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चलते रहना रुकना मत।

चलते रहना रुकना मत।

पथ चाहे हो पथरीला ,

पर्वत हो चाहे टीला ,

सघन समूचा जंगल हो ,

गूढ़ समुंदर हो नीला ,

वीरों सा बढ़ते रहना।

झुकना मत।

चपला चमके आँधी आये,

घनघोर घटा नभ छा जाये,

हो काली रात अंधेरी भी,

सागर में धरा समा जाये,

दीपक सा जलते रहना ,

बुझना मत ।

बन सजग देश के प्रहरी तुम,

रख लक्ष्य साधना गहरी तुम,

नील गगन में चमक उठो,

बनकर चमक सुनहरी तुम,

निज सपनों को गढ़ते रहना,

रुकना मत।

अजय शर्मा " अज्ञात "

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Kumar Sharma on October 22, 2015 at 1:15pm

आप समस्त आदरणीय कवियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 22, 2015 at 9:02am

आदरणीय अजय जी, सकरात्मक ऊर्जा से लबरेज सुन्दर रचना हुई है, बहुत बहुत बधाई इस अभिव्यक्ति पर.

Comment by kanta roy on October 21, 2015 at 11:44pm

चलते रहना रुकना मत।
पथ चाहे हो पथरीला ,
पर्वत हो चाहे टीला ,
सघन समूचा जंगल हो ,
गूढ़ समुंदर हो नीला ,
वीरों सा बढ़ते रहना।---- आत्मबल को सम्बल देती हुई ये रचना बहुत ही सार्थक बानी है। बधाई आपको आदरणीय अजय कुमार जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 21, 2015 at 3:49pm

आदरणीय अजय जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति हुई है. इस प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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