँ

उस खास स्टेशन पर

टहलता हूँ देर तक

लम्बे प्लेटफार्म पर

बेसुध आत्मलीन

 

फिर चढ़ जाता हूँ रेलवे पुल पर

तलाशता हूँ वह् रेलिंग

वह ख़ास जगह

टटोलकर देखता हूँ 

शायद वही जगह है

स्तब्ध हो जाता हूँ

लगता है कोई

सोंधी महक

सहसा उठी और

सिर से गुजर गई

 

नीचे आता हूँ

फिर पुल के नीचे

पुल के आधार…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 18, 2015 at 7:56pm — 5 Comments

शाकाहारी

“और भाईजान कैसे है...सब खैरियत तो हैं न?” चिकन शॉप में काम करने वाले प्रकाश के मित्र जावेद ने शिष्टाचार के तहत पूँछा ।

“बस, रहम हैं ऊपर वाले का..और तुम्हारी कैसी गुजर रहीं है, बड़े दिन बाद आना हुआ ईधर ।” प्रकाश ने कहा ।

“बस, काम के सिलसिले में दिल्ली गया था कल ही तो लौटा हूँ...सोचा प्रकाश भाई कि शॉप से चिकन लेता आऊँ वैसे भी बड़े दिन हो गये तुम्हारे दुकान का चिकन खाए हुए ।” जावेद ने जवाब देते हुए कहा ।

“हाँ...हाँ, क्यों नहीं ।” प्रकाश ने कहा ।

“अरे! यार प्रकाश तुम…

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Added by DIGVIJAY on October 18, 2015 at 7:13pm — 6 Comments

जिगर से पूछकर देखो,नज़र से पूछकर देखो (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



मज़ा क्या है सफ़र का,हमसफ़र से पूछकर देखो

है मंज़िल दूर कितनी,ये डगर से पूछकर देखो

-

सुनाएँगी दरो-दीवार,खिड़की रोज़ ही तुमको

कहानी अपने पुरखों की तो घर से पूछकर देखो

-

बिताई जिस के साये में थी तुमने धूप जीवन की

कि अब तो हाल उस बूढ़े शजर से पूछकर देखो

-

पता चल जाएगा, किसने फ़िज़ा में है ज़हर घोला

हवाओं से,ये बू आती किधर से..पूछकर देखो

-

वफ़ा के ज़ख्म कितने हैं,बहे कितने मेरे आँसू

जिगर से पूछकर… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 5:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -तेरी सुहबत में ऐ पत्थर, पिघलना छोड़ देंगे क्या - ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222        1222      1222  

बहलने की जिन्हें आदत, बहलना छोड़ देंगे क्या

तेरे वादों की गलियों में, टहलना छोड़ देंगे क्या

 

तू आँखें लाल कर सूरज, ये हक़ तेरा अगर है तो  

तेरी गर्मी से डर, बाहर निकलना छोड़ देंगे क्या

 

कहो आकाश से जा कर, ज़रा सा और ऊपर हो

हमारा कद है ऊँचा तो , उछलना छोड़ देंगे क्या

 

दिया जज़्बा ख़ुदा ने जब कभी तो ज़ोर मारेगा

तेरी सुहबत में ऐ पत्थर, पिघलना छोड़ देंगे क्या  

 

ये सूरज चाँद…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 18, 2015 at 10:44am — 16 Comments

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