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ये जीवन मानों -
मुट्ठी भर रेत
झरती हैं खुशियाँ
झरते हैं सपने
इक पल
 हँसना तो
दूजे पल
क्लेश
ये....................

 रेतघड़ी समय की
चलती ही रहती
लम्हों की पूंजी
हाथ से फिसलती
बस स्मृतियों के
रह जाते अवशेष
ये....................

किसी से हो मिलना
किसी से बिछड़ना
जग के मेले में
बंजारे सा फिरना
दुनिया आनी जानी -
 सत्य यह अशेष
ये .......................




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Comment

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Comment by Vinita Shukla on October 14, 2012 at 12:43pm

धन्यवाद आदरणीय लक्षमण प्रसाद जी.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 14, 2012 at 10:38am
जीवन के शास्वर सत्य को उजागर करती भावाभिव्यक्ति 
विशेषतः 
किसी से हो मिलना किसी से बिछड़ना 

जग के मेले में बंजारे सा फिरना 
दुनिया आनी जानी -
सत्य यह अशेष ------  बधाई विनीता शुकला जी 

Comment by Vinita Shukla on October 5, 2012 at 11:59am

बहुत बहुत धन्यवाद संदीप जी.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 5, 2012 at 9:53am

सुन्दर भाव पूर्ण रचना हेतु बधाई आपको

Comment by Vinita Shukla on October 4, 2012 at 9:15pm

हार्दिक आभार सुश्री सीमा जी.

Comment by Vinita Shukla on October 4, 2012 at 9:15pm

कोटिशः धन्यवाद डॉ. प्राची जी.

Comment by seema agrawal on October 4, 2012 at 9:09pm

अच्छी प्रस्तुति ..........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 4, 2012 at 6:02pm

सुन्दर भावाभिव्यक्ति 

कृपया ध्यान दे...

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