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द्रष्टव्य विशालकाय,
हर सदस्य असहाय 
एक दूजे पर भार-
साझेदार, या 
संयुक्त परिवार |
अपनेपन के आभाव में 
घावों में सिमटे 
लटकती तलवार तले,
विशालकाय-
संयुक्त परिवार पले |
ढके आचरण के भीतर,
सीमित परिवारों से भी 
बदतर 
हर सदस्य की छवि-
मैली,
फूकने को जहां 
सीर की 
हवेली |
 
-लक्ष्मण लडीवाला,जयपुर 

 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 30, 2012 at 9:10pm

आपके रचनाभिव्यक्ति की सराहना मिल जाने से रचना की सार्थकता की पुष्टि हो गई |

हार्दिक आभार आपका आदरणीया सीमा अग्रवाल जी 
Comment by seema agrawal on October 30, 2012 at 8:53pm

एक अच्छी व्यवस्था भी  आपसी गलतफहमियों और स्वार्थपरता  के चलते किस प्रकार अव्यवस्थित हो जाती है इसका दुःख आपकी रचना में सही प्रकार से परिलक्षित हुआ है 

बहुत सधी हुयी अभिव्यक्ति है 

 हार्दिक बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 25, 2012 at 9:06am

आदरणीय सीमा जी, हमारे यहाँ राजस्थान में सीर शब्द साझे के लिए प्रयोग में लिया जाता है |अधिकतर पुरानी हवेलियाँ जिनमे तीन-चार पीड़ियाँ गुजर गयी विभाजन और फिर उप विभाजन के फल स्वरुप ८-१० या उससे अधिक परिवारों में बटवारा हो जाता है | ऐसे में चौक, पोली(दरवाजेऔर चौक के मध्य का हिस्सा, रोस, तहारत (शौचालय) और सीडियां सबके सांझे में कॉमन होती है,जिनकी देख भाल,टूट-फूट,मरम्मत यहाँ तक सफाई तक का खर्च कॉमन होता है | ऐसे आजकल इनकी देखभाल, सार सम्भाल के लिए न कोई समय देनाचाहता है न ही खर्च करना चाहता है | इस प्रकार के बड़ी बड़ी हवेलियाँ सांझे की या सीर की हवेलियाँ कहलाती है | वैसे यह रचना मेरी एककहानी "अपनापन" (1978 में अग्रगामी (मासिक) में प्रकाशित, (प्रकशित कहानी यहाँ पोस्ट करना उचित नहीं होगा) पर आधारित है |

Comment by seema agrawal on October 24, 2012 at 10:36pm

सीर की हवेली |...मुझे इस शब्द का अर्थ बताइए आदरणीय लक्ष्मण जी जानने के बाद मैं दोबारा उपस्थित होती हूँ इस रचना पर  | कुछ तो आपकी बात ग्रहण कर सकी हूँ जो सर्वथा सत्य है  पर पूरा समझना चाहती हूँ |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 24, 2012 at 8:48pm

आदरणीय श्री गणेश जी बागी जी आपको रचना रुचिकर लगी,मेरा लिखना सार्थक हुआ, 

हार्दिक आभार स्वीकारे | साथ ही विजय दशमी की हार्दिक शुभ कामनाए

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 24, 2012 at 8:08pm

आदरणीय लडिवाला जी, यह रचना मुझे रूचि, इस अभिव्यक्ति पर बहुत बहुत बधाई और दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार हो |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 23, 2012 at 12:04pm

रचना पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई राज नवादवी जी 

कृपया ध्यान दे...

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