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जिगर से पूछकर देखो,नज़र से पूछकर देखो (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222

मज़ा क्या है सफ़र का,हमसफ़र से पूछकर देखो
है मंज़िल दूर कितनी,ये डगर से पूछकर देखो
-
सुनाएँगी दरो-दीवार,खिड़की रोज़ ही तुमको
कहानी अपने पुरखों की तो घर से पूछकर देखो
-
बिताई जिस के साये में थी तुमने धूप जीवन की
कि अब तो हाल उस बूढ़े शजर से पूछकर देखो
-
पता चल जाएगा, किसने फ़िज़ा में है ज़हर घोला
हवाओं से,ये बू आती किधर से..पूछकर देखो
-
वफ़ा के ज़ख्म कितने हैं,बहे कितने मेरे आँसू
जिगर से पूछकर देखो,नज़र से पूछकर देखो
(मौलिक व अप्रकाशित)
~
~

जयनित कुमार मेहता "जय"
अररिया,बिहार

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Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 12, 2016 at 6:43am
आप सभी आदरणीय सदस्यों की उपस्थिति के लिए आभारी हूँ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 1:48pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है जयनित साहब, दाद कुबूल कीजिए।

Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 6:56am
वफ़ा के ज़ख्म कितने हैं,बहे कितने मेरे आँसू
जिगर से पूछकर देखो,नज़र से पूछकर देखो..... वाह !!! जिगर से पूछकर देखो । बधाई हो
Comment by Ravi Shukla on October 21, 2015 at 12:52pm

आदरणीय जयनित जी सुन्‍दर ग़ज़ल के लिये शेर दर शेर दाद कुबूल करें  आदरणीय गिरिराज जी की सलाह से मुफाईलुन अरकान का प्रवाह और भी सुरीला हो रहा है पढ के देखियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:39pm

आदरणीय जयनित भाई , लाजवाब गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ।

हवाओं से,ये बू आती किधर से..पूछकर देखो
- इसे - ऐसा पढ के भी देख लीजियेगा , अगर सही लगे तो ।
हवाओं में ये बू आयी किधर से..पूछकर देखो
-


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 7:18pm

आदरणीय जयनित भाई जी बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद हाज़िर है. सादर 

Comment by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 7:22pm
सादर धन्यवाद, जयप्रकाश जी..
Comment by Jayprakash Mishra on October 18, 2015 at 6:45pm
Behatareen gazal ke liye badhaai priya Jayanti ji
Comment by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 6:38pm
आदरणीय पंकज मिश्र जी, आपके स्नेह के लिए आभार प्रकट करता हूँ..

आपके सलाह पर त्रुटि वाले शे'अर को सही करता हूँ..
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 18, 2015 at 6:14pm
बढ़िया ग़ज़ल की बधाइयाँ।

दूसरे शेर में; सुनायेंगी की जगह सुनाएगी कर दीजिये; क्योंकि आगे आपने हर इक लिखा है, इस लिए एकवचन हो रहा।

या फिर उसे यूँ कर दें-
सुनायेंगी दरो दीवार खिड़की रोज़ ही तुमको।

बहुत खूबसूरत शेर-
पता चल जाएगा, किसने फ़िज़ा में है ज़हर घोला
हवाओं से,ये बू आती किधर से..पूछकर देखो

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