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ग़ज़ल : आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२ 

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 12, 2012 at 2:21pm — 33 Comments

यूं ही खामोश रहो ...

जब कभी मेरी बात चले 

ख़्वाब में भी कोई ज़िक्र चले 

मेरे हमदम मेरे हमराज़ 

यूं ही खामोश रहो 

शायद ही कभी 

ठिठुरते हुए बिस्तर पे 

कभी चांदनी बरसे 

या फिर झील के ठहरे हुए पानी में 

कभी लहरे मचले 

जब कभी आँखों के समंदर में 

कोई चाँद उतरे 

मेरे हमदम मेरे हमराज 

यूं ही खामोश रहो…

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Added by Gul Sarika Thakur on November 2, 2012 at 10:05pm — 9 Comments

वाह -वाह क्या बात है !

काव्यगोष्ठी , परिचर्चा

कभी किसी विषय का विमोचन ,

आये दिन होते रहते

कविता पाठ के मंचन .

बाज़ न आते आदत से

ये कवियों की जो जात है .

वाह -वाह क्या बात है !

वाह -वाह क्या बात है !



इन्हें आदत है बोलने की

ये बोलते जायेंगे ,

हमारा क्या है , हम भी

सुनेंगे , ताली बजायेंगे .

पल्ले पड़े न पड़े , कोई फर्क नहीं

बस ढiक का तीन पात है .

वाह -वाह क्या बात है !

वाह -वाह क्या बात है !



ये निठल्ले , निकम्मे कवि

बे बात के ही पड़ते…

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Added by praveen singh "sagar" on November 3, 2012 at 2:00pm — 7 Comments

मुक्तछंद कविता सम जीवन...

मुक्तछंद कविता सम जीवन,

तुकबंदी की बात कहाँ है ||

लय, रस, भाव, शिल्प संग प्रीति |

वैचारिक सुप्रवाह की रीति ||

अलंकार से कथ्य चमकता |

उपमानों से शब्द दमकता ||

यगण-तगण जैसे पाशों से,

होता कोई साथ कहाँ है |

मुक्तछंद कविता सम जीवन,

तुकबंदी की बात कहाँ है ||

अनियमित औ स्वच्छंद गति है |

भावानुसार प्रयुक्त यति है ||

अभिव्यक्ति ही प्रधान विषय है |

तनिक नहीं इसमें संशय है ||

ह्रदयचेतना से सिंचित ये,

ऐसा यातायात कहाँ है |

मुक्तछंद…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2012 at 8:38am — 12 Comments

"विरह गीत" - लतीफ़ ख़ान, दल्लीराजहरा.

विरहन का क्या गीत अरे मन |

प्रियतम प्रियतम, साजन साजन ||



जब से हुए पी आँख से ओझल,

प्राण है व्याकुल साँस है बोझल,

किस विध हो अब पी के दर्शन || विरहन का...



प्रीत है झूटी सम्बन्ध झूटा,

सौगंध झूटी अनुबन्ध झूटा,

मिथ्या मन का हर गठबन्धन || विरहन का...



जब दर्पण में रूप सँवारूँ,

अपनी छवि में पी को निहारूँ,

मेरी व्यथा से अनभिज्ञ दर्पण || विरहन का...



दुख विरहन का किस ने जाना,

अपने भी अब मारें…

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Added by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 1:30pm — 5 Comments

सीते मुझे साकेत विस्मृत क्यों नहीं होता !

सीते मुझे साकेत विस्मृत क्यों नहीं होता !

सीते मुझे साकेत विस्मृत क्यों नहीं होता !

क्षण क्षण ह्रदय उसके लिए है क्यों मेरा रोता !
 
बिन तात के अनाथ हो गया मेरा साकेत ,
अब कौन सुख की नींद होगा वहां सोता…
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Added by shikha kaushik on October 29, 2012 at 10:30pm — 6 Comments

दुर्मिल सवैया छंद

नहि भेद लिखे कछु वेद कवी सब गाल बजावत मंचहि पे
निज वेशहि की परवाह करें बस ध्यान धरें धन संचहि पे
अब ब्रम्ह बने सूतहि जब है सब ज्ञान बखान विरंचहि पे
कलि कौतुक देख हसे सुर है गुरु बैठत है अब बेंचहि पे

कलिकाल धरा विकराल बढ़ा सुत मातु पिता नहि मानत है
धन की महिमा सब ओर सखे धनही सबका पहिचानत है
घर की नहि नारिहि मान करे ललचाय पराय अमानत है
सनदोह सहोदर मोह नही अब दारहि का सब जानत है


चिदानन्द शुक्ल "सनदोह"

Added by Chidanand Shukla on October 21, 2012 at 9:00pm — 16 Comments

अर्थ रह गए गलियारों में शब्द बिक रहे बाजारों में

अर्थ रह गए गलियारों में शब्द बिक रहे बाजारों में

रचनाओं के सृजन कर्ता भटक रहे हैं अंधियारों में ।।

केवट भी तो तारक ही था जिसने तारा तारन हारा

कलयुग में ये दोनों अटके विषयों के मझधारों में ।।

कृष्ण नीति की पुस्तक गीता सच्चाई को तरसे देखो

हर धर्म धार दे रहा बेहिचक आतंकी के औजारों  में ।।

मंदिर मस्जिद घूम रहा है धर्म नहीं है जिस पंछी का

धर्म ज्ञान को रखने वाला झुलस रहा है अंगारों में ।।

धर्मों के…

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Added by Manoj Nautiyal on October 22, 2012 at 9:58am — 5 Comments

प्रश्नवाची मन हुआ है

प्रश्नवाची 

मन हुआ है, हैं सुलगते अभिकथन 

क्या मुझे अधिकार है ये 

मैं दशानन को जलाऊँ ??



खींच कर 

रेखा अहम् की शक्त वर्तुल से घिरी हूँ 

आइना भी क्या करे जब मैं तिमिर की कोठरी हूँ 

दर्प की आपाद मस्तक स्याह चादर ओढ़ कर 

क्या मुझे अधिकार है

'दम्भी 'दशानन को बताऊँ ??



झूठ, माया-मोह 

ईर्ष्या के असुर नित रास करते 

स्वार्थ की चिंगारियों से प्रिय सभी रिश्ते सुलगते 

पुण्य पापों को बता कर सत्य पर भूरज…

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Added by seema agrawal on October 22, 2012 at 11:31am — 15 Comments

चौदह बरस वनवास काट राम बन कर देख !

चौदह बरस वनवास काट राम बन कर देख !





कैसे सहे जाते हैं होनी के लिखे लेख ?

चौदह बरस वनवास काट राम बन कर देख !



कैसे निभाते कुल की रीत ; प्रिय पिता से प्रीत ,

शांत कैसे करते हैं कैकेयी उर के क्लेश ?

चौदह बरस ....................





होना था जिस घड़ी श्री राम का अभिषेक ,

उसी घड़ी चले धर कर वो तापस वेश !

चौदह बरस ........................





कैसे चले कंटकमय पथ पर संग सिया लखन ?

काँटों की चुभन पर भरते न आह लेश… Continue

Added by shikha kaushik on October 22, 2012 at 3:32pm — 7 Comments

सीर की हवेली

 

द्रष्टव्य विशालकाय,
हर सदस्य असहाय 
एक दूजे पर भार-
साझेदार, या 
संयुक्त परिवार |
अपनेपन के आभाव में 
घावों में सिमटे 
लटकती तलवार तले,…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2012 at 6:54pm — 7 Comments

ग़ज़ल

चारागर की ख़ता नहीं कोई.

दर्दे-दिल की दवा नहीं कोई.



आप आये न मौसमे-गुल में,

इससे बढ़कर सज़ा नहीं कोई.



ग़म से भरपूर है किताबे-दिल,

ऐश का हाशिया नहीं कोई.



देख दुनिया को अच्छी नज़रों से,

सब भले हैं बुरा नहीं कोई.



सच का हामी है कौन पूछा तो,

वक़्त ने कह दिया नहीं कोई.



है सफ़र दश्ते-नाउम्मीदी का,

मौतेबर रहनुमा नहीं कोई.



अपने ही घर में हैं पराये हम,

बेग़रज़ राबता नहीं कोई.



इस…

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Added by लतीफ़ ख़ान on October 17, 2012 at 6:00pm — 8 Comments

मुट्ठी भर रेत

ये जीवन मानों -
मुट्ठी भर रेत
झरती हैं खुशियाँ
झरते हैं सपने
इक पल
 हँसना तो
दूजे पल
क्लेश
ये....................

 रेतघड़ी समय की
चलती ही रहती
लम्हों की पूंजी
हाथ से फिसलती
बस स्मृतियों के
रह जाते अवशेष
ये....................

किसी से हो मिलना
किसी से बिछड़ना
जग के मेले में
बंजारे सा फिरना
दुनिया आनी जानी -
 सत्य यह अशेष
ये .......................




Added by Vinita Shukla on October 4, 2012 at 10:31am — 8 Comments

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,

वो शहर जो हर पल मुझे,

बस याद उसकी दिलाता था,

वो शहर की जिसमें महकती थी,

बस उसी की खुशबू,

वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,

वो वही शहर था जहां रहते थे,

बस चाहने वाले उसके,

आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,

पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,

अपने इस नए शहर में भी बस,

उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,

बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,

पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,

बस शहर ही…

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Added by पियूष कुमार पंत on October 4, 2012 at 9:10pm — 4 Comments

हम हो न सकते नीलकंठ

व्योमकेश !

हम हो न

सकते नीलकंठ ....

 गरल कर

धारण स्वयम

तुमने उबारा

संसृति को 

अमिय देवों

ने पिया

झुकना पड़ा

आसुरी प्रकृति को

थम गया

तव कंठ में ही

सृष्टि का विध्वंस

हम हो न सकते ....

साक्षी थे

तुम भी तो

विकराल मंथन के

सर्प सम संतति

समूची

तुम ही चन्दन थे

विष तुम्हें डंसता नहीं

देता हमें शत दंश

व्योमकेश!

हम हो न सकते......

दृष्टि तेजोमय तुम्हारी …

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Added by Vinita Shukla on September 20, 2012 at 11:00pm — 19 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- २८

जिन्दगी थोड़ी बाकी थीकि गुज़र गई

नदी समन्दर के पास आकर मर गई

 

रात आईतो इमरोज़ किधर चला गया

दिन निकला तो लंबी रात किधर गई

 

आज यूँ अकेला हूँ मैं अपनों के बीच

इक भीड़ में मेरी तन्हाई भी घर गई

 

दरोदीवार पुतगए बरसातकी सीलनसे

अबके बरस छत की कलई उतर गई

 

जो लोग तेज थे उठा लेगए सब ईंटें

दीवार खामोश अपने कदसे उतर गई  

 

हवाओंने गिराए जो पके फल धम्मसे

इक अकेली चिड़िया शाख पे डर गई…

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Added by राज़ नवादवी on September 17, 2012 at 11:43pm — 18 Comments

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला

सौरभ जी से चर्चा के पश्चात जो परिवर्तन किये हैं उन्हें प्रस्तुत कर रही हूँ 

परिचर्चा के बिंदु सुरक्षित रह सके  इस हेतु  पूर्व की पंक्तियों को भी डिलीट नहीं किया है जिससे नयी पंक्तियाँ नीले text में हैं 

 

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला 

प्रीत के मुकुलित सुमन हो भाव मे भास्वर* मिला -----*सूर्य



हो सकल यह विश्व ही जिसके लिए परिवार सम 

नीर मे उसके नयन के स्नेह का सागर मिला …



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Added by seema agrawal on September 12, 2012 at 10:00am — 34 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे – कालजयी साहित्य

मान और सम्मान की,नहीं कलम को भूख

महक  मिटे  ना पुष्प  की , चाहे जाये सूख |

 

खानपान  जीवित  रखे , अधर रचाये पान

जहाँ  डूब कान्हा मिले , ढूँढो वह रस खान |…

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Added by अरुण कुमार निगम on September 11, 2012 at 12:00am — 14 Comments

मिलन की बात है असंभव

तुम कंचन हो,

मै कालिख हूँ!

तुम पारस, मै

कंकड़ इक हूँ!

 

तुम सरिता हो,

मै कूप रहा!

तुम रूपा, इत

ना रूप रहा!

जो मानव नहीं है उसको, देव की पांत है असंभव!

है तुलना न अपनी कोई, मिलन की बात है असंभव!

 तुम ज्वाला हो,

मै…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 11, 2012 at 2:30pm — 58 Comments

ग़ज़ल - बचा है अब यही इक रास्ता क्या

दोस्तों, ग़ज़ल पेश ए खिदमत है गौर फरमाएं ..



बचा है अब यही इक रास्ता क्या

मुझे भी भेज दोगे करबला क्या



तराजू ले के कल आया था बन्दर

तुम्हारा मस्अला हल हो गया क्या…



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Added by वीनस केसरी on September 9, 2012 at 2:30am — 13 Comments

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