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ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

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ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा

सुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगा

फूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्याय

क्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगा

जान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारी

किन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगा

मठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बल

वायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगा

तीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर है

किंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2019 at 11:00am — 2 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

2×15

इस दुनिया में एक तमाशा जाने कितनी बार हुआ

वो दरिया में डूब गया जो तैर समंदर पार हुआ

अच्छे दिन की चाहत वालों ऐसी भी क्या बेताबी

चार नियम बनते ही बोले जीना ही दुश्वार हुआ

एक पहाड़ी पर शीशे के घर में बैठा बाजीगर

नाच नचाकर देख रहा है कौन बड़ा फनकार हुआ

तुमने अपने मातम पर भी खर्च किया मोटा पैसा

और किसी निर्धन के घर में मुश्किल से त्यौहार हुआ

चार कदम की दूरी पर थी मंजिल…

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Added by मनोज अहसास on September 8, 2019 at 10:40pm — 1 Comment

गजल

चाँद से अब दोस्ती का सिलसिला चलता रहेगा

कब तलक वह मुस्कुराता भेदमय मामा रहेगा?1

कौड़ियों का खेल हम करते नहीं, सब जानते हैं

मुँह दिखाई तक हमारा हर कदम पहला रहेगा।2

दूरियों का गम नहीं करते कभी हम इश्क वाले

पाँव रखने में सतह पर जोर कुछ ज्यादा रहेगा।3

आज इसरो की तपिश में तन-बदन पिघला जरा-सा

कल सुहाने और होंगे साथ में नासा रहेगा।4

क्यूँ लजाना कोटि नजरें प्यार से फिर फिर निहारें

मन हुआ जाता व्यथित, पर हाथ में खाका रहेगा।5

वक्त की रुसवाइयों का…

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Added by Manan Kumar singh on September 8, 2019 at 4:45pm — 2 Comments

निस्सम्बन्ध

पूर्तिहीन संवाद

आकुलित असंवेदित भाव

अपाहिज हुई वह जो होती थी

स्नेह की अपेक्षित शाम

गई कहाँ वह ममतामयी प्रतीक्षातुर बाहें

दिशायों से आती तुम्हारे आने की आहट

ऊब गई है, उकता गई है कब से

नपुंसक दुखजनित अजनबी हुई आस्था

महिमामयी स्मृतियों के आस-पास

मटमैली रौशनी सुनसान गहरी उदास

फिर क्यूँ जोड़ती हैं हमें देहहीन परछाइयाँ                   

आसाधारण अपूर्ण प्रवाही दिशाहीन हवा-सी

कसकती…

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Added by vijay nikore on September 8, 2019 at 3:58pm — 2 Comments

मेरे सवाल ... अतुकांत कविता

मेरे सवाल .... अतुकांत कविता



वो तेरी प्यार भरी बातें,

तेरा रौबीला रूप,

गज़ब की मुस्कान औ दंभ,

बहुत रोका, बहुत सँभाला,

कुछ भी ना कर सकी,

ख़ुद ही ख़ुद से हार गयी।

अब वो प्यारी बातें मेरी हुईं,

तेरा रौब, मेरा सौंदर्य साथ हुए,

तू मुस्कुराया, में खिलखिलाकर हंसी,

तेरा वो दंभ, मेरा हुआ,

सात फेरों ने ज़िन्दगी दी,

तू मेरा औ मैं तेरी हुई।

कहा किया सदा, साथ ना छूटेगा,

मैं अकेली पड़…

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Added by Usha on September 7, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

2×15

सबका इक दिन आता है दिन मेरा भी आ जायेगा

जीवन पूरा होते-होते जीना भी आ जायेगा

आहें भरना सीख गए तो लिखना भी आ जायेगा

इन शब्दों में इक दिन उसका चेहरा भी आ जायेगा

इसको मन की लाचारी भी कहते हैं दुनिया वाले

खुद से बातें करते करते कहना भी आ जायेगा

आलू पर मिट्टी लिपटी थी ,मिट्टी से जब आया था

दुनिया में कुछ रोज रहेगा छिलका भी आ जायेगा

जिसकी चाहत में इतने दिन आस लगाकर जिंदा थे

मिल…

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Added by मनोज अहसास on September 6, 2019 at 11:41pm — 2 Comments

रब है ज़रूर आपको दिखता भले न हो (६१)

ग़ज़ल(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

.

रब है ज़रूर आपको दिखता भले न हो

हर सू है नूर आपको दिखता भले न हो

**

होता ज़रूर है किसी में कम किसी में ख़ूब

दिल का गुरूर आपको दिखता भले न हो

**

जोश-ओ-जुनून से किये हासिल कई मुक़ाम

होता फ़ितूर आपको दिखता भले न हो

**

मौज़ूदगी है उनकी तसव्वुर में आपके

जलवा-ए-हूर आपको दिखता भले न हो

**

अनजान कोई रह सके क्या उसके दर्द से

दिल चूर चूर आपको दिखता भले न हो

**

हर वक़्त डोलता रहे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 6, 2019 at 11:30pm — 3 Comments

रोटियाँ

पेट हो खाली तो फिर कैसे खेले गोटियां
अब मयस्सर हैं बस ख्व़ाब में ही रोटियाँ
.
तुम्हें मुबारक हो शाहों की दावतें हमको
मिल जाएँ खाने को दो चार सूखी रोटियाँ
.
माल…
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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 6, 2019 at 12:30pm — 1 Comment

कर्ज़- एक मर्ज़

कर्ज़ का मर्ज़ होता है कैसा

समझ कभी ना पाया था

जब तक कर्ज में नहीं था डूबा

ऋणकर्ता का मजाक बनाया था

समय बदलते देर ना लगती     

अपनी मूर्खताओ की वजह से

मैं भी जब बाल-बाल बंधवाया

तब समझ में आया था ||

 

माँ कहती थी कर्ज ना लेना

गरीबी में तुम रह लेना

मुँह छोटा ओर पेट बड़ा

कर्ज का होता है बेटा

आसानी से ये नहीं चुकता

अच्छे-अच्छे को ले डूबता

पर आसानी से नहीं चुकता

इतना समझ लेना बेटा…

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Added by PHOOL SINGH on September 5, 2019 at 5:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तू शिक्षक है़ या रक्षक है़

आदरणीय योगराज जी , आदरणीय सौरभ जी , आदरणीय समर भाई जी , तथा जिस मित्र ने भी कभी भी मेरा मार्ग दर्शन किया सभी को  समर्पित  ,करती हूँ ये रचना .

जीवन निर्माता भाग्य विधाता सब दुःख हरता ईश्वर है़

तृण तृण परिभाषित राह प्रदर्शित पग- पग करता गुरुवर है़



गिर जाने पर हाथ बढ़ाना

हर मुश्किल में पार लगाना



गहन तमस में घिर जाने पर

भटकों को यूँ राह दिखाना



तेरी अनुकंपा के आगे

कष्टों की धुंध का छट जाना



पतझड़ के मारे तरुओं पर

हरित हरित…

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Added by rajesh kumari on September 5, 2019 at 4:30pm — 6 Comments

-गुरु दिवस

झिझको नहीं ठिठको नहीं
लो पकड़ लो मेरा हाथ
मैं तुम्हे ले चलता हूँ
तम से प्रकाश की ओर

प्रकाश तुम्हें दिखाएगा
जीवन के अनंत आयाम
तुम कसौटी पर परखना
औऱ चुन लेना कोई एक

वो एक ही पर्याप्त है
जीवन को दिशा देने के लिए
अन्य के जीवन में
प्रकाश फ़ैलाने के लिए॥

- प्रदीप देवीशरण भट्ट - मौलिक व अप्रकाशित

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 5, 2019 at 3:50pm — 4 Comments

कुण्डलिया छंद-

नयनों का जिस क्षण हुआ, नयनों से सम्पर्क।
नयन नयन के हो गए, हुआ न कोई तर्क।।
हुआ न कोई तर्क, नयन नयनों पर छाए।
निकट नयन को देख, नयन नत-नत शरमाए।।
नयना ही आधार, नयन के है चयनों का।
नयन नयन का मेल, निरामय है नयनों का।।
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
#हरिओम श्रीवास्तव#

Added by Hariom Shrivastava on September 3, 2019 at 7:04pm — 4 Comments

तू है यहीं..।।

तू है यहीं..।।

दिन नया-नया सा है, ख़्वाहिशें सब पुरानी सी।

तेरा इंतज़ार था, इंतज़ार है, और इंतज़ार रहेगा।।

चाहतें हैं जो बदलती नहीं, आहें हैं, मिटती नहीं।

अहसास करवटें बदल-बदल कर सताते हैं।।

हर शाम पूछती है, बेधड़क दरवाज़ा खटखटाती है।

वो ख़ुद लौटा है, या सिर्फ़ उसकी यादें लौटी है?

यादें और यादें, तुम ही रुक जाओ, कम्बख़्त ।

मुस्कराहटें ना सही, आँसू ही दे जाओ ज़रा।।

हर मशविरा वो देता है, आगे बढ़ जाओ।

बतला…

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Added by Usha on September 3, 2019 at 10:30am — 4 Comments

संबंध-सूत्र

अजीब अवस्था है

कोई खुरदरी विवशता है

और है अद्भुत  चित्ताकर्षण ....

पलकों के आसपास 

गहन दूरता का आवरण

कि  जैसे  हो  फैल  रहा

मूर्छा का मौन वातावरण

अपरिचित भीड़ में खो गईं 

कितनी  परिचित  संज्ञाएँ

सरोवर-सदृश  संवेदनाएँ

फिर  भी  न  जाने  कैसे

दरिद्र हुई धड़कन में भी आदतन

कोई वादा निभाने के बहाने ही शायद

डरी  हुई  बाहें  फैलाए

व्याकुलतर  गति  से  छू  लेती  हैं

आज भी…

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Added by vijay nikore on September 3, 2019 at 7:27am — 4 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

2×15

मेरे मन की लाचारी में जल जायें ना मेरे हाथ

मुझको फिर से पावन कर दे तू हाथों में लेके हाथ

मम्मी,पापा,बहना,भाई,बीवी,बच्चे और साथी

काम-समय अपने हाथों में दिखते मुझको सबके हाथ

सुन लेने की आदत को कमजोरी समझा जाता है

सच्चे साबित हो जाते हैं पल-पल हाथ नचाते हाथ

सच कहने की चाहत तो है लेकिन इन झूठों के बीच

कैसे सबको बतलाऊं मैं मेरे भी हैं काले हाथ

अपना मानना,अपना कहना,अपना होना बात कई

लेकिन…

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Added by मनोज अहसास on September 2, 2019 at 11:10pm — 2 Comments

कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा (६० )



कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा

हमारे गाँव की चौपाल तक अब आब आएगा

**

खिलौना जानकर कुछ लोग उसको तोड़ डालेंगे

अगर तालाब की तह में उतर महताब आएगा

**

हमेशा ख़्वाब देखें और मेहनत भी करेंगे तो

हक़ीक़त में उतर कर एक दिन वो ख़्वाब आएगा

**

नहीं था इल्म हमको ये कि जिस फ़रज़न्द को पाला

वही बेआब करने सूरत-ए-कस्साब आएगा

**

ग़रीबी से दिलाएगा  निज़ात अब कौन और कैसे

अमीरी का रियाया को कभी क्या ख़्वाब आएगा …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 2, 2019 at 11:00pm — 5 Comments

अधिकारों की नई परिभाषा

काफी प्रतीक्षा के बाद जनरल मैनेजर वनिता सिंह को अकेले देख कर शिवानी ठाकुर उनके चैंबर में प्रविष्ट हुयी। मैडम अपनी कार्य-शैली के अनुसार सिर झुकाये कुछ पढ़ने में व्यस्त बनी रहीं। शिवानी ने विनम्रता से बैंक जाकर ए टी एम् कार्ड रिसीव करने हेतु अनुमति माँगी।

उन्होंने सिर झुकाये ही कहा, “लिखित में लाइए।”

“मैडम, मैं अवकाश नहीं माँग रही हूँ , बैंक जाकर तुरंत वापसी कर लूंगी।

“सुना नहीं? लिखकर लाओ कि तुम कार्यालय के समय में अपना व्यक्तिगत कार्य करने जाना चाहती हो।”

शिवानी…

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Added by Usha on September 2, 2019 at 12:00pm — 1 Comment

गजल

फूल को काँटा चुभाना तो कभी अच्छा नहीं

घाव देकर मुस्कुराना तो कभी अच्छा नहीं।1

प्रेम के बिरवे उगें तो वादियाँ गुलजार हों

बेरहम पत्थर उठाना तो कभी अच्छा नहीं।2

रोशनी का सिलसिला चलने लगा,चलने भी' दो

भोर का सूरज चुराना तो कभी अच्छा नहीं।3

प्यास धरती की बढ़ा क्यूँ फिर चले काली घटा?

जल रहे को फिर जलाना तो कभी अच्छा नहीं।4

दाग औरों को लगाने को सभी बेताब हैं,

आँख से काजल उड़ाना तो कभी अच्छा नहीं।5

इल्म…

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Added by Manan Kumar singh on September 1, 2019 at 8:30am — 2 Comments

विकल्प  (लघुकथा)

"मास्टर जी, अब तो पानी सिर के ऊपर हो गया। अब हमारे सामने हथियार उठाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।"

"नहीं नासिर, ऐसा कुछ भी नहीं है।आजतक दुनियाँ में हथियार से कोई भी समस्या हल नहीं हुई| अभी भी बहुत विकल्प हैं।"

"सर जी, स्थिति कितनी भयानक हो चुकी है, आपको अहसास नहीं है। हमारी क़ौम को कुचला और दबाया जा रहा है।"

"यह सिर्फ़ एक पहलू है। तुम्हें बार बार यही पाठ पढ़ाया जा रहा है। लोग तुम्हारा और तुम्हारी कौम का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे बचो|"

"आप के हिसाब से  इस समस्या का…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 30, 2019 at 8:30pm — 2 Comments

क्षणिकाएँ ....

क्षणिकाएँ ....

लील लेती है
एक ही पल में
कितने अंतरंग पलों का सौंदर्य
विरह की
वेदना

...............

उड़ती रही
देर तक
खिन्न सी एक तितली
मृदा में गिरे
मृत पुष्प में
जीवन ढूँढती

..........................

कह रहे थे दास्ताँ
बेरहम आँधियों की
बिखरे तिनके
घौंसलों के

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 30, 2019 at 7:10pm — 4 Comments

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