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अश्कों की बारिश में,
ऐसे हैं भींगे हम…..
जिंदगी पल पल अब,
हो रही है बे दम……
सांसों से भीख जैसे,

हैं माँग रहे हम……

क़िस्त-क़िस्त दे रहा,
है कर, हमपे रहम…
जब से जिंदगी से,
चले गए हो तुम…...
अब न कोई हमसफ़र,
रहा न कोई हमदम….
या ख़ुदा कर मदद,
इतना सा कर करम…
अश्कों की बारिश में………
….अभिषेक कुमार झा ''अभी''

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by savitamishra on December 12, 2013 at 6:34pm

sundar

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 26, 2013 at 5:29pm
आदरणीय विजय मिश्र जी,
आपका स्नेह भरा आशीष पाकर मन हर्षित हुआ।

सादर आभार

Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 10:30am
सुन्दर
Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 26, 2013 at 8:39am
आदरणीय वीनस केसरी जी,
आपका स्नेह भरा आशीष पाकर मन हर्षित हुआ।

सादर आभार

Comment by वीनस केसरी on July 26, 2013 at 3:17am

वाह
बहुत खूब

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 25, 2013 at 9:12am
आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी,
आपका स्नेह भरा आशीष पाकर मन हर्षित हुआ।

सादर आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 25, 2013 at 6:46am

आपके मनोकामना शीघ्र पूर्ण हो ...शुभकामनाओं के साथ 

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 24, 2013 at 5:34pm
आदरणीय मुखर्जी जी,
आपने बिल्कुल सही कहा है, वाकई में जहाँ विस्तार किसी चीज़ को परिपूर्ण करता है
वहीँ कुछ जगह अकार्थक भी करता है पर
ये कविता का एक अंश है आगे का अंश जल्दी ही आप सबके समक्ष रखूँगा।

सादर आभार

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 24, 2013 at 5:25pm
आदरणीय डॉ प्राची जी और आदरणीय अन्नपूर्णा जी
आप सबके विचार जानकर मन बहुत हर्षित हुआ है।

आपका हार्दिक आभार है

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 24, 2013 at 5:22pm
हा हा हा हा आदरणीय ''केतन परमार जी''
ये आपकी गुस्ताखी बार बार हो … आप सबका बेवाक नजरिया ही
मेरा मार्गदर्शन करेगी …
ये तो ''चले गए तुम'' का एक अंश है
ये कविता वाकई में अधूरी है जिसे समय समय पे आप सबके सामने
एक अंश में रखूँगा और आगे भी इसी तरह की गुस्ताखी की उम्मीद करता रहूँगा।

सादर आभार

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