For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)

ग़ज़ल -निलेश "नूर" - कभी वो मेहमां रही है मेरी

आ. तिलक राज कपूर सर के मार्गदर्शन से एक ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है ..  उम्मीद है आप का स्नेह प्राप्त होगा

.

12122/ 12122/ 12122/ 12122 

हया के मारे वो वस्ल के पल, नज़र का पर्दा गिरा रही है,

मगर ये गालों की सुर्ख़ रंगत, हर एक ख्वाहिश बता…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on July 3, 2014 at 5:00pm — 19 Comments

हम जैसे सीधे सादो को क्यूँ बहकाते हो तुम

   2222          2222        2222  22

चलते चलते इन राहों में जब मिल जाते हो तुम

जाने क्या हो जाता है जो यूं सकुचाते  हो तुम

 

तेरी आँखों में लगता है काला कोइ जादू

जिसपे नजरें पड़ जाती उसको भरमाते हो तुम

 

इक पल को आते हो छत पर फिर गुम हो जाते हो

क्या बच्चो के जैसा ही हमको बहलाते हो तुम

 

उजला उजला योवन तेरा फूलों सा है भाये

क्यूँ छुईमुई जैसा छू लेने पर मुरझाते हो तुम

 

तेरी इन मादक आँखों से मदिरा छलका…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on July 3, 2014 at 3:39pm — 8 Comments


प्रधान संपादक
नियति (लघुकथा)

जब से उस युवा चींटे के पँख निकले थे वह हवा बातें करने लगा था. उसने सभी परिजनों और मित्रजनो पर अपने नए नए निकले पँखों का रुआब डालना शुरू कर दिया था, उसका आत्मविश्वास देखते ही देखते आत्ममुग्धता का रूप धारण कर गया। इस बदले हुए स्वरूप को देख देख उसकी माँ रूह तक काँप जाती. लाख समझाने पर भी बेटा यथार्थ के धरातल पर आने को तैयार न हुआ तो एक दिन बूढ़ी माँ ने अपनी बहू को सफ़ेद जोड़ा देते हुए भरे गले से कहा "इसे अपने पास रख ले बेटी।" 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by योगराज प्रभाकर on July 3, 2014 at 3:20pm — 38 Comments

3 मुक्तक …

3 मुक्तक …

१.

ऐ खुदा  मुझ  को  बता  कैसा  तेरा दस्तूर है

तुझसे  मिलने  के लिए  बंदा तेरा मजबूर है

जब तलक रहती हैं सांसें दूरियां मिटती नहीं

नूर हो के रूह का तू क्यूँ उसकी रूह से दूर है



२.

हिसाब तो  साथ  ज़िंदगी  के पूरा हुआ करता है

साँसों के  बाद  ज़िस्म फिर धुंआ हुआ करता है

टुकड़ों में बिखर जाता है हर पन्ना ज़िन्दगी का

ज़मीं का  बशर  फिर आसमाँ का हुआ करता है



३.

हम परिंदों  को  खुदा  से बन्दगी नहीं आती…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 3, 2014 at 11:30am — 12 Comments

आज रिश्ते क्यों सभी को - ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

**********************

सावनों   में   फिर   हमारे   घाव   ताजा   हो  गये

रंक  सुख  से  हम  जनम के, दुख के राजा हो गये

**

साथ  माँ  थी  तो   दुखों में भी सुखों की थी झलक

माँ  गयी  है   छोड़   जब  से  सुख जनाजा हो गये

**

कल तलक जिनकी गली भी कर रही नासाज थी

आज क्यों कर वो तुम्हारे दिल के ख्वाजा हो गये                  ( ख्वाजा - स्वामी )

**

कोइ   चाहे    देह     हरना   और   कोई   दौलतें

आज …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2014 at 11:00am — 8 Comments

समय ....

ये पल पल

गहराता कभी न

खत्म होने वाला

सन्नाटा

 

नहीं ....ये शान्ति नहीं है

चुप्पी भी नहीं है

न ....विराम है

ज़िन्दगी का

बहते समय का, गुज़रते दिनों का

 

फिर क्यूँ ये

ठहरा सा लगता है

जैसे

बांध के टांग दिया है

दीवार पर

इन बीतते दिनों को

शामों को, रातों को और

अलगे हर दिन को

 

कभी कभी

यूँ लगता है जैसे

कई सालों से यही है समय

यही था और इसी तरह…

Continue

Added by Priyanka singh on July 2, 2014 at 6:30pm — 14 Comments

लघुकथा-थप्पड़/कल्पना रामानी

अपने बच्चों को सिंकते हुए भुट्टे और बिकते हुए जामुनों  को ललचाई नज़रों से देखते हुए वो मन मसोस कर रह जाती थी। आज उसे तनख़्वाह मिली थी, उसके हाथों में पोटली देख कोने में खेलते हुए दोनों बच्चे खिलौने छोड़ दौड़ पड़े। तभी बीड़ी पीते हुए पति ने उससे कहा-“ला  पैसे, बहुत दिनों से गला तर नहीं हुआ”... “लेकिन आज मैं बच्चों के लिए...” “तड़ाक!..."  "तो तू मेरे खर्च में कटौती करेगी?” पोटली जमीन पर गिरी, जामुन  और भुट्टे मैली ज़मीन सूँघने लगे और... माँ पर पड़े थप्पड़ से सहमे हुए बच्चे अपना गाल सहलाते हुए पुनः अपने…

Continue

Added by कल्पना रामानी on July 2, 2014 at 1:00pm — 17 Comments

गज़ल/कल्पना रामानी

कल हुआ जो वाक़या, अच्छा लगा।

हाथ तेरा थामना अच्छा लगा।

जिस्म तो काँपा जो तूने प्यार से,

कुछ हथेली पर लिखा, अच्छा लगा।

देखकर मशगूल हमको इस कदर,

चाँद  का  मुँह फेरना अच्छा लगा।

घाट रेतीले जलधि के नम हुए,

मछलियों का तैरना अच्छा लगा।

 

आसमाँ में बिजलियों की कौंध में,

बादलों का काफिला अच्छा लगा।

 

नाम ले तूने पुकारा जब मुझे,

वादियों में गूँजना अच्छा लगा।

 

बर्फ में लिपटे…

Continue

Added by कल्पना रामानी on July 2, 2014 at 11:00am — 17 Comments

सांत्वना (लघु कहानी)-लक्ष्मण लडीवाला

पत्नी की म्रत्यु के २ वर्ष बाद ही बीमार रहने लगे मथुरा के संभ्रांत और संपन्न परिवारके श्री काशी प्रसाद जी का

८५ वर्ष की उम्र में देहांत हो गया | रात को शौक जताने आयेरिश्तेदार दुःख की घडी में सांत्वनाजता रहे थे, तभी

उस परिवार की बहुएँ…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 2, 2014 at 9:30am — 18 Comments

समय बीतता गया... (विजय निकोर)

समय बीतता गया...

समय की आँधी क्रान्तियात्रा-सी

धुन्धले पड़ते

प्रतीक्षा और मृत्यु के सीमान्त

लड़खड़ाता साहस, विश्वास

ऐसे में स्नेह को आँधी में

दोनों हाथों से लुटा कर

कुछ मिलता है क्या

आत्मपीड़न के सिवा ?

अकेलापन

कसैलापन रसता

बचा रह जाता है

बीतती मुस्कान ओंठों पर

खाली बोतलों के पास

टूटे हुए गिलास-सी पड़ी ...

            -------

-- विजय निकोर

(मौलिक…

Continue

Added by vijay nikore on July 2, 2014 at 8:30am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सावन में- ग़ज़ल

2122 1122 22

बिजलियाँ हैं न हवा सावन में

गुज़री बेआब घटा सावन में

 

गर्म रातें ये सहर भी बेचैन

यूँ बुरा हाल हुआ सावन में

 

गुल खिले हैं न शिगूफ़े हँसते

है न रंगों का पता सावन में

 

खेत तालाब शजर भी सूखे

आसमाँ सूख गया सावन में

 

मुन्तज़िर सर्द फुहारों के अब

थक गई है ये फ़िज़ा सावन में

 

याद आती है हवा की ठण्डक

सब्ज़रंगी वो रिदा सावन में

 

मुन्तज़िर= इन्तज़ार…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 8:11am — 16 Comments

हाँ..! कुछ तो बाकी है (अतुकांत)

आज कुछ....

आहट सी हुई, उस बंद

वीरान अन्धेरें से कोने में

जहाँ कभी

खुशियों की रौशनी थी

क्यों..?

आज उस बेजान लगने वाली

बंजर भूमि में

नमी सी आ गई

और दिखने लगा

एक आशा का अंकुरण

उस अंकुर में

जो कभी

हमने मिल कर

बोया था

हमारे वर्तमान और भविष्य

की छाँव

और फल के लिए

हाँ..! कुछ तो बाकी है

जो अमिट रहा

शायद....!

यही  तो रिश्ता होता…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 2:05am — 10 Comments

तख़्त

तख़्त के साथ -साथ

तख्तियां बदलती हैं.

वक़्त के साथ -साथ

सख्तियां बदलती हैं.

सत्ता के साथ- साथ

चाप्लूसियां बदलती हैं.

अल्हडों के साथ-साथ

फब्तियां बदलती हैं.

धर्मों के साथ-साथ

भ्रांतियां बदलती हैं.

भोंहों के साथ-साथ

भृकुटियां बदलती हैं.

सन्दर्भों के साथ-साथ

अभिव्यक्तियाँ बदलती हैं.

सम्हालते सम्हालते

परिस्थितयां बदलती हैं.

कन्धों के साथ-साथ

अब अर्थियां बदलती है.

विजय प्रकाश शर्मा

मौलिक व…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 2, 2014 at 12:31am — 6 Comments

हायकु

भूख

====



भूख हायकु

विचलित है मन

शब्द मनन|



पत्तल झूँठा

चाट भरता पेट

अमीर शेष|



झूठन चाट

शांत की उदराग्नि

कुत्तों के संग|



भृत्य लाड़ले ...सेवक

अवशेष भोजन

भूख मिटाते|



सगाई-शादी

क्यों भोजन…

Continue

Added by savitamishra on July 1, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

अभिसारिका

स्वप्न

पावस-अमावस में, निविड़ में बीहड़ में

साहस की मूर्ति बनी कृष्ण अभिसारिका  I

नीर नेत्र-नीरज में धर्म वृत्ति धीरज में

श्रृद्धा भक्ति भाव भरी आयी सुकुमारिका I

देखा प्रिय पंथ में खड़े है अड़े भासमान

धाय गिरी अंक मे अधीर हुयी चारिका  I

चौंकि उठी उसी क्षण स्वप्न सुख भंग हुआ

हाय ! कहाँ कान्ह वे तो जाय बसे द्वारिका I  

 

मुक्ति-चतुष्टय

(भारतीय दर्शन में चार प्रकार की मुक्ति मानी…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2014 at 7:00pm — 22 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

जब यादों की शबनम रोती है   

तब सारी शब नम सी होती है



मेरी परवाह करे क्यों दुनिया

ज़ख्मो पर वाह सदा होती है



जगमग देखी जो मेरी दुनिया

जग मग में खार पिरोती हैं

प्रिय तम में उसको छोड़ गया

वो प्रियतम की खातिर रोती है



मूसा फिर आये राह दिखाने

राह…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on July 1, 2014 at 4:00pm — 11 Comments

प्रेम स्पंदन .....

प्रेम स्पंदन ....

नयन आलिंगन.....

अपरिभाषित और अलौकिक.....

प्रेम स्पंदन//

मौन आवरण में ....

अधरों का अधरों से....

मधुर अभिनंदन//

महकें स्वप्न....

नेत्र विला में....

जैसे महके.....

हरदम चंदन//

मेघ वृष्टि की.....

अनुभूति को ....

कह पाये न....

प्रेम अगन में....

भीगा ये तन//

विछोह वेदना…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 1, 2014 at 2:00pm — 24 Comments

कागज की नाव

मन के भावो को
कल्पना की कलम से
कोरे कागज़ पर
उतारता हूँ.
शब्दों की  आड़ में,
चिंता के झाड़ से
बचाई "संवेदना" को
संवारता हूँ,
कागज की नाव पर
सपनो के सागर में
सच की पतवार लिए
हिलकोरे खाता हूँ.
डूबना -उतराना तो
खेल है जीवन का
जाने क्या आश लिए
क्षितिज तक जाता हूँ.

विजय प्रकाश शर्मा.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 1, 2014 at 11:00am — 14 Comments

फिर वही कहानी “नारी व्यथा”....

फिर वही कहानी “नारी व्यथा”

आज फिर सुर्ख़ियों में पढ़कर एक नारी की व्यथा,

व्यथित कर गयी मेरे मन को स्वतः

नारी के दर्द में लिपटे ये शब्द संजीव हो उठे हैं

इस समाज के दम्भी पुरुष

कभी किसी दीवार के पार उतर के निहारना

नारी और पुरुष के रिश्ते की उधडन नजर आएगी तुम्हे

कलाइयों को कसके भींचता हुआ, खींचता है अपनी ओर

बिस्तर पर रेंगते हुए, बदन को कुचलता है

बेबसी और लाचारी में सिसकती है,

दबी सहमी नारी की देह पर ठहाकों से लिखता है, …

Continue

Added by sunita dohare on July 1, 2014 at 1:30am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फूल कैसे खिलें ? ( एक अतुकांत चिंतन ) गिरिर्राज भंडारी

फूल कैसे खिलें ?  ( एक अतुकांत चिंतन )

***************

प्रेम विहीन हाथ मिले तो ज़रूर

मुर्दों की तरह , यंत्रवत

तो भी खुश हैं हम

शायद अज्ञानता और बेहोशी भी खुशी देती है ,एक प्रकार की

झूठी ही सही

और झूठी इसलिये

क्यों कि बेहोशी का सुख हो या दुख , झूठा ही होता है

 

इसलिये भी, क्योंकि

हम स्वयँ जीते ही कहाँ है

जीती तो है एक भीड़ हमारी जगह ,

भीड़ विचारों की , तर्कों – कुतर्कों की

भीड़ शंकाओं- कुशंकाओं की ,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 30, 2014 at 6:42pm — 22 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अभी नहीं.. चर्चा जारी रहे।  'अभी' अलविदा ना कहना.. "
9 minutes ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय सौरभ भाई, आप ने सभी बातें सविस्तार कही और अनेकों संशयों को समाप्त किया। इसके पश्चात और कुछ…"
3 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"यह डेटाबेस तक पहुंच का प्रश्न है। सामान्यतः पोर्टल सर्विसेज एजेंसी साइट ओनर को डेटाबेस तक पहुंच…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता ’अजेय’ जी, आपकी संलग्नता आश्वस्तिकारी है. आपका सोचना आपके पहलू से…"
6 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"इस सारी चर्चा के बीच मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। जैसा कि हम सबने देख लिया कि सदस्य इस मंच के लिए…"
10 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जी आदरणीय "
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"आदरणीय अमिताजी, हार्दिक बधाइयाँ    प्रस्तुति में रचनात्मकता के साथ-साथ इसके प्रस्तुतीकरण…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post कुंडलिया
"आदरणीय सुरेश कल्याण जी, आपकी उपस्थिति के लिए हार्दिक धन्यवाद  छंद की अंतिम दोनों पंक्तियों की…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
"एक मार्मिक भावदशा को शाब्दिक करने का सार्थक प्रयास हुआ है, आदरणीया अमिता तिवारीजी. आप सतत अभ्यासरत…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"शुक्रिया आदरणीय सर जी। डाउनलोड करने की उस व्यवस्था में क्या हम अपने प्रोफाइल/ब्लॉग/पन्ने की पोस्ट्स…"
yesterday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अभी प्रश्न व्यय का ही नहीं सक्रियता और सहभागिता का है। पोर्टल का एक उद्देश्य है और अगर वही डगमगा…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जैसा कि ज्ञात हुआ है कि संचालन का व्यय प्रतिवर्ष 90 हज़ार रुपये आ रहा है। इस रकम को इतने लंबे समय तक…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service