For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

October 2019 Blog Posts (63)

ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212   1212    1212    1212



निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां

न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं

थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2019 at 12:30pm — 8 Comments

तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )



तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम

फ़ितरत से हैं ज़रूर कुछ अब्र-ए-रवाँ से हम

**

कितना लिए है बोझ ज़मीँ इस जहान का

मुमकिन है क्या कभी कि बनें धरती माँ-से हम

**

दिल तोड़ के वो कह रहे हैं सब्र कीजिए

सब्र-ओ-क़रार लाएँ तो लाएँ कहाँ से हम

**

ये तय नहीं कि प्यार की हासिल हों मंज़िलें

इतना है तय कि जाएँगे अब अपनी जाँ से हम

**

कुछ इस तरह से उनकी हुईं मेहरबानियाँ

खाते…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 8, 2019 at 10:30pm — 6 Comments

रिक्तता :.....

रिक्तता :.....

बहुत धीरे धीरे जलती है
अग्नि चूल्हे की
पहले धुआँ
फिर अग्नि का चरम
फिर ढलान का धुआँ
फिर अंत
फिर नहीं जलती
कभी बुझकर
राख से अग्नि
साकार
शून्य हो जाता है
शून्य अदृश्य हो जाता है
बस रह जाती है
रिक्तता
जो कभी पूर्ण थी
धुआँ होने से पहले

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 8, 2019 at 9:26pm — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
छंद मुक्त कविता : रावण दहन

छंद मुक्त कविता : रावण दहन

मैं रूप बदल कर बैठा हूँ ।
स्वरूप बदल कर बैठा हूँ ।
मैं आज का रावण हूँ मितरों,
जन के मन में छुप बैठा हूँ ।।

मुझको जितना भी जलाओगे ।
हर घर में उतना पाओगे ।
गर मरना भी चाहूँ मितरों,
तुम राम कहाँ से लाओगे ।।

कन्या को देवी सा मान दिया ।
नारी को माँ का सम्मान दिया ।
इन बातों का नही अर्थ मितरों,
जब गर्भ में कन्या का प्राण लिया ।। 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 8, 2019 at 3:28pm — 6 Comments

विजयदशमी पर कुछ दोहे :

विजयदशमी पर कुछ दोहे :

राम शरों ने पाप को, किया धरा से दूर।

दम्भी रावण का हुआ, दम्भ अंत में चूर।1।

हाथ जोड़ वंदन करें , कहाँ राम हैं आप।

प्रतिपल बढ़ते जा रहे ,हर सत्या पर पाप।2।

छद्म वेश में घूमते, जगह जगह लंकेश।

नारी को वो छल रहे, धर कर मुनि का वेश।3।

राम नाम के दीप से, हो पापों का अंत।

मन से रावण दूर हो ,उपजे मन में कंत।4।

जीवन में लंकेश सा, जो भी करता काम।

ऐसे पापी को कभी , क्षमा न करते…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 8, 2019 at 11:48am — 12 Comments

विकासोन्मुखी (लघुकथा)

"ख़ामोश!" एक बलात्कार पीड़िता और सरेआम उसकी हत्या करने वाले युवकों के बाद बारी-बारी से माइक पर उसने मशहूर नेताओं-अभिनेताओं और पुलिसकर्मियों की मिमिक्री करते हुए कहा, "कितने आदमी थे!"



"साहब, ती..ई...तीन थे!"



"वे तीन थे ... और ये सब तीस-चालीस...ऐं! लानत है... तुम लोगों की ख़ामोशी पर!"

"साला... एक मच्छर इस देश के आदमी को हिजड़ा बना देता है!"



"साहब... मच्छर! .. मच्छर बोले तो... पैसा, डर, पुलिस, नेता, क़ानून या स्वार्थ!..है न!"



"कोई…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2019 at 8:30am — 4 Comments

उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.

"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.

ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा…

Continue

Added by विनय कुमार on October 7, 2019 at 6:42pm — 8 Comments

सुख उसका दुख उसका है - सलीम 'रज़ा' रीवा

22 22 22 22 22 22 22 2

सुख उसका दुख उसका है तो फिर काहे का रोना है

दौलत उसकी शोहरत उसकी क्या पाना क्या खोना है //



चाँद-सितारे उससे रोशन फूल में उससे खुशबू है 

ज़र्रे-ज़र्रे में वो शामिल वो चांदी वो सोना है //



खुशिओं के वो मोती भर दे या ग़म की बरसात करे

उसकी हुकूमत है हर सू वो जो चाहे सो होना है //



सारी दुनिया का वो मालिक हर शय उसके क़ब्ज़े में 

उसके आगे सब कुछ फीका क्या जादू क्या टोना है…

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 6, 2019 at 8:30pm — 10 Comments

दादाजी का वोट - लघुकथा -

दादाजी का वोट - लघुकथा -

विवेक विलायत से इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा गोल्ड मैडल सहित पास करके लौटा था। उसके पास कई विदेशी और भारतीय कम्पनियों के ऑफर थे।

आज परिवार के सभी सदस्य इसी मुद्दे पर अंतिम फैसला करने के लिये बड़े हॉल में एकत्रित हुए थे। सभी की रॉय भिन्न भिन्न थी। लंबी बहस चली लेकिन कोई अंतिम हल नहीं निकला।

तब दादाजी ने सुझाव दिया कि सब अपनी अपनी सलाह लिख कर पर्ची डालें। सभी पर्चियों को खोल कर बहुमत से फैसला होगा।वह सबको मान्य होगा।सभी इससे सहमत हो गये।

सभी की…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 5, 2019 at 1:32pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तुम आओ तो...

मैंने केसर-केसर मन से रची रंगोली,

मैंने रेशम-रेशम बंधनवार सजाए,

कुछ महके कुछ मीठे से पकवान बना लूँ-

तुम आओ तो उत्सव जैसा तुम्हे मना लूँ...

 

कंगूरों तक रुकी धूप से कर मनुहारें

हर कोना घर-आँगन का मैं रौशन कर लूँ,

माँग हवाओं से लाऊँ खुशबू के झौंके

सावन की आकुलता इन आँखों में भर लूँ,

 

नम कर लूँ मैं दिल का रूठा-रूठा…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on October 5, 2019 at 1:10am — 5 Comments

नेता (लघुकथा )

 आपने कभी आत्मा की आवाज सुनी  है ?’‘- बाबा ने पूछा I

‘कौन आत्मा  ? ‘

‘वही जो हर मनुष्य के अंतर में रहती है  I ‘

‘बाबा मैं  नेता हूँ , मुझे आत्मा-अंतरात्मा से क्या ?

(मौलिक/अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 4, 2019 at 11:47am — 8 Comments

सयाने लोग

" वो लोग भी कमाल के होते हैं, जो कमाल की बाते करते हैं ।",उनकी मीटिंग खत्म होने के बाद पास बैठे आदमी ने कहा

"पर इन लोगों ने कभी चुप शांत रहने वाले लोगों के बारे भी सोचा है, वो भी कुछ दायरे संभाल रखें हैं ।" , उसने ख़ुद से पूछा

चुप व शांत रहने वालों की भी उन्हें प्रवाह करनी चाहिए, जब वे लोग आपस में बातें कर रहे होते हैं ।

"पर उनके लिए ये जानना भी ज़रूरी है कि इनकी सोच के दायरे से बड़ा भी कोई किसी का दायरा हो सकता है ।"

वहाँ बैठे आदमी ने फिर पूछ ही लिया, " भाई साहिब, आप जो…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on October 3, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

गज़ल

उठाओ नजर रहगुज़र देख लो ।

यहाँ जिन्दगी का सफ़र देख लो ।

 

नियम कायदे तो बने हैं कई

मगर भंग हैं सब जिधर देख लो ।

 

न भय है न चिंता न है शर्म ही

बना है बशर जानवर देख लो ।

 

कहीं लूट है तो कहीं क़त्ल है

किसी भी नगर की ख़बर देख लो ।

 

गले मिल रहे दोस्त खंजर लिए

बदलते समय का असर देख लो ।

 

करें फ़िक्र उनकी जो हैं नापसंद

सियासत का है ये हुनर देख लो ।

 

बिछा हर तरफ सिर्फ कंक्रीट…

Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on October 2, 2019 at 10:00pm — 7 Comments

अपना भारत.... (लघु रचना)

अपना भारत.... (लघु रचना)


हार गई
लाठी से
बन्दूक
आख़िर
जीत गई
बापू की अहिंसा
हिंसा से
मुक्ति दिलाई
गुलामी की
बेड़ियों से
तिरंगे को मिला
अपना आसमान
अपना सम्मान
अपना भारत

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 2, 2019 at 9:52pm — 4 Comments

समसामयिक दोहे

समसामयिक दोहे-

अर्थशास्त्र का  ज्ञान ही, सब देशों  का मूल.

कभी बढाता शक्ति यह, कभी हिला दे चूल.१

राजनीति परमार्थ को, लिया स्वार्थ में ढाल.

खुद सुख सुविधा भोगते, सौंप दुःख जंजाल.२

राजनीति के  शास्त्र में, कूटनीति के मन्त्र.

दलदल कीचड़ वासना, फलते पाप कुतंत्र.३ 

जीवन  में  संवेदना,  बहुत काम  की चीज.

कभी विफल होती नहीं, मिलें श्रेष्ठ या नीच.४

द्वेष भावना में किये, गए…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 2, 2019 at 8:00pm — 6 Comments

चलो भी...(गजल)

122  122  122  12

चलो भी जला के दिखा दें दिये

चले जा रहे वे अँधेरा किये।1

बहुत दिन गये चोट खाते हुए

रहेंगे कहाँ तक कहो मुँह सिये।2

किये जा रहे मौज मस्ती बड़ी

भुलाते हमें,जो हमारे हिये।3

चले पाँव नंगे, मिलीं कुर्सियाँ

लगा आजकल हैं नशा वे पिये।4

उड़ीं जो पतंगें, हुईं बेवफा

पिटे लोग लगता है' अपने किये।5 

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 2, 2019 at 7:28am — 3 Comments

गहन अँधेरे में

रात-अँधेरे सारी रात

टटोलते कोई एक शब्द

स्वयं में स्माविष्ट कर ले 

जो तुम्हारे आने का उल्लास

चले जाने का विषाद

कभी बूँद-बूँद में लुप्त होती

खिलखिलाती रंग-बिरंगी हँसी

और प्यारी हिचकियाँ तुम्हारी

आँसू ढुलकाती, मेरी ओर ताकती

दीप-माला-सी तुम्हारी आँखें

कि मोहनिद्रा में जैसे

मेरे ओठों पर तुम

अपने शब्दों को खोज रही हो

यह प्रासंगकि नहीं है क्या

कि मैं रात-अँधेरे सारी रात

टटोल रहा…

Continue

Added by vijay nikore on October 1, 2019 at 3:30pm — 8 Comments

जीवन की संध्या

जहाँ बुजुर्गों की सेवा हो, जीवन सुखमय होता है।
जो ठोकर देता बूढ़ों को, भार दुखों का ढोता है।।
अभिवादन नित करने वाले,सौम्य शील गुण पाते हैं।
वृद्ध अनादर करने वाले, खुद पीछे रह जाते हैं।।
रोदन करता जहाँ बुढ़ापा, घर आँगन भी रोते हैं।
इज्जत तार-तार होती जब, बूढ़े भूखे सोते हैं।।
कोमल किसलय को आँचल में, ढँककर दूध पिलाई थी।
अस्थिशेष असहाय निबल तन, झुकी कमर माँ ताई थी।।
पिचके गाल कराल हाल में, खाँस रहे बूढ़े…
Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 1, 2019 at 1:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल-कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के-बृजेश कुमार 'ब्रज'

बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख़न्नक मक़्सूर

मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन



ये वक़्त के फ़साने सब पैतरे हैं छल के

तुम भी बिखर न जाना यूँ मेरे साथ चल के

उस डायरी में तुमको कुछ भी नहीं मिलेगा

कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के

ये याद भी नही है शोला थ याकि शबनम

हालाँकि उस बला ने देखा तो था मचल के

अब क्या तुम्हें बताएं किस बात का गुमां है

कल रात चाँद मेरी छत पे गया टहल के

किस बात से…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 1, 2019 at 12:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल ' बड़े दिल का'

बड़े दिल का तो वो कद में बड़ा होने से पहले था

जमीं से राब्ता उसका ख़ुदा होने से पहले था

करें मत फ़िक्र अब मेरी सभी एहबाब घर जाएँ

मुझे एहसास-ए-तन्हाई नशा होने से पहले था

हुनर आया तपिश सहकर हजारों चोट खाकर ही

फ़कत माटी का लोंदा वो घड़ा होने से पहले था

बुरी सुहबत ने ही उसको मियाँ ऎसा बनाया है़

वगरना नेक बच्चा वो बुरा होने से पहले था

मुखौटे में निहाँ कितना घिनौना रूप था उसका

मसीहा वेश में ढोंगी सज़ा होने से पहले…

Continue

Added by rajesh kumari on October 1, 2019 at 12:00pm — 7 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

ग़ज़ल

   ग़ज़ल2122  2122  212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये रास्तों  पर …See More
54 minutes ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध…See More
4 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय जी भविष्य के लिए  स्पष्ट हुआ ।हार्दिक आभार आदरणीय जी "
22 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दुओं का भविष्य…"
23 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ * ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस गजल को अभी तनिक और समय दिया जाना था.  सादर  "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सुशील सरना जी,  दीप जले हर द्वार पर, जग में हो उजियार ...       …"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,  तीर्थ जाना  हो  गया है सैर जबभक्ति का यूँ भाव जाता तैर…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"किसने कहा छंद स्वर आधारित 'ही' हैं। तब तो शब्दों के अशुद्ध उच्चारण करने वाले छांदसिक…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । स्पर्शों में…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय विजय निकोर जी, एक अरसे बाद आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ. एकान्त और अकेलापन के बीच के अन्तर को…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार ।सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।। ............ क्या…"
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service