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ग़ज़ल - तितलियाँ आती नहीं मकरंद पाने के लिए !

ग़ज़ल - 
हमने कुछ पौधे लगाए नाम पाने के लिए ।

और जंगल काट डाले आशियाने के लिए



टंग गए हर छत हर एक मुंडेर पर पिंजरे मिया,

हसरते सब मर गयीं चिड़िया चुगाने के लिए ।


 अब खबर में खेल में और ख़्वाब में बन्दूक हैं,

 कौन आगे आएगा बचपन बचाने के लिए ।



 पर्वतों ने आदमी को घर बनाता देखकर,

 बादलों को दे दिया ठेका भगाने के लिए  ।



 क्यों करें बर्दाश्त बादल, आखिरश वो फट पड़े

 हम हदों को लांघते थे मौज पाने के लिए…
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Added by Abhinav Arun on July 23, 2013 at 9:28pm — 37 Comments

गज़ल//कल्पना रामानी//

212221222122212 

 

हक़ किसी का छीनकर, कैसे सुफल पाएँगे आप?

बीज जैसे बो रहे, वैसी फसल पाएँगे आप।

 

यूँ अगर जलते रहे, कालिख भरे मन के दिये,

बंधुवर! सच मानिए, निज अंध कल पाएँगे आप।

 

भूलकर अमृत वचन, यदि विष उगलते ही रहे,

फिर निगलने के लिए भी, घट- गरल पाएँगे आप।

 

निर्बलों की नाव गर, मझधार छोड़ी आपने,

दैव्य के इंसाफ से, बचकर न चल पाएँगे आप।

 

प्यार देकर प्यार लें, आनंद पल-पल बाँटिए,

मित्र! तय…

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Added by कल्पना रामानी on July 23, 2013 at 8:00pm — 49 Comments

चले गए तुम

अश्कों की बारिश में,

ऐसे हैं भींगे हम…..
जिंदगी पल पल अब,
हो रही है बे दम……
सांसों से भीख जैसे,

हैं माँग रहे हम……

क़िस्त-क़िस्त दे रहा,
है कर, हमपे रहम…
जब से जिंदगी से,
चले गए हो तुम…...
अब न कोई हमसफ़र,
रहा न कोई हमदम….
या ख़ुदा कर मदद,
इतना सा कर करम…

अश्कों की बारिश में………
….अभिषेक कुमार झा…
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Added by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 23, 2013 at 5:00pm — 14 Comments

सुनो ऋतुराज! – ११

सुनो ऋतुराज! – ११



ये मान मनौव्वल, झूमा-झटकी

बरजोरी, करजोरी और मुँहजोरी

तभी तक, जब तक

इस वैभवशाली ह्रदय का

एकछत्र साम्राज्य तुम्हारे नाम है

जिस दिन यह रियासत हार जाओगे

विस्थापित होकर कहाँ जाओगे?

फिर हम कहाँ और तुम कहाँ

सुनो ऋतुराज

हर नगरी की हर चौखट पर

पी की बाट जोहती सुहागिने

मुझ जैसी अभागन नही होती

खोने को सुख चैन

पाने को बेअंत रिक्त रैन

सुख की अटारी और दुख की पिटारी

अब दोनो तुम्हारे नाम…

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Added by Gul Sarika Thakur on July 23, 2013 at 3:30pm — 12 Comments

जब तुम कहते हो

तुम्हारा प्रेम -

खुद तुम्हारा ही

गढ़ा  फलसफा

सुविधाजीवी सोच से

तौला हुआ

 नुक्सान नफ़ा

जब तुम कहते हो -

प्रेम है तुम्हें

बुनते हो

मोहक भ्रमजाल

अंतस- द्वीपों में

ज्यों भित्तियां

रचते प्रवाल

 

१- मित्रों की मंडली में

वह अनर्गल सी हंसी

देह के ही व्याकरण में

उलझकर रहती फंसी

 हो न सकती

उसमें मुखरित

सहचरी या प्रेयसी

जब तुम कहते हो-

प्रेम है तुम्हें

झूठ होता है

वह…

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Added by Vinita Shukla on July 23, 2013 at 3:00pm — 12 Comments

काश : होते परिंदे

चाँद यहाँ भी ,

चाँद वहाँ  भी 
इंसान में लहू 
 यहाँ भी वहाँ भी
फिर भी क्यूँ है ?
सरहदों पर लकीरें 
लोग बने क्यों फिर रहे 
लकीर के फ़क़ीर 
क्यूँ बना डाली 
नफरतों की  दीवार 
कुछ वक्त पहले तक 
थे दोनों एक 
मुल्क एक दुःख एक 
राज एक सुख एक 
थे एक ही जगह के वाशिंदे 
काश  हम इंसान भी होते परिंदे 
जो उड़ते यहाँ भी…
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Added by shubhra sharma on July 23, 2013 at 12:00pm — 20 Comments

प्यार और मनुहार - (रवि प्रकाश)

अधिकार भरी मादकता से,दृष्टिपात हुआ होगा;

मन की अविचल जलती लौ पर,मृदु आघात हुआ होगा।



साँसों की समरसता में भी,आह कहीं फूटी होगी;

सूरज के सब संतापों से,चन्द्रकिरण छूटी होगी।

विभावरी ने आते-जाते,कोई बात सुनी होगी;

सपनों ने तंतुवाय हो कर,नूतन सेज बुनी होगी।

कितने पल थम जाते होंगे,बंसीवट की छाँव तले;

मौन महावर पिसता होगा,आकुलता के पाँव तले।



सन्ध्या का दीप कहीं बढ़ कर,भोरों तक आया होगा;

मस्तक का चंदन अनायास,अलकों तक छाया होगा।…



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Added by Ravi Prakash on July 23, 2013 at 12:00pm — 7 Comments

उन्हें ख्वाबो में देखता हूँ

एक कोशिश विरह रस की कविता कहने की आशा है आप सब को पसंद आएगी



फिर से सावन की घटा छाई है

तन्हाई में मुझे तेरी याद आई है

क्यों है दूर मुझसे तू न जानू

क्यों है मजबूर मैं न जानू



है कुछ मेरी भी मज़बूरी 

बिन तेरे मैं भी अधूरी

क्या बताऊ दिल का हाल

करता है मुझे ये बेहाल



तुमसे मैं क्या करू सवाल

मेरा क्या तुम बिन हाल

मैं कहु कैसे मेरी प्रियतम

सहा है कितना मैंने सितम



मैं समझती हूँ तेरे दिल का हाल

तेरे…

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Added by Ketan Parmar on July 23, 2013 at 11:30am — 8 Comments

मांगो वत्स क्या मांगते हो

रात स्वप्न में, प्रभु थे खड़े

बोले मांगो वत्स क्या मांगते हो

जमीं चाहते हो या आस्मां चाहते हो

बड़ी गाडी बड़ा घर नोटों की गट्ठर

या सत्ता सुख कुर्सी से हो कर

जो चाहो अभी दे दूँ

एक नयी ज़िन्दगी दे दूँ

मैंने माँगा तो क्या माँगा

एक बेंच पुरानीं सी

वो पीछे वाली मेरे स्कूल की

चाहिए मुझे

वो बचपन के ज़माने

दोस्त पुराने

मदन के डोसे पे टूटना

चेतन का वो टिफिन लूटना

अपना टिफिन बचाने में

टीचर…

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Added by shashiprakash saini on July 23, 2013 at 11:00am — 7 Comments

!!! शोर है सागर में तूफां !!!

छोटी बह्र में गजल-2122, 2122

तुम मुझे अच्छी लगी हो।

मन से तुम सच्ची लगी हो।।

रोज गुल की कामना सी,

शहर की बच्ची लगी हो।

शाम की मुश्किल घड़ी में,

जीत की बस्ती लगी हो।

हुस्न की मलिका सुनो तुम,

आज फिर हस्ती लगी हो।

बाग के हर बज्म में तुम,

राग सी मस्ती लगी हो।

शोर है सागर में तूफां,

मौज की कश्ती लगी हो।

चढ़ गया छत पर पकड़ कर,

सांप सी रस्सी लगी हो।

तुम…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 22, 2013 at 8:51pm — 9 Comments

शाश्वत प्रेम (कुंडलिया छंद)

1-

शाश्वत प्रेम सदैव है, सृष्टि आदि अनुमन्य।

यह ईश्वर का अंग है, करके सब हों धन्य॥

करके सब हो धन्य, जगत का सार यही है।

वश में होते ईश, प्रेम का काट नहीं है॥

कबिरा मीरा सूर, शशी आदिक इसमें रत।

नहीं वासना युक्त, प्रेम तो सत्व शाश्वत॥



2-

बहती गंगा प्रेम यह, बांध सका नहिं कोय।

अन्हवाये तन प्रेम में, हर मन निर्मल होय॥

हर मन निर्मल होय, कलुष अंतर का मिटता।

नहीं वासना युक्त, प्रेम वश ईश्वर मिलता॥

निकल अचल हिमवान, सिन्धु चंचल में… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 22, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं

सार छंद / ललित छंद [प्रथम प्रयास]

छन्न पकैया छन्न पकैया के स्थान पर 

गुरु  का आओ सम्मान करें 

....................................................

गुरु का आओ सम्मान करें , 'गुरु' मतलब समझाएं

'गु' से होता अज्ञान तिमिर का, 'रु' से उसको हटाएँ

गुरु का आओ सम्मान करें ,गुरु पूर्णिमा आई

अज्ञान तिमिर का जो हर रहे ,सबके मन का भाई

गुरु का आओ सम्मान करें, अँधेरा दूर हटाएँ

गुरु दक्षिणा आज उसे देवें, ज्ञान प्रकाश…

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Added by Sarita Bhatia on July 22, 2013 at 8:00pm — 7 Comments

मेरे पिता

याद आ गया फिर

मुझे मेरा बचपन ,

पिता  की उंगली थामे,

नन्हें कदमों से नापना,

दूरियाँ, चलते चलते ,

वो थक कर बैठ जाना ,

झुक कर फिर पिता का ,

मुझको गोदी उठाना ,

चलते चलते मेहनत का,

पाठ वो धीरे से समझाना ।

 

बच्चों पढ़ना है सुखदाई,

मिले इसी मे सभी भलाई,

पहले कुछ दिन कष्ट उठाना,

फिर सब दिन आनंद मनाना,

फिर आ गया याद, 

 उनका ये  गुनगुनाना ,

सिर पर वो उनका हाथ,

भर देता है मुझमे…

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Added by annapurna bajpai on July 22, 2013 at 6:30pm — 13 Comments

क्यूँ तुम खामोश रहे .. माहिया

1

क्यूँ तुम खामोश रहे
पहले कौन कहे
दोनों ही तड़प सहे .


आसान नहीं राहे
पग पग में धोखा
थामी तेरी बाहें .


यह जीवन सतरंगी
राही चलता जा
है मन तो मनरंगी .


साचे ही करम करो
छल तो काला है
जीवन में रंग भरो .


- शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

Added by shashi purwar on July 22, 2013 at 1:00pm — 9 Comments

मेरी पाती

मेरी पाती

मेरे नन्हे नन्हे पाँव,

पगडंडियों पर लम्बी दौड़,

पलकों में तिरती सुनहरी तितली,

फूलझड़ी से सपने -

सखी ! आज मैं उन सपनों को

मैके के झरोखों में टाँक आयी हूँ.

नभ का विस्तार,

धरती अम्बर का मिलन,

झिलमिल तारे पुँज,

सब मुझे लुभाते -

सखी ! मैं सितारों की चुनरी ओढ़

बाबुल का आकाश छोड़ आयी हूँ.

समुद्र की उत्ताल तरंगें,

रेत पर खींची लकीरें,

मेरे चुने हुए रंगीन सीपों का झुरमुट -…

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Added by coontee mukerji on July 22, 2013 at 2:14am — 17 Comments

है ज़मी पर शोर कितना [ग़ज़ल]

है ज़मी पर शोर कितना , आसमाँ खामोश है ।

मन में लाखों हलचलें हैं , आत्मा खामोश है ।

ना कभी करता सवाल , ना कभी देता जवाब ,

हमको देकर ज़िन्दगी , परमात्मा खामोश है ।

आदमीयत सड़ रही , लुट रहा बागे जहाँ ,

पर कहीं चुप चाप बैठा , बागबाँ खामोश है ।

चाहतें दुनिया की ज्यादा , देर तक चलती नहीं,

ताज़ की बरबादियों पर , शाहजहाँ खामोश है ।

जो हकीकत थे कभी, बनकर फ़साने रह गए ,

वक्त के हाथों लुटा , हर कारवाँ खामोश है…

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Added by Neeraj Nishchal on July 20, 2013 at 6:00pm — 18 Comments

गज़ल

शैक्षिक व्यस्तताओं तथा गाँव यात्रा के कारण काफी समय तक ओबीओ से दूर रहना पड़ा ! इतने दिनों में काफी याद आया अपना ये ओबीओ परिवार ! लगभग पाँच महीने बाद आज पुनः ओबीओ पर लौटा हूँ ! सर्वप्रथम सभी आदरणीय मित्रों को नमस्कार, तत्पश्चात ये एक छोटी-सी गज़ल नज़र कर रहा हू ! इसके गुणों-दोषों पर प्रकाश डालकर, मुझ अकिंचन को कृतार्थ करें ! सादर आभार !

अरकान : २१२२/२१२२

जिन्दगी की क्या कहानी !

गर नही आँखों में पानी !

भ्रष्टता…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on July 20, 2013 at 4:30pm — 24 Comments

मेरी तुम

बहुत देर से 

धूप ही धूप  थी 

दूर तक

कोई दरख्त नहीं 

जिसकी छाँव तले मै 

आ जाऊं !

बहुत दिनों से

कंठ  सूखा था

दिनों तक कोई

लहर नहीं

जिसे जी भर मै

पी जाऊं !

कई जेठों  से

स्वेद की कितनी बूंदें

माथे छलछलाती थीं

कब शीतल पुरवाई में

समा जाऊं !

आ जाओ

बस आ ही जाओ

मेरी जिन्दगी 

छाँव, तृप्ति और श्वास

मेरी तुम !

-जीतेन्द्र…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 20, 2013 at 4:00pm — 29 Comments

भीगे घर-तन हाय! सहेली

!!! चौपाई !!!

//प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं, अन्त में दो गुरू या एक गुरू दो लघु होता है। जगण-121 तथा तगण-221 निषेध है//

मेघ तुम्हारा तन है काला।

मन है निर्मल गंगा वाला।!

चाल तुम्हारी गड़बड़ झाला।

बोल कड़क बिजली भय वाला।।

बरसे झम-झम हवा झकोरे।

रिसता तरल अमी वन भोरे।।

खेत खलिहान हुए विभोरे।

कृषक चले तन हल धर जोरे।।

हरषे रिम-झिम सावन जैसे।

छपरा झर-झर झरता…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 20, 2013 at 10:12am — 12 Comments

अमरबेल

कभी कभी

खामोश हो जाते हैं शब्द।

 

जीवन में

कब अपना चाहा होता है

सब।

 

बहुत कुछ अनचाहा

चलता है संग।

इस दीवार से

झरती पपड़ियाँ;

दरारों में उगते

सदाबहार और पीपल;

गमले में सूखता

आम्रपाली।

 

दिये की रोशनी सहेजने में

जल जाती हैं उंगलियाँ।

 

गाँठ खोलने की कोशिश में

ढूंढे नहीं मिलता

अमरबेल का सिरा।

 

तुम

किसी स्वप्न सी खड़ी

बस…

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Added by बृजेश नीरज on July 20, 2013 at 10:00am — 25 Comments

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